महात्मा बुद्ध की जीवनी

अपने विचारों से दुनिया को एक नई राह दिखाने वाले महान धर्मगुरु और समाज सुधारक महात्मा बुद्ध का जन्म आज से लगभग 2600 वर्ष पूर्व हुआ । वे संसार को दुःखों और जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति दिलाने वाले दिव्य मार्ग की तलाश में अपने राजमहल के ऐशो-आराम छोड़कर जंगलों की तरफ निकल पड़ते हैं । कई वर्षों की कठोर साथना के पश्चात् बौधगया (बिहार) में बोधि वृक्ष (एक पीपल का पेड़) के नीचे उन्हें बौद्ध (ज्ञान) की प्राप्ति हुयी और वह गौतम बुद्ध कहलाये । आज बौद्ध धर्म के देश और विदेश में करोड़ों अनुयायी हैं । ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म के बाद बौद्ध धर्म विश्व का तीसरा बड़ा धर्म है । तो आइये दोस्तों जानते हैं कि किन परिस्थितियों में महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ और कैसे हुआ बौद्ध धर्म का उदय ।

महात्मा बुद्ध की जीवनी

महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व तत्कालीन शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बनी नामक स्थान पर हुआ । इस बच्चे का नाम सिद्धार्थ रखा गया । सिद्धार्थ के पिता का नाम शुद्धोधन था जो इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य-कुल के थे और शाक्य गणराज्य के राजा थे तथा उनकी माता का नाम महामाया देवी था जो कोलीय वंश की थी । महामाया देवी कपिलवस्तु से अपने पीहर देवदह जा रही थी कि रास्ते में (लुम्बनी के वनों) उन्हें उदरपीड़ा हुई और वहीं उन्होंने सिद्धार्थ को जन्म दिया । गौतम गोत्र में जन्म लेने के कारण उन्हें गौतम तथा शाक्य जाति का होने के कारण उन्हें शाक्यमुनि कहा जाता था । सिद्धार्थ को जन्म देने के सात दिन पश्चात् ही उनकी माता महामाया देवी का निधन हो जाता है । मां के निधन के पश्चात उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने उनका पालन-पोषण किया जो महामाया देवी की छोटी बहिन तथा शुद्धोधन की दूसरी पत्नी थी ।

सिद्धार्थ के जन्म पर पिता शुद्धोधन ने पांचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया तथा बालक का भविष्य जानने के लिए 8 ब्राह्मण विद्वानों को आमंत्रित किया गया ने जिनमे सभी संतों ने लगभग एक सी भविष्यवाणी की कि या तो ये बच्चा एक महान राजा बनेगा या फिर एक महान संत जिसके ज्ञान व शिक्षाओं से पूरे विश्व को एक नई राह मिलेगी । इसीलिए ब्राह्मणों द्वारा उसका नाम सिद्धार्थ ((वह जो सिद्धि प्राप्त करने के लिए जन्मा हो) )रखा गया । लेकिन पिता शुद्धोदन नहीं चाहते थे कि उसका बेटा कोई संत बने बल्कि वे उसे अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे । इसीलिए पिता शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को बचपन से ही राजकीय ऐशो-आराम में रखा और मात्र 16 वर्ष की आयु में ही यशोधरा नामक एक सुन्दर कन्या से विवाह कर दिया ताकि सिद्धार्थ सांसारिक दुखों कभी परिचित ही न हो और उसका रूझान कभी भी एक संत बनने की तरफ ना हो । राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ के ऐशो-आराम के लिए तीनों ऋतुओं के अनुसार तीन अलग-अलग महल बनवाये जहाँ सिद्धार्थ के मनोरंजन के लिए नाच-गान का प्रबंध था और सेवा के लिए दासियाँ रखीं गयी थीं । लेकिन उन्होंने कभी राजसी जीवन का आनंद नहीं लिया और वे हमेशा अकेले व् शांत रहते थे । इसी महल में उनके पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया ।

