जैन धर्म का इतिहास

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका हमारी हिंदी वेबसाइट ‘जय भारत’ पर । आज हम आपको जानकारी देंगे जैन सम्प्रदाय की । दोस्तों, 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल विश्व इतिहास में धर्मिक आंदोलन का काल माना जाता है । इसी काल में चीन में कनफ्यूशियस (Confucius: 551 ई.पू.-479 ई.पू.) के नेतृत्व में,ईरान में जरथुष्ट्र (Zoroaster: 628 ई.पू.-551 ई.पू. ) के नेतृत्व में तथा यूनान में पाइथागोरस (Pythagoras: 570 ई.पू.-495 ई.पू.) के नेतृत्व में धार्मिक जागरण शुरू हुआ । भारत में भी इस काल में अनेकों धार्मिक सम्प्रदायों का उदय हुआ जिनमें से जैन धर्म और बौद्ध धर्म महत्वपूर्ण थे । ये दोनों धर्म हिन्दू धर्म (ब्राह्मण धर्म) के ही सुधरे हुए नए रूप थे । ये दोनों धर्म आर्य संस्कृति की पृष्ठभूमि में जन्मे तथा उपनिषदों के दर्शन से अनुप्रमाणित थे । बाद में इन दोनों धर्मों का पृथक अस्तित्व बन गया ।

दोस्तों, इससे पहले की मैं आपको जानकारी दूँ जैन संप्रदाय की आइए जान लेते हैं की ‘धर्म और संप्रदाय’ में क्या अंतर है ।

धर्म – धर्म संस्कृत भाषा का एक शब्द है जो कि ‘धृ’ धातु से बना शब्द है जिसका अर्थ है ‘धारण करना’ । समय तथा परिस्थितियों के अनुसार उस समय जो सही आचरण है उसे धारण करना या उसे अपनाना को धर्म कहलाता है ।समय के साथ-साथ धर्म की परिस्थितियां भी बदलती जाती हैं  । जैसे-

  • यदि आप छात्र हैं तो आपका धर्म है पढ़ना ।
  • यदि आप एक अध्यापक हैं तो आपका धर्म है पढ़ाना ।
  • यदि आप एक पिता हैं तो आपका धर्म है बच्चों का लालन-पालन करना,उन्हें पढ़ाना ।

सम्प्रदाय- संप्रदाय का अर्थ है किसी एक व्यक्ति ,महापुरुष या किसी विशेष पुस्तक द्वारा बनाये गये नियमों का यदि किसी एक समाज विशेष द्वारा अनुसरण किया जाता है तो वह एक संप्रदाय कहलायेगा । जैसे-

  • बौद्ध एक धर्म है परन्तु इस धर्म के नियमों का अनुसरण करने वाले या महात्मा बुद्ध द्वारा बनाए गए नियमों का अनुसरण करने  वाला समाज बौद्ध सम्प्रदाय कहलायेगा ।
  • जैन धर्म का अनुसरण करने वाला समाज जैन सम्प्रदाय कहलाता है ।
  • कुरान के नियमों का अनुसरण करने वाला समाज मुस्लिम सम्प्रदाय कहलाता है ।

जैन धर्म

‘जैन’ शब्द ‘जिन’ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘जीतना’ अर्थात जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया वह जैन कहलाया ।

जैन धर्म अधिष्ठाता या अवतार को ‘तीर्थंकर’ कहा जाता है । जैन श्रुतियों के अनुसार जैन तीर्थंकरों की कुल संख्या 24 है । जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव अथवा आदिनाथ थे जिनका जन्म अयोध्या में माना जाता है । ऋषभदेव अयोध्या के राजा थे । जैन परम्परा के अनुसार ऋषभदेव ने अपने पुत्र भरत को राजगद्दी सौंपी ओर स्वंय संन्यास ग्रहण कर लिया । इसके पश्चात उन्होंने अट्ठावय(कैलाश) पर्वत पर आकर तपस्या आरम्भ की ओर इसी दौरान उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया ।

