भारत में कुषाण वंश का शासन

पार्थियन के बाद भारत में कुषाण आये । मौर्यात्तर काल में भारत आने वाली विदेशी जनजातियों में कुषाण सर्वाधिक प्रभावशाली थे । कुषाण मूल रूप से चीन की यूची (यूईशि) जनजाति के लोग थे । कालांतर में इस जनजाति के लोग पांच शाखाओं में बंट जाते हैं तथा इन्हीं में से एक शाखा कुई शुंग थी जो भारत पर आक्रमण करती है । इसी जनजाति के लोग जो कुषाण कहलाते हैं । यूनानी लेखकों ने इन्हे तोखारी / तोचारियन कहा है । यह एक खानाबदोश जनजाति थी ।

कुषाण वंश का शुरुआती इतिहास

यूचिओं का मूल निवास तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में ‘तकला मक़ान’ की मरुभूमि के सीमान्त क्षेत्रों में था । उस समय उत्तरी चीन में एक जाति निवास करती थी हूण जो एक बर्बर जाति थी । हूणों ने यूचिओं पर आक्रमण कर दिया तथा यूचिओं को वहां से खदेड़ दिया । हूणों के साथ इस युद्ध में यूचिओं का राजा मारा गया । विधवा रानी के नेतृत्व में यूची जनजाति के लोग यहाँ से पलायन करके उत्तर-पश्चिम की ओर चले गए । रास्ते में ईली नदी के तट पर इनका सामना व्ह्सुन कबीले से होता है जिन्हें परास्त कर यूचिओं ने उनके क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया । यहाँ यूची कबीला दो भागों में बंट गया । यूची कबीले का एक भाग यहीं पर रुक गया तथा एक भाग पश्चिम की ओर नयी जगह की तलाश में चला गया । यहाँ रुकने वाला यूची कबीला लघु यूची तथा पश्चिम में सीर नदी घाटी की ओर बढ़ने वाला कबीला महान यूची कहलाया । सीर नदी घाटी में उस समय शक़ रहते थे । यूचिओं ने शकों को वहां से खदेड़ दिया और उनके स्थानों पर कब्जा कर लिया । कुछ दशकों बाद यूचिओं को वहां से भी खदेड़ दिया जाता है और ये भागकर बैक्ट्रिया आ जाते हैं । इन्होने सम्भवतः यहां शकों की शाखा को पराजित कर बैक्ट्रिया पर भी अधिकार कर लिया था ।

बैक्ट्रिया पर अधिकार करने के बाद यह महान यूची कबीले के लोग खानाबदोश जीवन त्याग कर कुछ वर्ष शांति से रहते हैं तथा 5 शाखाओं में बंटकर अलग-अलग स्थानों पर शासन करने लगते हैं । ये 5 शाखाएँ 1.कुई-शुंग, 2.हिऊ-मी, 3.शुआंग-मी, 4.हि-तुन, 5.व-तु-मी थीं । इन्हीं शाखाओं में से एक शाखा थी कुई शुंग जो कालान्तर में कुषाण कहलाए । इस विभाजन के 100 वर्षों बाद कुई शुंग शाखा के एक सरदार कीउ-तसे-क्यो ने शेष 4 शाखाओं को पर अपना आधिपत्य स्थापित कर संगठित किया और भारत की ओर बढे । दोस्तों, कीउ-तसे-क्यो का समीकरण कुजुल कडफिसस से किया जाता है । कुषाणों के शुरुआती इतिहास की कहीं भी बहुत प्रमाणिक जानकारी नहीं मिलती है,फिर भी जो तथ्य संग्रह किये गए हैं उसी आधार पर जानकारी प्रस्तुत की गयी है ।

भारत में कुषाण वंश के शासन को दो भागों में बांटा गया है-

  1. कडफिसस वंश-  इस वंश के महान शासक कुजुल कडफिसस तथा विम कडफिसस थे ।
  2. कनिष्क वंश-  इस वंश के महान शासक कनिष्क, वशिष्क, हुविष्क, कनिष्क द्वितीय, तथा वासुदेव थे ।

कुजुल कडफिसस (कडफिसस प्रथम)

