क्या है राफेल विवाद (What is the Rafale controversy)

क्या है राफेल (What is Rafale)

फ्रेंच भाषा में राफेल का अर्थ है ‘तूफान’ । राफेल अत्याधुनिक हथियारों से लैस एक लड़ाकू विमान है । इसे फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन (Dassault Aviation) बनाती है । राफेल को 2001 में फ्रांस वायुसेना में शामिल किया गया था । यह दो इंजनों वाला एक बहुउपयोगी विमान है जो हवाई हमले, वायु वर्चस्व, जमीनी समर्थन, भारी हमले तथा परमाणु प्रतिरोध जैसी खूबियों से परिपूर्ण है । राफेल में कई घातक मिसाइलें हैं जो हवा से हवा में तथा हवा से जमीन पर मार कर सकती है । राफेल एक खास विमान है जो युद्ध के समय अहम भूमिका निभाता है । यह हिमालय की दुर्गम चोटियों पर भी सफलतापूर्वक लड़ सकता है । यह विमान परमाणु हमला करने में भी सक्षम है । इसमें लगी 1.30mm की गन से एक मिनट में 125 राउंड गोलियां दागी जा सकती हैं । यह विमान Two-Seater (दो सीटों वाला) है तथा इसे अत्यधिक ऊंचाई पर भी उड़ाया जा सकता है । इस विमान को एक मिनट में 60000 फिट की उंचाई पर ले जाया जा सकता है । इस विमान की गति 2500 किमी प्रति घंटा तथा इसकी मारक क्षमता 3700 किलोमीटर है । यह विमान 150 किमी दूर से निशाना साध सकता है । यह विमान 26000 किलोग्राम वजन लेकर उड़ने में सक्षम है । इस विमान की ईंधन क्षमता 17000 किलोग्राम है यानि यह लगातार 10 घंटे उड़ान भर सकता है । यह विमान लगभग 75% हमेशा ऑपरेशन के लिए तैयार रहता है । लीबिया और अफगानिस्तान में राफेल अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर चूका है । राफेल की सबसे बड़ी खूबी ये है कि यह Radar की पकड़ में नहीं आता है । राफेल अन्य विमानों के मुकाबले हल्का व छोटा के कारण यह बेहद छोटे रनवे से भी उड़ान भर सकता है । यह विमान हर प्रकार के मौसम में उड़ान भर सकता है । इस विमान में ऑक्सीजन जनरेशन सिस्टम होने के कारण इसमें लिक्विड ऑक्सीजन भरने की जरुरत नहीं पड़ती । इस विमान में भारतीय वायुसेना की जरूरत के अनुरूप कई फेर-बदल किये गए हैं ।

भारत द्वारा राफेल डील (Rafale deal by india)

2001 में भारतीय वायुसेना ने अतिरिक्त लड़ाकू विमानों की मांग की । वायुसेना की मांग पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एनडीए के समक्ष 126 लड़ाकू विमान खरीदने का प्रस्ताव रखा । लेकिन रक्षा मंत्रालय द्वारा लड़ाकू विमानों को खरीदने के इस प्रस्ताव पर वास्तविक रणनीति 2007 में बन पायी जब यूपीए सत्ता में थी । 2007 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने 126 मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट (एमएमआरसी) श्रेणी के एयरक्राफ्ट खरीदने के लिए तत्कालीन रक्षा मंत्री एके अंटोनी की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने RPF जारी किया । इसके पश्चात एक निविदा (Tender) जारी हुआ जिसमें कई बड़ी अंतरराष्ट्रीय विमान निर्माता कंपनियों ने भारत के साथ विमानों का प्रस्ताव किया । निविदा की शर्तों के अनुसार जो भी कंपनी भारत को विमान देगी और वह विमान निर्माण की टेक्नोलॉजी और लाइसेंस भी भारत को देगी । इन Tender में विश्व की 6 बड़ी कंपनियों ने भाग लिया  था । ये 6 कम्पनियाँ और उनके विमान निम्न थे-

  1. अमेरिकी कंपनी Lockheed Martin Corporation और उसका लड़ाकू विमान F-16
  2. अमेरिकी कंपनी McDonnell Douglas and Boeing  का F/A-18 Super Hornet (Block III)
  3. Eurofighter Jagdflugzeug GmbH का Eurofighter Typhoon
  4. Russian Aircraft Corporation-Mikoyan का विमान MiG-35
  5. Swedish Aerospace Company Saab का Gripen तथा
  6. फ्रांसीसी कंपनी Dassault Aviation का Rafale