ऋग्वेद में पहले तीर्थंकर ऋषभदेव ओर बाईसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि के नामों का उल्लेख मिलता है । इसके अलावा ‘विष्णु पुराण’ और ‘भागवत पुराण’ में ऋषभदेव को नारायण का अवतार कहा गया है । दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ का उल्लेख यजुर्वेद में मिलता है । तीसरे जैन तीर्थंकर संभवनाथ का जन्म श्रावस्ती तथा छठे तीर्थंकर पद्मप्रभु का जन्म कोशाम्बी में माना जाता है ।

पहले तीर्थंकर से लेकर 22वें तीर्थंकरों तक का इतिहास में बहुत अधिक उल्लेख नहीं मिलता है । परन्तु अंतिम दो तीर्थंकरों पार्श्वनाथ एवम महावीर स्वामी की ऐतिहासिकता संदेह से परे है क्योंकि इन दोनों की ऐतिहासिक पुष्टि बौद्ध ग्रंथ एवं अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों से होती है । तो आईये जानते हैं ये 24 तीर्थंकरों व् उनके प्रतीकों के बारे में ।

  1. ऋषभदेव(आदिनाथ)-  सांढ
  2. अजितनाथ-  हाथी
  3. संभवनाथ-  घोड़ा
  4. अभिनंदन-  बंदर
  5. सुमतिनाथ-  सारस
  6. पद्मप्रभु-  लाल कमल
  7. सुपार्श्व-  स्वस्तिक
  8. चन्द्रप्रभ-  चन्द्र
  9. सुविधि (पुष्पदंत)-  मगर
  10. शीतल-  श्रीवत्स/ वक्ष
  11. श्रेयांस-  गैंडा
  12. वासुपूज्य-  भैंस
  13. विमल-  सुअर
  14. अनन्त-  बाज
  15. धर्म-  वज्र
  16. शांति-  हरिण
  17. कुंथ-  बकरा
  18. अर-  मछली
  19. मल्लि(मत्तिल)-  घोड़ा
  20. मुनिसुव्रत-  कछुआ
  21. नेमिनाथ-  नील कमल
  22. अरिष्टनेमि-  शंख
  23. पार्श्वनाथ-  सर्प
  24. महावीर-  सिंह

पार्श्वनाथ की जीवनी

23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति थे । पार्श्वनाथ का काल महावीर स्वामी के काल से 250 वर्ष पूर्व का माना जाता है । पार्श्वनाथ का जन्म 850 ईसा पूर्व के आस-पास वाराणसी (काशी) में हुआ था । इनके पिता अश्वसेन वाराणसी के इक्ष्वाकुवंशीय शासक थे तथा इनकी माता वामादेवी कुशस्थल नरेश नरवर्मा की पुत्री थी । पार्श्वनाथ का आरंभिक जीवन एक राजकुमार के रूप में बीता और युवास्था में आने पर उनका विवाह प्रभावती नामक राजकन्या से कर दिया जाता है । 30 वर्ष की आयु में पार्श्वनाथ राजसिंसहान और गृह त्यागकर सन्यासी बन जाते हैं तथा सम्मेद पर्वत के शिखर पर 83 दिनों की घोर तपस्या के बाद 84वें दिन कैवल्य (ज्ञान) की प्राप्ति होती है । सम्मेद शिखर कालांतर में पार्श्वनाथ पहाड़ी या पारसनाथ पहाड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुआ । सम्प्रति सम्मेद शिखर वर्तमान झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित है । ज्ञान प्राप्ति के पश्चात पार्श्वनाथ ने 70 वर्षों तक अपने मतों का प्रचार किया तथा 100 वर्ष की आयु में उन्होंने सम्मेद शिखर पर ही अपना भौतिक शरीर त्याग दिया ।