सिद्धार्थ बचपन से ही करुणायुक्त और शांत स्वभाव के थे । कई बार घुड़दौड़ के समय दोड़ते-दौड़ते जब घोड़े में मुंह से झाग आ जाता था तो वे घोड़े को थका जानकर रास्ते में ही रोक देते थे और इस प्रकार घुड़सवारी की जीती हुई प्रतियोगिता भी हार जाते थे । एक बार सिद्धार्थ के चचेरे भाई देवदत्त के तीर द्वारा एक हँस जख्मी हो जाता है तो सिद्धार्थ को बहुत दुःख होता है,वो देवदत्त से हँस छीन लेते है और हंस के प्राणों की रक्षा करते हैं । इस प्रकार बचपन की ऐसी बहुत सी घटनाएं थीं जो उनकी दयालुता का प्रमाण थीं ।

सिद्धार्थ के मन को विचलित कर देने वाली घटनाएं

एक बार सिद्धार्थ ने नगर में घूमने की इच्छा प्रकट की । उन्हें नगर में भ्रमण करने की इजाजत मिल गयी । राजा शुद्धोदन ने नगर रक्षकों को आदेश दिया कि वे सिद्धार्थ के नगर भ्रमण के दौरान रास्ते में ऐसा कोई दर्शय न आने दें जिससे उसके मन में वैराग्य पैदा हो । सिद्धार्थ नगर का भ्रमण कर रहे थे कि रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा आदमी दिखा जो बहुत ही कमजोर अवस्था में था तथा लाठी का सहारा लिए चल रहा था । उस बूढ़े व्यक्ति को इस अवस्था में देखा तो उन्हें बहुत ही दुःख हुआ और देखते -देखते सारथि से सवाल किया कि इस व्यक्ति की ये दशा क्यों है,ये लाठी का सहारा लेकर क्यों चल रहा है । इस पर सारथि ने जबाब दिया की ये एक बूढ़ा व्यक्ति है,हर व्यक्ति बूढ़ा होता है और बूढ़ा होने पर हर व्यक्ति कमजोर और इसी अवस्था में हो जाता है ।

कुछ दूर चलने के उपरांत रास्ते में एक रोगी व्यक्ति मिलता है जो सड़क किनारे बैठा रो रहा था । जब सिद्धार्थ ने सारथि से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि यह व्यक्ति कुष्ठ रोग से पीड़ित है तथा इसकी वेदनाएं यह सहन नहीं कर पा रहा है इसीलिए यह रो रहा है ।

सिद्धार्थ कुछ ही दूरी पर और चले थे कि रास्ते में उन्हें एक मृत व्यक्ति दिखाई दिया जिसे कुछ लोग अपने कंधे पर उठाकर ले जा रहे थे । सिद्धार्थ के पूछने पर सारथि ने बताया कि इस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी है, उसे वे लोग कंधे पर उठाकर श्मशान ले जा रहे हैं ,ये प्रकर्ति का नियम है ,जो व्यक्ति जीवित है उसकी मृत्यु अटल है । एक और घटना में एक सन्यासी ने सिद्धार्थ को बहुत अधिक प्रभावित किया जो सांसारिक कामनाओं से मुक्त प्रसन्न दिखाई दे रहा था ।

महाभिनिष्क्रमण (गृह त्याग)

इन घटनाओं ने सिद्धार्थ के मन को विचलित कर दिया ,उनका वैराग्य भाव और अधिक बढ़ गया ,सांसारिक सुखों से उनका मन उठ गया । राजकुमार सिद्धार्थ जीवन और मरण के इस रहस्य को जानने के लिए व्याकुल हो उठे । उन्होंने इस सत्य की खोज के लिए अपना परिवार और राजसी सुख-सुविधाओं को छोड़ने का निश्चय किया ।  वो अपने पिता से परिवार त्यागने की अनुमति मांगते हैं परन्तु पिता सिद्धार्थ ने इसकी अनुमति देने से इंकार कर दिया और सिद्धार्थ को समझाते हुए कहा कि उसे सन्यासी नहीं बल्कि इस राज्य का उत्तराधिकारी राजा बनना है ।परन्तु एक रात राजकुमार सिद्धार्थ सत्य की खोज में अपनी पत्नी यशोधरा और नवजात शिशु राहुल को सोते हुए छोड़कर चले जाते है । उस समय उनकी आयु लगभग 29 वर्ष थी ।