2011 तक भारतीय वायुसेना द्वारा इन विमानों के कड़े परीक्षण के बाद राफेल (Rafale) तथा यूरोफाइटर टाइफून (Eurofighter Typhoon) को पसंद किया । Dassault  Aviation ने अपने विमान (राफेल) की कीमत अन्य कंपनियों के विमानों की तुलना में सबसे कम रखी । फरवरी 2012 को राफेल डील को एल-1 बिडर घोषित कर दिया और इन विमानों को खरीदने की दिशा में Dassault Aviation से बातचीत शुरू हो गई । दोनों के मध्य समझौता हुआ 18 विमान फ्रांस में निर्मित होंगे तथा बाकि के 108 विमान भारत में ही निर्मित होंगे । हालांकि भारत सरकार के पास राफेल के अलावा भी कई विकल्प थे । लेकिन भारतीय वायुसेना द्वारा राफेल को सस्ता व सामरिक जरूरतों के अनुकूल देखते हुए इसी को चुना । वर्ष 2014 तक यूपीए सरकार के काल में यह डील ज्यों की त्यों ही पड़ी रही । यूपीए सरकार तथा Dassault Aviation के बीच विमान की कीमतों व प्रोधोगिकी को लेकर लंबे समय तक बातचीत चलती रही । खासकर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के मामले में दोनों पक्षों में गतिरोध बन गया था । Dassault  Aviation भारत में बनने वाले 108 विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी । सूत्रों का तो यह भी कहना है कि यह डील यूपीए के समय फाइनल हो गयी थी परन्तु Dassualt Aviation द्वारा कमिशन देने से इन्कार करने पर इस डील में देरी हो रही थी ।

क्या है राफेल डील विवाद (What Is Rafale Deal Controversy)

मई 2014 में एनडीए सत्ता में आयी । 10 अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के दौरे पर गए । इसी दौरान नरेंद्र मोदी ने यहाँ घोषणा की वह फ्रांस से 36 राफेल विमान खरीदेगा । इस समझौते में सरकार ने जल्द से जल्द इन 36 तैयार विमानों हासिल करने की बात कही । बस इसी एलान से शुरू होता है राफेल विवाद जो अभी तक सुलझ नहीं पाया है । यूपीए सरकार के समय 126 MMRCA विमानों की जो RFP हुई थी उसे मोदी सरकार ने 24 जून 2015 को वापिस ले लिया । मोदी सरकार का कहना है कि कांट्रैक्ट को लेकर Dassualt Aviation से जारी वार्ता में गतिरोध पैदा होने के कारण 126 के बजाय 36 राफेल विमानों की डील हुई है । इस समझौते के अनुसार विमानों की आपूर्ति भारतीय वायु सेना की जरूरतों के हिसाब से उसके द्वारा तय समय सीमा के भीतर होनी थी तथा विमान के साथ जुड़े तमाम सिस्टम और हथियारों की आपूर्ति भी वायुसेना द्वारा तय मानकों के अनुरूप होनी है । इस समझौते में कहा गया कि लंबे समय तक इन विमानों के रखरखाव की जिम्मेदारी फ्रांस की ही होगी । 36 राफेल विमानों की इस डील का प्रारूप तैयार करने के लिए एक वार्ता दल गठित किया गया । इस वार्ता दल की रिपोर्ट के अनुसार डील को फाइनल कर दिया गया । 23 सितंबर 2016 को दोनों देशों के मध्य इस डील को लेकर अंतर सरकारी करार यानी इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (IGA) किया गया । सुरक्षा मामलों की कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद भारत और फ्रांस ने इन 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए 23 सितम्बर,2016 को 7.87 अरब यूरो (लगभग 59,000 करोड़ रूपये) के सौदे हस्ताक्षर किये ।

यूपीए का कहना है कि 126 विमानों के लिए Dassualt Aviation से 54,000 करोड़ रुपये देना तय हुए थे , जबकि मोदी सरकार मात्र 36 विमानों के लिए 59,000 करोड़ दे रही है । कांग्रेस का आरोप है कि अभी एक राफेल की कीमत 1555 करोड़ रूपये पड़ रही है जबकि कांग्रेस इसे 428 करोड़ रूपये प्रति विमान में खरीद रही थी । कांग्रेस का कहना है की मोदी सरकार के इस सौदे में ‘मेक इन इंडिया’ का कोई प्रावधान नहीं है । विपक्ष का आरोप है कि यूपीए ने Dassualt Aviation से 18 बिलकुल तैयार विमान खरीदने वाली थी जबकि बाकि के 108 विमानों की असेम्बलिंग की जानी थी । इसके साथ ही इस सौदे में Transfer of Technology की बात कही गयी थी ,ताकि बाद में भारत में इन विमानों को बनाया जा सके । इसके लिए यूपीए ने भारत की सैन्य विमान निर्माता कंपनी Hindustan Aircraft Limited (HAL) को इस सौदे में शामिल किया था । लेकिन मोदी सरकार ने HAL को इस सौदे से बहार निकाल,एक निजी अनाड़ी कंपनी को यह सौदा दे दिया । विपक्ष के मुताबिक इस सौदे से Hindustan Aircraft Limited (HAL) को 25000 करोड़ का नुकसान हुआ है जबकि NDA सरकार इसका फायदा इस निजी कंपनी को दे रही है । विपक्ष का कहना है कि अनिल अम्बानी की इस कंपनी पर पहले ही भारतीय बैंकों को 8000 करोड़ का कर्जा बाकि है दूसरा इस कंपनी को अनुभव नहीं है क्योंकि इसने नौसेना को जहाज बनाकर देने का वादा भी पूरा नहीं किया है ,फिर इस कंपनी पर मोदी सरकार की इतनी मेहरबानी क्यों है । हालाँकि अम्बानी के कंपनी की तरफ से यह बयान आया था की मोदी सरकार द्वारा राफेल पर किये गए इस सौदे के अनुसार सभी 36 विमान फ्रांस से ‘फ्लाई अवे’ स्थिति में आने हैं न की भारत में बनाए जाने हैं ।