पार्श्वनाथ की शिक्षाएं

पार्श्वनाथ के अनुयायियों को निग्रंथ(निगंठ) कहा जाता था । निग्रंथों के 4 गण अथवा संघ थे । प्रत्येक गण एक गणधर (संघ प्रमुख) के अंतर्गत आते थे । जैन धर्म के प्राचीनतम सिद्धांतों का उपदेष्टा पार्श्वनाथ को ही माना जाता है लेकिन ज्यादातर विद्द्वान महावीर स्वामी को जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक मानते हैं ।

पार्श्वनाथ ईश्वरवाद,वैदिक कर्मकाण्ड तथा जाति-प्रथा के कटु आलोचक थे । पार्श्वनाथ का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त करने का अधिकार है चाहे वो किसी भी जाती का हो । पार्श्वनाथ ने अपने धर्म में नारियों को प्रवेश दिया । उन्होंने अपने अनुयायियों को मात्र तीन वस्त्र धारण करने का आदेश दिया जबकि महावीर स्वामी ने अपने अनुयायियों को वस्त्र का पूर्ण त्याग करने को कहा ।

पार्श्वनाथ ने 4 संकल्पों (सिद्धांतों) का प्रतिपादन किया जो  निम्नलिखित

  1. अहिंसा- दूसरों के प्रति हिंसा की भावना नहीं रखना ।
  2. सत्य- हमेशा सत्य बोलना ।
  3. अस्तेय- कभी चोरी न करना ।
  4. अपरिग्रह- धन का संग्रह न करना ।

महावीर स्वामी ने पार्शवनाथ के 4 संकल्पों को ग्रहण किया और इनमे एक संकल्प ‘ब्रह्मचर्य’ जोड़ दिया । महावीर स्वामी के माता-पिता भी पार्श्वनाथ के मत के अनुयायी थे । जैन ग्रंथों में पार्श्वनाथ को ‘तीर्थंकर’ (पथ-प्रवर्तक) तथा ‘पुरिसादनीय’ (महान पुरुष) कहा जाता है ।

महावीर स्वामी

महावीर स्वामी का जन्म 540 ईसा पूर्व वैशाली के निकट कुण्डग्राम नामक स्थान पर हुआ (हालांकि कुछ विद्वान बिहार के नालन्दा जिले में स्थित कुण्डलपुर को महावीर का जन्म स्थल मानते हैं) । महावीर स्वामी जांत्रिक (ज्ञातृक) नामक क्षत्रिय कुल के थे । महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था । महावीर के पिता का नाम सिद्धार्थ था तथा वे वज्जि संघ के 8 गणराज्यों में से एक गणराज्य जांत्रिक में स्थित कुण्डग्राम के राजा थे । महावीर की माता का नाम त्रिशला था तथा वह लिच्छवि नरेश चेटक की बहिन था ।
एक जैन मान्यता के अनुसार वर्द्धमान पहले ऋषभदत्त नामक एक ब्राह्मण की पत्नी देवानंदा के गर्भ में आये परंतु बाद में भगवान इंद्र ने वर्द्धमान को देवानंदा के गर्भ से हटाकर त्रिशला के गर्भ में स्थापित कर दिया । क्योंकि अभी तक जितने भी तीर्थंकर हुए थे वो सब क्षत्रिय वंश में उत्पन्न हुए थे ।

ऐसा कहा जाता है कि वर्द्धमान के जन्म पर देवताओं की आकाशवाणी हुई कि या तो वर्द्धमान एक चक्रवर्ती सम्राट होंगे या फिर एक परमज्ञानी सन्यासी । वर्द्धमान के जन्म के पश्चात राज्य में अतुलनीय आर्थिक समृद्धि हुई जिस कारण उनका नाम वर्द्धमान रखा गया । वर्द्धमान सिद्धार्थ के सबसे छोटे बेटे थे । वर्द्धमान को अच्छी शिक्षा दीक्षा दी गयी । जब वर्द्धमान 30 वर्ष के हुए तो उनके पिता सिद्धार्थ की मृत्यु हो गई । सिद्धार्थ की मृत्यु के पश्चात वर्द्धमान के अग्रज नंदिवर्धन राजा बने ।