सत्य की खोज में भटकना

गृहत्याग करने के पश्चात उन्होंने राजगृह में भिक्षा मांगी । उन्होंने योग-शिक्षक अलार कलाम और उद्दक रामपुत्र से ध्यान योग सिखा (त्रिपिटक के अनुसार अलार कलाम गौतम बुद्ध के गुरुओं में से एक थे ) । उन्होंने समाधि लगाई परन्तु दो आचार्यों से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात भी उन्हें संतोष प्राप्त नहीं हुआ ।  इसके पश्चात वे उरुवेला की रमणीय वनस्थली पहुंचे  जहाँ उन्हें पांच सन्यासी मिले ।  उन्होंने घोर तपस्या की । सिद्धार्थ ने तपस्या के दौरान पहले तो तिल-चावल का आहार किया लेकिन बाद में वो निराहार रहकर ही तपस्या करते थे । उनका शरीर सूख कर काँटे के समान हो गया था । कई वर्षों तक सिद्धार्थ ने कठोर तपस्या की । एक दिन जब वो तपस्या में लीन थे तो उनके कानों में कुछ महिलाओं के गीत के स्वर पड़े जो कुछ ऐसा गा रहीं थीं  -वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो- ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा- पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएँ । सिद्धार्थ समझ गये कि नियमित आहार भी ईश्वर सिद्धि के लिए आवश्यक है,शरीर को कष्ट देकर ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती,अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती । किसी भी सिद्धि के लिए मध्यम मार्ग ही उचित होता है अतः उन्होंने पुनः आहार शुरू कर दिया । 6 वर्षों तक कठोर तपस्या करने के पश्चात भी उन्हें संतुष्टि नहीं मिली,जो ज्ञान,जो सिद्धि वो हासिल करना चाहते थे उससे तो वो अभी भी कोसों दूर थी ।

ज्ञान प्राप्ति

सिद्धार्थ अपना परिवार छोड़ने के पश्चात भी बौद्ध प्राप्ति के लिए 6 वर्षों तक भटकते रहे । भटकते-भटकते एक दिन वो गया पहुंचे और वहीँ एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान लगाकर बैठ गए । सिद्धार्थ ने संकलप लिया कि भले ही मेरे प्राण चले जाएँ परन्तु में तब तक समाधी नहीं छोडूंगा जब तक कि मुझे ज्ञान नहीं प्राप्त हो जाता । 7 दिन और 7 रात्रि बीतने के के पश्चात आठवें दिन वैशाख पूर्णिमा थी । कहा जाता है की इस दिन जब सिद्धार्थ ध्यानमग्न अवस्था में थे तो उस पीपल वृक्ष को पास के गांव की सुजाता नामक एक स्त्री अपनी मन्नत पूरी होने पर गाय के दूध की खीर चढाने आती है । इस स्त्री ने पीपल वृक्ष से कभी पुत्र प्राप्ति की मनोकामना की थी और कुछ समय पश्चात उसे पुत्र होता है अतः वह मनोकामना पूर्ण होने पर पीपल वृक्ष के पास आती है । जब सुजाता ने सिद्धार्थ को ध्यानावस्था में देखा तो उसे लगा की वृक्ष देवता स्वयं उसकी पूजा लेने के लिए ध्यानमग्न बैठे हैं । सुजाता ने बड़े ही आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा-जैसे मेरी मनोकामना पूर्ण हुई वैसे आपकी भी हो । उसी रात उनकी साधना सफल हुई उन्हें बौद्ध (ज्ञान) की प्राप्ति हुई । जिस वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ उसे बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है तथा गया के नजदीक के उस स्थान को बोधगया के नाम से जाने लगा । उस समय महात्मा बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी ।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात सिद्धार्थ को बुद्ध का जाने लगा । दोस्तों यहाँ में आपको बुद्ध के अर्थ की जानकारी देना चाहता हूँ ।