सच क्या है इसका खुलासा अभी तक नहीं हुआ है क्योंकि सरकार का कहना है कि भारत और फ्रांस के बीच इस डील को लेकर गोपनीयता की संधि हुई है । जबकि इसी बात पर विपक्ष का कहना कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने यह स्पष्ट कहा है कि दोनों देशों के बीच राफेल डील को लेकर कोई गोपनीय संधि नहीं हुई है । विपक्ष का यह कथन झूठा प्रतीत होता है क्योंकि इस डील को लेकर गोपनीयता के प्रश्न पर फ़्रांस का आधिकारिक बयान आया है की ‘भारत और फ़्रांस इस डील से सम्बंधित जानकारी को गोपनीय रखने के लिए बाध्य हैं,इससे भारत और फ़्रांस की सुरक्षा और ऑपरेशनल क्षमता पर असर पड़ सकता है’ । राफेल की कीमत 1000 करोड़ रुपये प्रति विमान ज्यादा को विपक्ष मोदी सरकार द्वारा किया गया घोटाला बता रही है ।

दोस्तों,राफेल खरीदने का फैसला 2007 में हो चुका था ,फिर यूपीए इस सौदे को लेकर किसी नतीजे पर क्यों नहीं पहुंची । क्यों इस पर इतना समय लगा , क्या है सच, कोई नहीं बता रहा,आखिरकार 2014 में सरकार बदल गयी,मोदी सरकार ने एक वर्ष के अंदर फैसला लिया और यूपीए की डील को स्थागित कर फ्रांस के साथ नई  Goverment to Government  basis पर डील की जिसमें 36 बिलकुल तैयार राफेल विमान खरीदने का फैसला किया ।  Goverment to Government  basis में किसी बिचौलिए या दलाल की आश्वयकता नहीं पड़ती जिससे निश्चित रूप से विमान की कीमत पर असर पड़ा है यानि इसमें दलालों को भी पैसे नहीं देने पड़े । फिर भी इन विमानों की कीमत इतनी बढ़ गयी इसकी वजह है वो पैकेज जो इस सौदे में राफेल के साथ मिला है । संभवतः यदि यूपीए भी इन पैकेजों के साथ ऐसी डील करती तो जहाज के दाम उसके समय में भी बढे होते । इन विमानों के आपूर्ति सितम्बर 2019 में होनी हैं ।

यूपीए सरकार के समय जो डील हुई थी वो सिर्फ विमान के लिए हुई थी या फिर उसमें हथियार या दूसरे उपकरण भी शामिल थे इसका सही सही पता आज तक नहीं चल पाया है । लेकिन मोदी सरकार के समय जो डील हुई है उसमे लड़ाकू विमानों के साथ साथ दुनिया की सबसे बेहतरीन मिसाइलों में से एक Meteor ( 100 किमी दूर उड़ रहे विमान को मार गिराने में सक्षम),SCALP (हवा से सतह में मार करने वाली मिसाइल 560 किमी तक मारक क्षमता) MICA (50 किमी मारक क्षमता) आदि शामिल हैं । ये आधुनिक हथियार आज के समय न तो हमारे पड़ौसी देश चीन के पास हैं और न ही पाकिस्तान के पास । किसी भी लड़ाकू विमान की कीमत सिर्फ विमान से ही नहीं होती है बल्कि उसमें लगे weapon system से होती है । इस विमान की कीमत बढ़ने का सबसे बड़ा कारण इसमें लगे कीमती और आधुनिक हथियार हैं,इसके बाद इस विमान में भारतीय जलवायु के हिसाब से विशेषकर लेह लद्दाख जैसे इलाकों के लिए कुछ बदलाव किए गए हैं यानी एक पैकेज है जिसमें विमान के रखरखाव से लेकर खराब होने पर होने वाले सभी खर्च शामिल हैं । सितम्बर 2019 में पहले चार सशस्त्र राफेल अम्बाला एयर बेस (पंजाब) तथा इसके तुरंत बाद हाशिमारा (पश्चिम बंगाल) में तैनात किये जायेंगे । Dessault Aviation द्वारा 227 करोड़ की लागत से अम्बाला एयर बेस में राफेल के लिए मूलभूत सुविधाएं जैसे रनवे और ट्रेडिंग सेंटर बनाने का कार्य किया जा रहा है ।

राफेल डील के पीछे सच कुछ भी हो लेकिन इतना जरूर सच है जो कार्य यूपीए सरकार पिछले कई सालों में नहीं कर पायी वो कार्य मोदी सरकार ने एक वर्ष में कर दिखाया और 36 राफेल विमानों की डील पक्की कर दी। ऐसा करना जरूरी भी क्योंकि ये मुद्दा राजनीति से नहीं बल्कि देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ था ।

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