विवाह

महावीर का यशोदा नामक एक राजकन्या से विवाह हुआ जो समरवीर नरेश की पुत्री थी । उनके एक पुत्री हुई जिसका नाम अणोज्या ( प्रियदर्शना ,प्रियदर्शनी) रखा गया । प्रियदर्शना का जमालि से विवाह कर दिया जाता है जो बाद में महावीर स्वामी के प्रथम शिष्य बनते हैं ।

संन्यासी जीवन

अपने अग्रज नंदिवर्धन से आज्ञा लेकर 30 वर्ष की आयु में वर्द्धमान ने गृह त्याग दिया और संन्यासी(यती) हो गए । जैन ग्रन्थ ‘कल्पसूत्र’ के अनुसार महावीर ने 12 वर्षों तक संन्यासी जीवन व्यतीत किया और इस दौरान उन्होंने वस्त्र नहीं बदला केवल एक ही वस्त्र में रहे । 42 वर्ष की आयु में जुम्भिकाग्राम (जुम्भियग्राम) के निकट उज्जुवालिया (ऋजुपालिका) नदी के तट पर एक पुराने मंदिर के साल वृक्ष के नीचे कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई । कैवल्य प्राप्ति के पश्चात उन्होंने एक वस्त्र का भी त्याग कर दिया इसके उपरान्त वे केवलिन अर्थात पूर्ण ज्ञानी कहलाये ।
तपस्या द्वारा समस्त इन्द्रियों को जीतने के कारण उन्हें ‘जिन’ (इन्द्रियों को जीतने वाला) कहा गया तथा इनके अनुयायियों को ‘जैन’ कहा जाने लगा । तपस्वी जीवन मे महान पराक्रम प्रदर्शित करने के कारण उन्हें ‘महावीर’ कहा जाने लगा ।

महावीर स्वामी की शिक्षाएं

महावीर स्वामी ने अर्द्धमागधी प्राकृत भाषा में उपदेश दिए । महावीर ने सर्वप्रथम पावा नामक स्थान पर 11 ब्राह्मणों को उपदेश दिया जिन्हें 11 गणधर/ गंधर्व कहा जाता है । महावीर स्वामी ने पावा में जैन संघ की स्थापना की ।
महावीर स्वामी ने 30 वर्षों तक कोशल, मगध,चम्पा आदि राज्यों का भ्रमण कर अपनी शिक्षा का प्रचार किया । महावीर स्वामी वर्ष के 8 महीनों तक अपनी शिक्षाओं का प्रचार करते तथा बाकी के 4 महीने वर्षा ऋतु होने के कारण भारत के पूर्व के किसी प्रसिद्ध नगर में बिताते थे ।

महावीर के प्रमुख विचार-सूत्र

  • ‘वत्थु सहावो धम्म’ अर्थात वस्तु का जो स्वभाव है उसमें ठहर जाना धर्म है ।
  • सभी जीना चाहते हैं तथा सभी के लिए जीवन प्रिय है ।
  • समस्त चेतन-अचेतन वस्तुओं में आत्मा निवास करती है अतः किसी भी प्रकार उनका अपकार करने पर वे दुःख महसूस करते हैं ।

महावीर स्वामी का कहना था कि छोटे पुजारियों को कृषि कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे पेड़-पौधे व जीव-जन्तुओं का अंत होता है । इसीलिए जैनियों ने क्रिया-कलापों को व्यापार-वाणिज्य तक ही सीमित रखा है ।

महावीर अक्सर हर्यंक शासक बिम्बिसार व अजातशत्रु के दरबार मे जाते थे । राजपरिवार से संबंधित होने के कारण धर्म प्रचार में उन्हें शासक वर्ग से पर्याप्त सहायता मिली ।