चीनी स्रोतों में इसका नाम कीउ-तसे-क्यो मिलता है । कुजुल कडफिसस ने भारत में कुषाण राज्य की स्थापना की । कुजुल कडफिसस ने भारत में अपनी सत्ता काबुल तथा कश्मीर में स्थापित की ।

कुजुल कडफिसस के दो प्रकार के सिक्के प्राप्त हुए हैं -प्रारम्भ के सिक्के तथा बाद के सिक्के । प्रारंभिक सिक्कों में मुख भाग पर काबुल के अन्तिम हिन्द-यवन शासक हर्मियस का नाम यूनानी लिपि में है तथा पृष्ठ भाग पर कुजुल कडफिसस का नाम खरोष्ठी भाषा में खुदा हुआ है तथा बाद के सिक्कों पर राजकीय उपाधियां जैसे-महाराजस महतस कुषण कुयुल कफस अर्थात महाराजा महान कुषाण कुजुल किडफिसस आदि उत्कीर्ण हैं । सिक्कों पर उत्कीर्ण इन उपाधियों से यह प्रतीत होता है कि शुरुआत में कुजुल किडफिसस का शासन यवन शासक हर्मियस के अधीन रहा होगा लेकिन बाद में उसने अपने शासन को को अधीनता से मुक्त करा लिया था और एक स्वतंत्र शासक बन गया था ।

कुजुल किडफिसस ने सोने के सिक्के नहीं चलाये बल्कि उसके सिक्के ताम्बे के थे । उसके सिक्कों पर रोमन प्रभाव दिखाई देता है । उसके सिक्के रोमन सम्राट क्लाउडियस के सिक्कों से मिलते जुलते हैं । कुजुल किडफिसस के सिक्कों पर धर्मथिद/धर्मथित (धर्म में स्थित) तथा सचधर्मथिद (सच्चे धर्म में स्थित) उत्कीर्ण है जिससे विद्वानों का मत है कि कुजुल किडफिसस ने या तो बौद्ध धर्म या शैव धर्म स्वीकार कर लिया था । कुजुल किडफिसस की मृत्यु 80 वर्ष की आयु में 64 ई.में हुई ।

विम किडफिसस (किडफिसस द्वितिय)

विम किडफिसस संभवतः कुजुल किडफिसस का पुत्र था । कुछ विद्वानों का मानना है कि यह कुजुल किडफिसस का पौत्र था । चीनी स्त्रोतों में विम किडफिसस का नाम येन-काओ-चेन बताया गया है । विम किडफिसस ने सिंधु नदी पार तक्षशिला तथा पंजाब पर अधिकार कर लिया था ।

विम किडफिसस ने सोने व ताम्बे के सिक्के चलाये थे । सोने के सिक्के चलाने वाला वह पहला कुषाण शासक था । उसके सिक्कों में एक ओर यूनानी लिपि तथा दूसरी ओर खरोष्ठी लिपि है । उसके सिक्कों पर ‘महाराजस राजाधिराजस सर्वलोगइश्वरस महिश्वरस विम किडफिसस’ अंकित है जिसका तात्पर्य है महाराज राजाधिराज सर्वलोकेश्वर महिश्वर विम किडफिसस त्रातार । इससे यह स्पष्ट होता है कि विम किडफिसस एक शक्तिशाली राजा था ।

उसके सिक्कों पर शिव,नन्दी तथा त्रिशूल की आकृतियां मिली है जिससे विम किडफिसस के शैव उपासक होने का संकेत मिलता है ।
विम किडफिसस के विशुद्ध सोने के सिक्कों से यह ज्ञात होता है कि उसका राज्य समृद्ध एवं सम्पन्न था ।

प्लिनी के विवरण से पता चलता है कि उसके समय मे भारत के रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्ध काफी विकसित हो गया था । चीन के साथ भी उसका व्यापारिक सम्बन्ध था ।

कनिष्क

कनिष्क का शासनकाल 78 ईस्वी से 101 ईसवी तक था । चीनी स्त्रोतों में कनिष्क का नाम ची-निसे-ची मिलता है । विम किडफिसस तथा कनिष्क का क्या सम्बन्ध था यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता परन्तु इस बात में कोई सन्देह नहीं कि कनिष्क कुषाण वंश का तीसरा महान शासक था । उसी के कारण कुषाण वंश भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है ।