  • बुद्ध- ज्ञान संपन्न व्यक्ति या ज्ञानी व्यक्ति
  • बोध -ज्ञान या जानकारी

महात्मा बुद्ध के उपदेश और शिक्षाएँ

महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपने पांच साथियों को ढूंढते हुए ऋषिपत्तन नामक स्थान पर पहुंचे जहां वर्तमान में सारनाथ स्थित है (पहले यहाँ घने वन होते थे जिसमे मृग विहार करते थे) । यहीं पर उन्होंने धर्मचक्रप्रवर्तन शुरू करते हुए अपना पहला उपदेश अपने पांच मित्रों को दिया । सारनाथ बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों ( लुम्बिनी,बोधगया, कुशीनगर और सारनाथ ) में से एक है । महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश संस्कृत भाषा में देने की बजाय उस समय की सरल लोक-भाषा पाली में दिए ताकि आमजन को उनकी शिक्षाएं समझ में आ जाये ।

महात्मा बुद्ध ने प्राणी मात्र के प्रति दया ,सत्य और अहिंसा का सन्देश दिया । उन्होंने इच्छा को सभी दुखों का कारण बताया । महात्मा बुद्ध ने अपनी शिक्षा में चार आर्य सत्य बताये दुख,समुदय, निरोध और मार्ग । उन्होंने अष्टांगिक मार्ग (मध्यम मार्ग) को दुखों से मुक्ति पाने एवं आत्म-ज्ञान के साधन के रूप में बताया गया है ।

चार आर्य सत्य

  1. दुख- प्राणी ताउम्र विभिन्न प्रकार के दुखों की श्रृंखला में घिरा रहता है यही दुख प्रथम आर्य सत्य है ।
  2. समुदय- हर प्राणी किसी न किसी तृष्णा (इच्छा) के साथ जीता है और मर जाता है ,इसी की प्रेरणा से प्राणी पुनः जन्म लेता है यही तृष्णा ही समुदय आर्यसत्य है ।
  3. निरोध- तृष्णा के समाप्त होने से प्राणी को संसार की किसी भी वस्तु से दुख नहीं उठाना पड़ता है और न ही प्राणी को पुनर्जन्म लेना पड़ता है । तृष्णा का अशेष प्रहाण कर देना ( इच्छा को समाप्त कर देना ) निरोध आर्यसत्य है ।
  4. मार्ग- निरोध की प्राप्ति एक मार्ग पर चलकर सम्भव हो जाती है जो अष्टांगिक मार्ग (मध्यम मार्ग) है । इसके आठ अंग है जिन पर चलकर प्राणी सभी दुखों और जन्म-मरण के बंधनो से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।