महावीर स्वामी के अनुयायी

लिच्छवि नरेश चेटक, मगध नरेश बिम्बिसार तथा बिम्बिसार की 10 रानियां, मगध नरेश अजातशत्रु, अवन्ति नरेश प्रद्योत तथा प्रद्योत की 8 रानियां, कोशाम्बी नरेश की रानी मृगावती तथा सिंधु सौवीर नरेश उदयन आदि महावीर स्वामी के अनुयायी थे ।

जैन धर्म के समर्थक राजा

उदयन, बिम्बिसार, अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, खारवेल तथा अमोघवर्ष जैन धर्म के समर्थक राजा थे ।

जैन धर्म की शिक्षाएं व सिद्धांत

जैन धर्म मे सांसारिक तृष्णा व बंधन से मुक्ति को मोक्ष (निर्वाण) कहा जाता है । मोक्ष ही जीवन का अंतिम लक्ष्य होता है । कर्म ही पुनर्जन्म का कारण है तथा कर्मफल से विमुक्ति ही मोक्ष प्राप्ति का साधन है ।

सृष्टि

जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है । जैनधर्म के अनुसार सृष्टि की रचना ,पालन व संहार ईश्वर
द्वारा नहीं होता है जैसा कि ब्राह्मण धर्म मानता है बल्कि यह शाश्वत है यानी यह अनादि काल से चली आ रही है और अनन्त काल तक चलती रहेगी । जैन धर्म के अनुसार सृष्टि का क्रम अबाध है और यह निरंतर चलता रहता है । जैन धर्म के अनुसार सृष्टि में अनेकों काल- चक्रों में प्रत्येक के  दो काल या अवधियां होती है-पूर्वार्द्ध की अवधि उत्थान की  तथा उत्तरार्द्ध की अवधि अवसान की । इस काल चक्र के उत्थान काल को ‘उत्सर्पिणी’ तथा अवसान काल को ‘अवसर्पिणी’ कहा जाता है ।

दो तत्व-जीव व अजीव

जैन धर्म के अनुसार यह सृष्टि जीव तथा अजीव नामक दो मूल तत्वों से मिलकर बनी है ।

  1. जीव- जीव एक चेतन तत्व है जैसे -आत्मा । जैन धर्म के अनुसार जीव (आत्मा) न केवल मनुष्यों और पशु-पक्षियों में बल्कि पेड़-पौधों ,पत्थरों व जल में भी पाया जाता है ।
  2. अजीव- अजीव के अंतर्गत 5 तत्व आते हैं जैसे- पुदगल(पदार्थ), काल , आकाश, धर्म व अधर्म ।

कर्म-बंधन

जीव का चरम लक्ष्य निर्वाण अर्थात मोक्ष की प्राप्ति है ।जीव अपने मूल रूप में अत्यंत निर्मल व चैतन्य होता है कालान्तर में वह कर्मों के बंधनों में पड़ जाता है ।

सांसारिक विषय-वासनाओं से आकर्षित होकर कर्म करता है और जीव(आत्मा) इन्हीं कर्म के बंधनों में बंध जाता है । जब जीव कर्म के इन बंधनों को तोड़ देता है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है ।जैन धर्म के अनुसार कर्मों के इन बंधनों से छुटकारा पाने के लिए दो कार्य आवश्यक है- 1. सम्वर (रोकना) तथा 2. निर्जरा (झड़ना)

  1. सम्वर- नए कर्मों के प्रवाह को जीव की तरफ बढ़ने से रोकना चाहिए । यह कार्य संयम व सदाचार के लिए किया जाता है ।
  2. निर्जरा- जो कर्म जीव (आत्मा) में प्रवेश कर गए हैं तथा पूरी तरह से छा गए हैं उन्हें हटाना चाहिए । ऐसा कठिन तपस्या द्वारा किया जा सकता है ।