कनिष्क के राज्यारोहण तिथि विवादास्पद है लेकिन विद्वानों द्वारा आम सहमति से कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 78 ईसवी निर्धारित की गई है । ऐसा कहा जाता है कि कनिष्क ने अपने राज्यारोहण के उपलक्ष में शक संवत शुरू किया । यह शक संवत सौर्य कैलेंडर (सूर्य पर आधारित कैलेंडर) पर आधारित है जो भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है ।

कुषाण वंश के शासक कनिष्क की तस्वीरें~बाएं महात्मा बुद्ध के समान सिक्कों पर अंकित चित्र ,दाएं कनिष्क की प्राप्त मूर्ति जिसमें कनिष्क सैन्य कोट व पैरों में भारी जूते पहने हुए है तथा बीच मे कनिष्क के सिक्के हैं ..

कनिष्क का साम्राज्य विस्तार

कनिष्क के राज्यारोहण के समय कुषाण साम्राज्य में अफगानिस्तान, सिंध के कुछ भाग,बैक्ट्रिया तथा पार्थिया आदि के कुछ भाग शामिल थे । कनिष्क ने युद्ध और विजयों द्वारा अपने साम्राज्य का ओर अधिक विस्तार किया ।

कनिष्क के युद्ध और विजय

पूर्वी भारत पर विजय

‘श्रीधर्मपिटकनिदान सूत्र’ के चीनी अनुवाद के अनुसार कुषाण शासक कनिष्क ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर वहां के राजा को बुरी तरह पराजित किया तथा हर्जाने के रूप में एक बड़ी रकम की मांग की । परंतु इसके बदले में वह अश्वघोष(एक बौद्ध विद्वान), बुद्ध का भिक्षा-पात्र तथा एक अदभुत मुर्गा लेकर ही संतुष्ट हो गया । पाटलिपुत्र, वैशाली, कुम्हरार तथा बक्सर आदि स्थानों से प्राप्त कुषाण सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि बिहार के कई क्षेत्रों पर कुषाण शासक कनिष्क का शासन था ।

तिब्बती साहित्य में यह वर्णन मिलता है कि कनिष्क ने अपनी सेना के साथ साकेत/अयोध्या पर आक्रमण करके साकेत के राजा को युद्ध मे पराजित किया ।

श्रावस्ती व कोशाम्बी से प्राप्त बुद्ध की प्रतिमाओं पर उत्कीर्ण अभिलेख,सारनाथ से प्राप्त कनिष्क काल के अभिलेख( 81 ई.) तथा खैराडीह (बलिया जिले) से प्राप्त कुषाणकालीन बस्ती के अवशेष इसकी पुष्टी करते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में कनिष्क ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था ।

कनिष्क का चीन के साथ युद्ध

कनिष्क का सबसे प्रसिद्ध युद्ध चीन के साथ था । यह युद्ध चीनी तुर्किस्तान(मध्य एशिया) में स्थित काशगर,यारकंद व खोतान के प्रदेशों पर आधिपत्य को लेकर हुआ । ये सभी प्रदेश चीन के अधीन थे तथा उस समय चीन पर शक्तिशाली हानवंशी राजा हो -ती का शासन था । पान-चाओ उस समय हो-ती का सेनानायक था जो अपनी विजयों के कारण प्रसिद्ध था । पान-चाओ ने अपनी विजयों द्वारा चीनी साम्राज्य की सीमाओं को दूर-दूर तक बढ़ा दिया था ।
कनिष्क ने अपनी समता घोषित करते हुए अपना एक राजदूत चीनी सेनापति पान-चाओ के पास भेजा ओर चीनी राजकुमारी से विवाह की मांग की । सेनापति पान-चाओ ने इस प्रस्ताव को अपने सम्राट हो-ती का अपमान समझा ओर कनिष्क के राजदूत को बंदी बनाकर चीन ले आया । जब कनिष्क को इस बात का पता चला तो वह बड़ा क्रोधित हुआ और उसने चीन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी ।

