कलिंग युद्ध

भारत के इतिहास में कलिंग का युद्ध सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है । यह युद्ध 261 ई. पू. में मौर्य सम्राट अशोक व कलिंग नरेश अनंत पद्माभन (हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार राजा नन्दराज) के बीच भुवनेश्वर से 8 किलोमीटर दूर दक्षिण में दया नदी के किनारे लड़ा गया । वर्तमान का उड़ीसा राज्य (महानदी व गोदावरी नदी के बीच स्थित ) प्राचीन काल में कलिंग के नाम से जाना जाता था । नंद वंश के शासक महापद्मनंद के समय कलिंग मगध साम्राज्य का एक अंग था जो बाद में कुछ समय के लिए मगध से अलग हो गया था । सम्राट अशोक ने इसे जीत कर पुनः मगध साम्राज्य में मिला लिया था ।

कलिंग युद्ध के कारण

सामरिक व व्यापारिक दृष्टि से कलिंग का बहुत महत्व था । यही कारण था कि समय-समय पर यहां अनेकों राजवंशों ने राज किया । चेदि वंश के शासक खारवेल जिसे कलिंग नरेश खारवेल के नाम से भी जाना जाता है का भुवनेश्वर की उदयगिरि की पहाड़ी से प्राप्त हाथीगुम्फा अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि उसके समय में कलिंग एक समृद्ध राज्य था । सम्राट अशोक की साम्राज्य विस्तार नीति,कलिंग का समुद्र किनारे स्थित होने के कारण समुद्री व्यापार की दृष्टि से महत्वपूर्ण होना, हाथियों की बहुलता के कारण महत्वपूर्ण होना आदि कुछ मुख्य कारण थे जो कलिंग युद्ध का कारण बने ।

कलिंग युद्ध के परिणाम

कलिंग का युद्ध भारतीय इतिहास का सबसे भीषणतम युद्ध माना जाता है । मौर्य सम्राट अशोक के 13वें बृहत्त शिलालेख के अनुसार सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8 वर्ष बाद ( 9वें वर्ष) कलिंग पर आक्रमण किया था । हालांकि इस युद्ध में सम्राट अशोक की विजय हुई थी लेकिन युद्ध में हुए भीषण रक्तपात व नरसंहार से सम्राट अशोक शोकाकुल हो उठा । इस युद्ध में दोनों पक्षों के लगभग एक लाख लोग मारे गए थे और करीब डेढ़ लाख लोग बंदी बना लिए गए तथा लाखों लोग युद्ध के बाद आने वाली अकाल,महामारी आदि विभीषिका से नष्ट हो गए । कलिंग विजय सम्राट अशोक की अंतिम विजय थी । कलिंग युद्ध की विनाशलीला से शोकाकुल होकर उसने बौद्ध विचारधारा (धम्म) को अपना लिया । इस युद्ध ने सम्राट के हृदय को परिवर्तित कर दिया । सम्राट अशोक ने हथियार त्यागकर जीवन में कभी युद्ध न करने का संकल्प लिया ।

भुवनेश्वर के पास स्थित धोलिगिरी नामक स्थान को कलिंग युद्ध क्षेत्र माना जाता है । यहां स्थित पहाड़ियों पर अशोक के शिलालेख मिले हैं । ऐसा कहा जाता है कि युद्ध के पश्चाताप में सम्राट अशोक ने यहां अनेकों बौद्ध मंदिरों व स्तूपों का निर्माण करवाया था तथा बौद्ध धर्म की शिक्षा भी उसने यहीं से ग्रहण की ।

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