इस प्रकार जब जीव में कर्मों के अवशेष बिल्कुल समाप्त हो जाते तो वह निर्वाण की प्राप्ति कर लेता है ।

त्रिरत्न

जैन धर्म के अनुसार कर्मफल से मुक्ति तथा निर्वाण(मोक्ष) की प्राप्ति के लिए त्रिरत्न का अनुशीलन आवश्यक है ।

  1. सम्यक दर्शन (श्रद्धा)- तीर्थंकरो व उनके उपदेशों में श्रद्धा व दृढ़ विश्वास ।
  2. सम्यक ज्ञान – जैन धर्म के सिद्धांतों का वास्तविक ज्ञान होना ।
  3. सम्यक आचरण – कुकर्म व दुराचार से दूर रहना तथा सुकर्म व सदाचार का पालन करना ।

जैन धर्म मे जैन भिक्षुओं के लिए पांच व्रतों का विधान किया गया है जिसे ‘पंचमहाव्रत’ कहा जाता है । इनमें से पांच व्रतों का विधान पार्श्वनाथ द्वारा किया गया तथा पांचवा व्रत महावीर स्वामी ने जोड़ा । ये पांच व्रत निम्नलिखित हैं-

  1. अहिंसा- जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल लिया गया है ।
  2. सत्य- सत्य को केवल सत्य बोलना चाहिए ।
  3. अस्तेय- किसी भी तरह की चोरी न करना ।
  4. अपरिग्रह- किसी तरह की धन संपत्ति का संग्रह न करना ।
  5. ब्रह्मचर्य- पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना ।

इन पंचमहाव्रतों का पालन न कर पाने वाले गृहस्थों (श्रावक व श्राविका) के लिए इनकी कठोरता में कमी करते हुए ‘पंचअणुव्रत’ का विधान किया गया है । इन अणुव्रतों का नामकरण पंचमहाव्रतों के नाम के आगे अणुव्रत जोड़कर किया गया है ।

इसी प्रकार प्रत्येक गृहस्थ के लिए पंचअणुव्रतों के साथ-साथ सात शीलव्रत का पालन करने के लिए भी कहा गया है । इन सात शीलव्रतों में तीन गुणव्रत तथा चार शिक्षाव्रत हैं ।

गुणव्रत

  1. दिग्व्रत- प्रत्येक दिशा में एक दूरी का निर्धारण करना चाहिए तथा उसके आगे भ्रमण करने के लिए नहीं जाना चाहिऐ ।
  2. अनर्थदण्डव्रत – अनर्थ से प्राप्त किसी भी वस्तु को ग्रहण नहीं करना चाहिऐ ।
  3. देशव्रत- किन्हीं विशेष क्षेत्रों में अपना कार्य सीमित रखना चाहिए ।

शिक्षाव्रत

  1. सामयिक- प्रतिदिन तीन बार चिंतन करना चाहिए ।
  2. प्रोषधोपवास- सप्ताह में एक बार उपवास रखना चाहिए ।
  3. उपभोग-प्रतिभोग परिणाम व्रत- वस्तुओं के दैनिक उपभोग को नियमित करना ।
  4. अतिथि संविभाग- अतिथियों को भोजन कराना ।

स्यादवाद/सप्तभंगिनयवाद /अनेकांतवाद

स्यादवाद जैन धर्म का बहुत प्रसिद्ध सिद्धांत है । यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है । इस सिद्धांत के अनुसार किसी बात को अंतिम रूप से स्वीकारना या अस्वीकारना संभव नहीं है क्योंकि ज्ञान एक सापेक्ष गुण है ।जैन धर्म के अनुसार ज्ञान के पांच प्रकार हैं-