कनिष्क ने 88 ई. में चीन के विरुद्ध सेनापति सी के नेतृत्व में 70000 घुड़सवार सैनिकों की विशाल सेना सुंग-लिन पर्वत (पामीर पर्वत) के पार भेजी । दोनों सेनाओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ । इस युद्ध मे सेनापति पान-चाओ ने कनिष्क की सेना परास्त को परास्त किया । परन्तु इस पराजय से कनिष्क ने हिम्मत नहीं हारी ओर चीन के विरूद्ध दूसरे युद्ध की तैयारी शुरू कर दी । संयोग से चीनी सेनापति पान-चाओ की मृत्यु हो जाती है और उसका पुत्र पान-यांग चीन का नया सेनापति बनता है । इस बार कनिष्क स्वंय एक विशाल सेना के साथ चीनी तुर्किस्तान पर चढ़ाई करता है और चीनी सेनापति पान-यांग को परास्त कर खोतान,काशगर व यारकंद पर अधिकार कर लेता है । इस प्रकार चीन के साथ प्रथम युद्ध में कनिष्क पराजित होता है और दूसरे युद्ध विजय प्राप्त होती है । विजय के बाद खोतान, काशगर व यारकंद के क्षेत्रों को कनिष्क अपने साम्राज्य में मिला लेता है ।

कश्मीर विजय

कल्हण की राजतरंगिणी में यह उल्लेख मिलता है कि कनिष्क ने कश्मीर को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया था तथा वहां अपने नाम पर कनिष्कपुरम नामक नगर बसाया जो आज भी कनिस्पुर नाम से जाना जाता है ।

मालवा विजय

संभवतः कनिष्क ने उज्जैन के क्षत्रप को पराजित कर मालवा पर अधिकार कर लिया था । साँची के अभिलेख से पता चलता है कि वासु(वास) कनिष्क के समय से ही मालवा का उपराजा था ।

इस प्रकार मौयों के बाद कुषाण शासक कनिष्क के अधीन पहली बार एक विशाल साम्राज्य की स्थापना हुई जिसमें गंगा का मैदान,सिंधु तथा आमूदरिया (Oxus) की घाटियाँ शामिल थीं ।

कनिष्क के इस विशाल साम्राज्य की दो राजधानियां थीं-पहली राजधानी पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) थी जो वर्तमान में पाकिस्तान के प्रांत खैबर पख्तूनख्वा की राजधानी हैं तथा दूसरी राजधानी मथुरा थी जो वर्तमान भारत के उत्तर-प्रदेश में स्थित है ।

कनिष्क की मृत्यु

बौद्ध अनुसृतियों (संस्कृत बौद्ध ग्रंथों के चीनी अनुवाद) के अनुसार अपनी अत्यधिक लालची स्वभाव ,निर्दयता तथा महत्वकांक्षा के कारण जनता में अप्रिय हो गया था । उसने बौद्ध धर्म ग्रहण के बाद भी अपनी दिग्विजय की नीति को नहीं छोड़ा । निरन्तर युद्धों के कारण उसके सैनिक कनिष्क से बुरी तरह तंग आ गए थे तथा सैनिकों में कनिष्क के विरुद्ध विद्रोह की भावना आ गयी थी । एक बार जब कनिष्क उत्तरी अभियान पर जा रहा था तो रास्ते में बीमार पड़ गया । उसी समय उसके सैनिकों ने उसका मुंह लिहाफ से ढक कर पीट-पीट कर मार डाला । यह कथा कितनी सत्य है ये तो नहीं कहा जा सकता परन्तु इस आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि महान कुषाण सम्राट कनिष्क का अंत दुःखद रहा ।