अष्टांगिक मार्ग क्या हैं

  1. सम्यक दृष्टि (सम्मा दिट्ठी) – सम्यक दृष्टिका अर्थ है सही दृष्टि वस्तुओं को उसके वास्तविक स्वरूप में देखना । सत्य,असत्य, पाप-पुण्य और सुख-दुःख का सही -सही अवलोकन करना । यथार्थ को समझने की दृष्टि ही सम्यक दृष्टि है ।
  2. सम्यक संकल्प(सम्मा संकप्प)- दुखों से छुटकारा पाने के लिए प्राणी को अपना मानसिक और नैतिक विकास करना आवश्यक है इसके लिए भौतिक सुखों के प्रति आकर्षण का त्याग करने का संकल्प लेना चाहिए ।
  3. सम्यक वाक् (सम्मा वाचा)- निवारण प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है की मनुष्य समुचित और सत्य वचनों का प्रयोग करे । वाणी की पवित्रता अति आवश्यक है  इसलिए मनुष्य को कटु,अप्रिय,अशुभ तथा असत्य वचनों का त्याग कर नियंत्रित,दूसरों का भला करने वाले,शांति देने वाले,दूसरों को प्रिय लगने वाले तथा शुभ वचनों का प्रयोग करना चाहिए ।
  4. सम्यक कर्मांत/कर्म (सम्मा काम/कम्मांत)- निर्वाण प्राप्ति के लिए मनुष्य को कर्मों के प्रति विशेष रूप से सजग होना चाहिए । मनुष्य को पाप कर्मों यथा-हिंसा,चोरी, अब्रह्मचर्य आदि को त्यागकर अहिंसा,अस्तेय और ब्रह्मचर्य से युक्त कर्मों की और प्रवृत्त होना चाहिए ।
  5. सम्यक आजीविका (सम्मा आजीव)- सम्यक कर्म के लिए मनुष्य को समुचित अथवा शुद्ध जीविकोपार्जन करना चाहिए । जब तक हमारी जीविका का साधन शुद्ध नहीं होगा तब तक हमारी प्रवृर्ती निर्मल नहीं हो सकती । जीविकोपार्जन के लिए शस्त्रों का व्यापार,प्राणी का व्यापार,मांस का व्यापार,मद्य का व्यापार तथा विष का व्यापार नहीं करना चाहीये । इसके अलावा दबाब,रिश्वत,धोखा,अत्याचार,जाल-साजि,डकैती,लूट तथा कृतघन्ता जैसे बुरे साधनों द्वारा जीविकोपार्जन करना निंदनीय है ।
  6. सम्यक व्यायाम (सम्मा व्यामा)- सम्यक् व्यायाम से तात्पर्य मानसिक व्यायाम से है अर्थात मनुष्य को अपने मन-बुद्धि को चुस्त,सजग और स्वस्थ रखना चाहिए । वस्तुतः यह मन ही होता जो मनुष्य को अच्छे या बुरे कर्मों के प्रति प्रेरित करता है । मनुष्य को अच्छे विचारों को मन में लाने का प्रयत्न करना चाहिए तथा बुरे विचारों को मन में आने से रोकना चाहिए । इसके लिए बुरे विचार उत्पन्न करने वाली वस्तुओं को हटाना चाहिए तथा शारीरिक चेष्टा (योग आदि) की सहायता से मन को नियंत्रित रखना चाहिए ।
  7. सम्यक स्मृति (सम्मा सति)- सम्यक समृति से तात्पर्य पूर्व घटित किसी घटना को याद रखना नहीं वरन बौद्ध दर्शन द्वारा प्रतिपादित आर्य सत्य को स्मरण रखना है । इसके साथ ही मनुष्य को शरीर,मन,चित,संवेदना आदि की वास्तविकता का समर्णण रखना चाहिए । शरीर का उदाहरण देते हुए बुद्ध कहते हैं कि यह क्षणिक है,यह केवल दुःख उत्पन्न करने वाला है । यह मांस,रक्त,हड्डी जैसे पदार्थों से भरा हुआ है जो अंततः नष्ट हो जायेगा । मनुष्य को शरीर सम्बन्धी इन बातों को हमेशा याद रखना चाहिए तथा इसकी समृति को ताजा बनाए रखने के लिए कभी-कभी शमशान घाट भी जाकर देखना चाहिए की जिस शरीर से मनुष्य इतना मोह करता है उसकी अंतिम दशा क्या होती है ,किस प्रकार वह जलता,सड़ता और नष्ट हो जाता है और किस प्रकार कहीं-कहीं तो चील,गीदड़ों और कुत्तों का भोजन बन जाता है । निश्चित ही सम्यक समृति का यह सिद्धांत निर्वाण पथ पर आगे बढ़ने में सहायता करता है ।
  8. सम्यक समाधी ( सम्मा सम्माधि )- अष्टांगिक पथ का आठवां और अंतिम महत्वपूर्ण सोपान है क्योंकि यही हमें अपने लक्ष्य अथवा निर्वाण के करीब ले जाता है । प्रथम सात सोपान तो अशुभ चित्तवृतियों का निरोध करके मनुष्य को अंतिम सोपान सम्यक समाधी के योग्य बनाते हैं । इसके लिए मनुष्य को वन या एकांतवास में विशुद्ध और स्थिर चित्त के साथ आसन लगाकर बैठना चाहिए । मात्र समाधिस्थ होना ही निर्वाण प्राप्ति नहीं है बल्कि इसके लिए मनुष्य को चार और अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ेगा -1. चार आर्य सत्यों पर तर्क-वितर्कपूर्वक विचार-मनन करना ,2. मन में चार आर्य सत्यों के प्रति श्रद्धा का उदय करना ,3. मन में आनन्द के प्रति उपेक्षा करना तथा 4. इस अवस्था में साधक की चित्त-वृत्तियों का पूर्णतः निरोध हो जाता है ,इस अवस्था में साधक की चित्त-वृत्तियों का पूर्णतः निरोध हो जाता है साधक का चित पूर्णतः शांत होकर निर्वाण की अवस्था में पहुँच जाता है ।