  1. मति- इन्द्रियों की अनुभूति से प्राप्त ज्ञान ।
  2. श्रुति- श्रुति द्वारा प्राप्त ज्ञान ।
  3. अवधि- दिव्य या अलौकिक ज्ञान ।
  4. मनः पर्याय- दूसरों के मन की बात का ज्ञान ।
  5. कैवल्य(पूर्ण ज्ञान)- कैवल्य एक विशिष्ट ज्ञान है जो केवल विशिष्ट व्यक्ति जैसे तीर्थंकर, निर्गन्थ आदि के पास होता है ।

जैन धर्म के अनुसार ज्ञान के तीन स्त्रोत होते हैं-

  1. प्रत्यक्ष
  2. अनुमान
  3. तीर्थंकर (तीर्थंकरों के उपदेश)

जैन धर्म के अनुसार ज्ञान क्या है इस प्रश्न का उत्तर प्रत्येक व्यक्ति अपने दृष्टिकोण व अनुभव के आधार पर देता है । ज्ञान की यह विभिन्नता सात प्रकार की होती है जिसे ‘सप्तभंगीनय’ कहा जाता है ।

काया-क्लेश

  • जैन धर्म मे तप पर अधिक बल दिया गया है ।
  • काया-क्लेश के अंतर्गत उपवास द्वारा शरीर के अंत का विधान है ।
  • जैन श्रुतियों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के आध्यात्मिक गुरु भद्रबाहु ने भी काया-क्लेश (सल्लेखना) द्वारा अपना शरीर त्यागा था ।

जैन धर्म का विस्तार

महावीर स्वामी ने अपने जीवन मे मगध तथा उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में अपने विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया । महावीर स्वामी द्वारा स्थापित संघ(गण) में कुल 11 शिष्य थे जिन्हें गणधर कहा जाता था । जैन ग्रंथ कल्पसूत्र के अनुसार 11 गणधरों के नाम – 1. आनंद , 2. कामदेव , 3. सुरदेव , 4. कुण्डकोलिय , 5. महासायग , 6. सद्दलपुत्र , 7. चुल्लसायग , 8. अग्निभूति , 9. वायुभूति , 10. इंद्रभूति , 11. सुधर्मा आदि थे । सुधर्मा अकेला ऐसा गणधर था जो महावीर स्वामी की मृत्यु के पश्चात भी जीवित रहा । सुधर्मा को ‘जैन धर्म का प्रथम थेरा’ यानी मुख्य उपदेशक कहा जाता है । सुधर्मा की मृत्यु महावीर स्वामी की मृत्यु के 20 वर्ष पश्चात हुई ।

नन्द वंश के अन्तिम सम्राट धनानंद के शासनकाल में जैन संघ का सञ्चालन दो थेरों (आचार्यों) द्वारा किया जाता था । ये दो आचार्य थे -सम्भूतिविजय व उसके शिष्य स्थूलभद्र ।

श्वेताम्बर सम्प्रदाय तथा दिगम्बर सम्प्रदाय

सम्भूतिविजय की मृत्यु उसी वर्ष ( 322 ईसा पूर्व ) हो जाती है जिस वर्ष चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण होता है । भद्रबाहु छठा थेरा था तथा वह चन्द्रगुप्त का समकालीन था ।

चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन के अन्तिम वर्ष यानि 298 ईसा पूर्व में मगध में भयंकर अकाल पड़ा । यह अकाल 12 वर्षों तक रहा. इस समय जैन संघ के दो अध्यक्ष थे -भद्रबाहु तथा स्थूलभद्र ।

अकाल के दौरान स्थूलभद्र तथा उसके अनुयायी मगध में ही रहे जबकि भद्रबाहु अपने अनुयायिओं के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चले गए । चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी भद्रबाहु का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया था तथा वह भी भद्रबाहु के साथ गया था लेकिन अकाल की समाप्ति के पश्चात वह मगध वापिस लौट आता है । कालांतर में इन दोनों में सैद्धांतिक मतभेद हो गया था तथा जैन धर्म दो संप्रदायों में बंट गया । स्थूलभद्र के अनुयायी श्वेताम्बर सम्प्रदाय के जैन तथा भद्रबाहु के अनुयायी दिगम्बर सम्प्रदाय के जैन कहलाये ।