सामान्य तौर पर कनिष्क की मृत्यु की तिथि 101 ईसवी मानी जाती है ।

कनिष्क की उपलब्धियां

  • रेशम मार्ग पर नियंत्रण व व्यापारिक प्रगति- कनिष्क का रेशम व्यापार के मार्गों पर नियंत्रण था जो इसी के साम्राज्य से होकर गुजरते थे । उस समय रोमन और चीन का रेशम व्यापार बहुत बड़े स्तर पर था । रोमन की बैक्ट्रिया से शत्रुता थी इसीलिए उन्होंने ऐसे मार्ग की तलाश की जो बैक्ट्रिया से होकर न गुजरता हो और यह मार्ग कनिष्क के राज्य से होकर गुजरता था । रेशम के ये मार्ग कुषाणों के आमदनी के बड़े स्रोत थे क्योंकि इनके राज्य के मार्गों से होकर जाने वाले व्यापारियों से ये बहुत अधिक कर लेते थे । रेशम व्यापार में भारतीय व्यापारियों ने भी दलाल के रूप में भूमिका शुरू कर दी थी । वे चीन से रेशम खरीदते और रोम में भेजते थे तथा उनसे सोना प्राप्त करते थे । इस प्रकार कुषाणों के समय उत्तर-पश्चिम भारत व्यपार की दृष्टी से सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र था ।
  • बौद्ध धर्म को संरक्षण व अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता- कनिष्क वास्तव में एक महान योद्धा था जिसने अपना साम्राज्य पार्थिया से मगध तक फैलाया था लेकिन उसकी प्रसिद्धि बौद्ध धर्म को सरंक्षण व अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता के कारण कहीं अधिक थी । उसका निजी धर्म बौद्ध धर्म था । उसने पार्श्व के कहने पर 98 ईसवी में कुण्डलवन में चौथी बौद्ध महासंगीति का आयोजन कराया । इस बौद्ध महासंगीति में वसुमित्र को अध्यक्ष तथा अश्वघोष को उपाध्यक्ष चुना गया । इस संगीति में महानाय बौद्ध धर्म को मान्यता दी गयी । मौर्य सम्राट अशोक की तरह ही कनिष्क ने भी बौद्ध धर्म (महायान शाखा) के प्रचार के लिए अनेकों कदम उठाये । उसने अनेकों बौद्ध स्तूपों,चेत्यों व विहारों का निर्माण करवाया ।
  • कला एवं साहित्य का संरक्षण- कनिष्क विशाल भवनों का महान निर्माता तथा मूर्तिकला और वास्तुकला काप्रेमी था । उसने पुरुषपुर (पेशावर) में बुद्ध के अवशेषों पर एक 400 फिट ऊंचा स्तूप बनवाया जिसकी प्रशंसा चीनी यात्री ह्वेन-त्यांग ने की थी । कश्मीर में उसने कनिष्कपुर नामक नगर की स्थापना की थी इसके अलावा उसने तक्षशिला नगर का नया भाग बनवाया जो सिरमुख कहलाता है । कनिष्क काल के स्थापत्य कला का सबसे अच्छा उदाहरण है मथुरा का देवकुल और नाग मन्दिर । महायानी बौद्ध धर्म के विकास ने मूर्तिकला को प्रभावित किया । गांधार और मथुरा की विशिष्ट शैलियों महात्मा बुद्ध की सुन्दर मूर्तियां बनाई गयी । मथुरा में कनिष्क की आदमकद व बिना सिर की मूर्ति मिली है जिसमे उसे गठीले बदन तथा सैनिक पौशाक (घुटने तक चोगा तथा पैरों में भारी बूट) में दिखाया गया है । यह मूर्ति अब मथुरा संग्रालय में है । कला की दृष्टि से कनिष्ककालीन सिक्के भी महत्वपूर्ण हैं । कनिष्क के सिक्के दो प्रकार के थे जिनमे कुछ सिक्कों पर यूनानी लिपि में तथा कुछ सिक्कों पर ईरानी लिपि में कनिष्क का नाम अंकित है । कनिष्क के ताम्बे के कई सिक्कों पर उसे एक वेदी पर बलि चढ़ाते हुए दिखाया गया है तथा सोने के सिक्के रोम सम्राट के सिक्कों से मिलते-जुलते हैं जिसमें एक ओर तो कनिष्क की आकृति तथा दूसरी ओर किसी अन्य देवी या देवता की मूर्ति अंकित है ।कनिष्क विद्वानों का आश्रयदाता था । उसके दरबार मे पार्श्व, वसुमित्र, नागार्जुन, अश्वघोष, मातृचेत तथा संघरक्ष जैसे प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान थे । संघरक्ष कनिष्क का राजपुरोहित था । प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य चरक कनिष्क का राजवैद्य था । कनिष्क ने अन्य विद्वानों को भी सरंक्षण प्रदान किया था ।