दोस्तों इसके अलावा महात्मा बुद्ध की और भी बहुत सी शिक्षाएं है जिसकी जानकारी महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को विषय बनाकर किसी अन्य पोस्ट में देंगे बहरहाल आपको एक जानकारी देना आवश्यक है की बौद्ध धर्म का सबसे अधिक प्रचार महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण (मृत्यु) के लगभग 250 वर्ष पश्चात् मौर्य सम्राट अशोक के समय  हुआ था । सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा तथा अपने अन्य धर्मदूतों को देश और विदेशों में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए भेजा ।

महात्मा बुद्ध की मृत्यु ( महापरिनिर्वाण )

दोस्तों महात्मा बुद्ध के जन्म और मृत्यु की सही तिथि के बारे में इतिहासकारों में मतभेद है । इतिहासकारों द्वारा महात्मा बुद्ध के जन्म और मृत्यु की जो तिथि निश्चित की गयी है वो चीन के कैंटोन अभिलेख से ली गयी है । इस अभिलेख के अनुसार महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई. पू. में तथा मृत्यु 483 ई. पू. में हुई । महात्मा बुद्ध ने पावा के एक सुनार चुन्द के यहाँ भोजन किया था जिसकी वजह से उन्हें उदर-पीड़ा हुई ,वो पावा से कुशीनगर चले गए जहां उनकी 80 वर्ष की आयु में बैशाख पूर्णिमा के दिन मृत्यु हो गयी ।

महात्मा बुद्ध के अंतिम उपदेश

महात्मा बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश श्रावस्ती(कौशल) में दिए थे । उन्होंने अपना अंतिम उपदेश कुशीनगर (मल्ल) परिव्राजक सुभछ( सुभच्छ) को दिया था । उनका अंतिम उपदेश था : सभी क्षयशील पदार्थ नश्वर है अपनी मुक्ति के लिए धैर्य के साथ चेष्टा करो ।

महात्मा बुद्ध के प्रथम शिष्य

महात्मा बुद्ध के प्रथम शिष्य तपस्सु व् मल्लिक थे । इसके अलावा उनके प्रमुख शिष्यों में कौण्डिन्य,बाप्पा,भादिया, महानामा और अस्तागी थे ।

वैशाखी पूर्णिमा का विशेष महत्व

दोस्तों जैसा की हमने आपको बताया महात्मा बुद्ध का जन्म वैशाखी पूर्णिमा को हुआ था ,उन्हें बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति भी वैशाखी पूर्णिमा को हुई थी तथा उनकी मृत्यु भी वैशाखी पूर्णिमा को हुई थी । अतः यही कारण है कि वैशाखी पूर्णिमा को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है ।

बौद्ध धर्म की वर्तमान स्थिति

दोस्तों प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था । मौर्य काल में बौद्ध धर्म का काफी प्रचार-प्रसार हुआ इसके अलावा भी अनेक शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया लेकिन कालांतर में बौद्ध धर्म को बहुत हानि पहुंचाई गयी और धीरे-धीरे भारत में जन्मे और फले-फुले बौद्ध धर्म का भारत में ही लोप हो गया । लेकिन भारत से बाहर आज भी श्रीलंका, म्यांमार(बर्मा), थाईलैंड, लाओस, कम्बोडिया, मलेशिया, कोरिया, जापान, वियतनाम तथा तिब्बत जैसे देशों में बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म अनुयायी रहते हैं । आज बौद्ध धर्म विश्व के कई बड़े धर्मों में से एक है ।

दोस्तों यदि पोस्ट अच्छी लगी तो लाइक जरूर करें तथा अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स में लिखे इसके साथ ही इस ब्लॉग को Follow और Subscribe भी कर लेवें क्योंकि मैं इसी प्रकार की तथ्य पर आधारित जानकारियां आपके लिए हर रोज लेकर आता हूँ ।

धन्यवाद

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!