आइये जानते हैं इन दोनों संप्रदायों में क्या विभिन्नताएं हैं-

  • श्वेताम्बर का शाब्दिक अर्थ है श्वेत (सफेद)+अम्बर (वस्त्र) अर्थात जो सफ़ेद वस्त्र पहनता हो । श्वेताम्बर सम्प्रदाय के अनुयायी सफ़ेद वस्त्र पहनते थे क्योंकि सफ़ेद वस्त्र को निर्वाण(मोक्ष) प्राप्ति में बाधक नहीं माना जाता था । जबकि दिगम्बर का शाब्दिक अर्थ है दिक्(दिशा)+ अम्बर (वस्त्र) अर्थात जो वस्त्र ही न पहनता हो । दिगम्बर सम्प्रदाय के अनुयायी वस्त्र नहीं पहनते थे क्योंकि ये वस्त्र को निर्वाण(मोक्ष) प्राप्ति में बाधक मानते थे ।
  • श्वेताम्बर सम्प्रदाय का मानना था कि स्त्रियों को भी इसी जीवन में मुक्ति पाने का अधिकार है जबकि दिगम्बर सम्प्रदाय इसका विरोध करता है।
  • श्वेताम्बर सम्प्रदाय का मानना है कि कैवल्य प्राप्ति के बाद भी भोजन की आवश्यकता पड़ती है जबकि दिगम्बर सम्प्रदाय का मानना था कि कैवल्य प्राप्ति के बाद उपवास करके भी रहा जा सकता है ।
  • श्वेताम्बर सम्प्रदाय का मानना है कि महावीर स्वामी ने विवाह किया था तथा उनके संतान भी थी जबकि दिगम्बर सम्प्रदाय का मानना है कि महावीर स्वामी ने विवाह नहीं किया था ।
  • श्वेताम्बर सम्प्रदाय का मानना है कि 19वें तीर्थंकर मल्लि स्त्री थीं जबकि दिगम्बर सम्प्रदाय का मानना है कि वे पुरुष थे ।
  • श्वेताम्बर सम्प्रदाय जैन आगम ग्रन्थ को स्वीकार करता है जबकि का कहना है दिगम्बर सम्प्रदाय का मानना है कि मूल आगम ग्रंथ खो चुका है ।

अगली शताब्दियों में पुनः इन दोनों संप्रदायों में कई विभाजन हुए जिनमे से वह सम्प्रदाय महत्वपूर्ण था जिसने मूर्ति-पूजा त्यागकर जैन-ग्रंथों की पूजा शुरू की । जैन ग्रंथों के पूजकों में श्वेताम्बर सम्प्रदाय से निकले तेरापंथी जैन तथा दिगम्बर सम्प्रदाय के समैयापंथी/तारणपंथी जैन उल्लेखनीय हैं ।

पहली सदी में मथुरा तथा उज्जैन जैन धर्म के प्रमुख केन्द्र थे । धीरे-धीरे यह धर्म क्रमशः दक्षिण और पश्चिम में फैला । पांचवीं सदी में कर्नाटक में अनेकों जैन मठ (वसदि) की स्थापना हुई । तत्कालीन शासकों द्वारा इन्हें भूमिदान दिया गया । हालाँकि जैन धर्म को बौद्ध धर्म जितना राजाश्रय प्राप्त नहीं हुआ फिर भी यह जहाँ तक भी पहुंचा वहां आज तक भी अपनी पकड़ बनाए हुए है ।

कालांतर में जैन धर्म में कई बार विभाजन आना ,12वी सदी में राजकीय सरंक्षण में कमी, जाती प्रथा में दुर्गुण तथा हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान आदि इस धर्म के ह्रास का कारण बने ।

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