कनिष्क के उत्तराधिकारी

कनिष्क युद्धों व विजय अभियानों के द्वारा एक विशाल साम्राज्य एक विशाल साम्राज्य का स्वामी बन गया था । उसके समय मे कुषाण साम्राज्य अपने चरम उत्कृष्ट पर था । कनिष्क की मृत्यु के पश्चात कुषाण साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ने लगा । कनिष्क की मृत्यु के बाद कुषाण साम्राज्य की प्रगति रुक गयी । हालांकि कुषाणों का साम्राज्य कनिष्क के बाद भी कई दशकों तक चला परंतु उसके उत्तराधिकारियों ने कोई विशेष उल्लेखनीय कार्य नहीं किया । आइये जानते हैं कनिष्क के उत्तराधिकारियों के बारे में-

वासिष्क

कनिष्क के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र वासिष्क ( 102 ई.-106 ई.) कुषाण सम्राट बनता है । वासिष्क ने श्रीनगर के समीप जुष्कपुर तथा जयस्वामीपुर नामक नगरों की स्थापना की थी ।

हुविष्क

वासिष्क के बाद हुविष्क (106 ई. -140 ई.) कुषाण साम्राज्य की गद्दी पर बैठता है । शक शासक रुद्रदामन ने हुविष्क को पराजित कर मालवा का प्रदेश कुषाणों से छीन लिया था । उसके समय मे कुषाणों की प्रमुख राजधानी पुरुषपुर से हटाकर मथुरा कर दी गयी। । हुविष्क के सिक्कों पर शिव, स्कंद, कुमार, विशाख तथा महासेन आदि देवताओं की मूर्तियां अंकित हैं जिससे यह प्रतीत होता है उसका व्यक्तिगत झुकाव ब्राह्मण धर्म (हिन्दू धर्म) की ओर था । उसने मथुरा में एक सुन्दर विहार का निर्माण करवाया तथा कश्मीर के बारामूला दर्रे के पास हुष्कपुर नामक नगर की स्थापना भी की ।

कनिष्क द्वितिय

हुविष्क के बाद कनिष्क द्वितिय ( 140 ई.-145 ई) ने कुषाण शासन संभाला । उसने महाराज, राजाधिराज, देवपुत्र तथा तत्कालीन रोमन सम्राट जैसी उपाधि कैसर (Cassar) धारण की ।

वासुदेव

कनिष्क द्वितिय के बाद वासुदेव (145 ई.-176 ई.) ने कुषाण साम्राज्य की बागडोर संभाली । संभवतः वासुदेव कुषाण वंश का अंतिम सम्राट था । उसके समय मे कुषाण साम्राज्य के उत्तर-पश्चिम का भाग उसके हाथों से चला गया तथा कुषाण साम्राज्य मथुरा के आस-पास के क्षेत्रों तक सीमित हो गया । उसके सिक्कों पर शिव और नंदी के चित्र उत्कीर्ण मिले हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह शैव धर्मावलंबी था । उसने शाआनोशाओ वसुदेवो कुषाणो (शाहानुशाही वासुदेव कुषाण) की उपाधि धारण की थी ।

कनिष्क के अन्य उत्तराधिकारी

वासुदेव कुषाण वंश का अंतिम उल्लेखनीय सम्राट था । वासुदेव के पश्चात कुषाणों का इतिहास स्पष्ट नहीं है । कनिष्क तृतीय तथा वासुदेव द्वितिय के द्वारा जारी सिक्कों से इतना तो प्रमाणित होता है कि कुषाण साम्राज्य वासुदेव के बाद भी बना रहा परंतु इतिहास में इनके शासन क्षेत्रों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते हैं । चीनी स्त्रोतों के अनुसार वासुदेव द्वितिय ने 230 ई. में चीनी सम्राट के दरबार में अपना एक दूत भेजा था । ऐसा माना जाता है कि वासुदेव द्वितिय के बाद ईरान में ससानियों,उत्तरी भारत मे भारशिवों,योधैयों, कुणिनंदों तथा मालवों के स्वतंत्र गणराज्य स्थापित हो जाने के कारण कुषाणों के साम्राज्य को पूरी तरह विखंडित कर दिया । इस तरह भारत से कुषाण शासन का अंत हो गया ।

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