मेवाड़ का इतिहास-महाराणा मोकल( History of Mewar in Hindi )

सन्न 1421 ई. में महाराणा लाखा सिंह की मृत्यु के पश्चात 12 वर्ष की आयु में मोकल को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया । महाराणा मोकल राणा लाखा व हंसाबाई की संतान थे । महाराणा लाखा के बड़े पुत्र राणा चूंडा को मोकल का संरक्षक नियुक्त किया गया ।

मेवाड़ का इतिहास-महाराणा मोकल

राव रणमल द्वारा मेवाड़ की राजनीति में हस्तक्षेप

चूंकि मोकल अभी अल्पवयस्क थे इसीलिए महाराणा लाखा की मृत्यु के पश्चात मेवाड़ के शासन से संबंधित सारी जिम्मेदारियां राणा चूंडा पर आ गईं । शासन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण फैसले राणा चूंडा ही लेते थे । हालांकि यह बात हंसाबाई को गले नहीं उतरती थी कि उसके पुत्र मोकल की उपेक्षा कर सभी निर्णय राणा चूंडा ही लेते हैं । उसे संदेह होने लगा कि कहीं चूंडा गद्दी के लिए मोकल की हत्या न कर दे । इस संदेह की आग में घी डालने का कार्य हंसाबाई के भाई रणमल राठौड़ ने किया । रणमल राठौड़ मेवाड़ के प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप करना चाहता था लेकिन राणा चूंडा के संरक्षक पद पर रहते हुए यह सम्भव नहीं था । अतः उसने अपनी बहिन हंसाबाई को राणा चूंडा के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया ।

हंसाबाई का राणा चूंडा के प्रति अविश्वास इतना अधिक हो गया था की जिससे क्षुब्द होकर चूंडा मेवाड़ छोड़कर मांडू(मध्य प्रदेश) चला गया । लेकिन जाने से पहले उसने अपने भाई राघव देव को अपनी सारी जिम्मेदारियां संभालने को कहा ।

राणा चूंडा के निकलते ही राव रणमल के लिए मेवाड़ की राजनीति का रास्ता बिल्कुल साफ हो गया था । हंसाबाई ने अपने भाई रणमल को मोकल का संरक्षक नियुक्त कर दिया । राव रणमल का ज्यादातर समय मेवाड़ में ही बीता था।

दरअसल दोस्तों, जैसा कि मैंने पिछले भाग में बताया था कि मारवाड़ के शासक राव चूड़ा ने अपनी रानी किशोरी देवी के प्रभाव में आकर अपने बड़े पुत्र रणमल राठौड़ की बजाय अपने छोटे पुत्र कान्हा को मारवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया । हालांकि अपने पिता के इस फैसले से रणमल राठौड़ खुश तो नहीं था तथा लेकिन सही अवसर की तलाश में भी था ।

मारवाड़ के शासक राव चूड़ा 1423 ई. में नागौर में भाटियों के साथ युद्ध करते हुए मारे गए थे । हालांकि बाद में भाटियों व राव रणमल में सुलह हो गई थी तथा भाटियों ने अपनी एक पुत्री कोड़मदे का विवाह रणमल से करा दिया था । इसी भटियाणी से राव रणमल का बड़ा पुत्र राव जोधा का जन्म हुआ ।

राव रणमल का मंडौर पर अधिकार

1427 ई. में एक बीमारी के कारण मारवाड़ के शासक राव कान्हा की भी मृत्यु हो गई । राव कान्हा की मृत्यु के पश्चात राव चूड़ा के दूसरे पुत्र सत्ता को मारवाड़ का राजा बनाया गया । ऐसा कहा जाता है कि सत्ता अंधा हो गया था इस कारण सत्ता के पुत्र नरबद व सत्ता के भाई रणधीर का मारवाड़ पर शासन को लेकर आपस में विवाद हो गया । इस मौके का लाभ उठाते हुए राव रणमल ने मेवाड़ की सेना की सहायता से मारवाड़ की राजधानी मंडौर(जोधपुर) पर अधिकार कर लिया ।

मेवाड़ पर मंडराए संकट के बादल – मेवाड़ का इतिहास

रणमल के मारवाड़ चले जाने के बाद मेवाड़ पर संकट के बादल मंडराने लगे । हालांकि अब राणा मोकल वयस्क हो चुके थे लेकिन वो मेवाड़ की सुरक्षा के लिए कई युद्धों में व्यस्त थे । राणा मोकल एक प्रतापी राजा थे । उन्होंने 1428 ई. में नागौर के शासक फिरोज खाँ तथा गुजरात के शासक अहमदशाह की संयुक्त सेना को रामपुरा के युद्ध मे पराजित किया था । उधर मालवा के शासक होशंगशाह ने मेवाड़ की कमजोर स्थिति का फायदा उठाया तथा मेवाड़ के अधीन गागरोण का दुर्ग अपने अधिकार में कर लिया । गागरोण में उस समय मोकल के संबंधी अचलदास खींची का शासन था । अचलदास खींची लड़ता हुआ मारा गया । बूंदी के हाड़ा शासक ने माण्डलगढ़ के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था । सिरोही के शासक ने गोड़वाड़ क्षेत्र में अव्यवस्था फैला दी । गुजरात का शासक अहमदशाह राणा मोकल के पराक्रम से ईर्ष्या करता था । बदले की भावना से उसने मेवाड़ के अधीन डूंगरपुर, कैलवाड़ा, देलवाड़ा आदि कई क्षेत्रों में लूटपाट की ।

राणा मोकल की हत्या /History of Mewar in Hindi – मेवाड़ का इतिहास

1433 ई. में गुजरात के इस अभियान पर जब राणा मोकल अपनी सेना के साथ जा रहे थे तो रास्ते में जीलवाड़ा नामक स्थान पर पड़ाव डाला । इसी स्थान पर महपा पंवार के कहने पर चाचा व मेरा नामक दो व्यक्तियों ने राणा मोकल की हत्या कर दी । जैसा कि हमने मेवाड़ का इतिहास भाग-6 में बताया कि चाचा व मेरा मोकल के दादा महाराणा क्षेत्र सिंह/ खेता सिंह की संतान थे। महाराणा क्षेत्र सिंह की एक दासी थी जो खातिन जाती की थी । इसी दासी की संतानें चाचा व मेरा थीं ।

बहरहाल, जीलवाड़ा के इस अभियान में मोकल के साथ उसका दस वर्षीय पुत्र कुम्भा भी था जिसे सिसोदिया सरदारों द्वारा किसी तरह बचाकर मेवाड़ लाया गया ।

चाचा व मेरा की हत्या/ मेवाड़ का इतिहास

अपने भांजे राणा मोकल की हत्या की खबर सुनकर राव रणमल बदले की आग में जल उठा । उसने मोकल के हत्यारों को मौत के घाट उतारने की प्रतिज्ञा की । रणमल अपने 500 सिपाहियों के साथ मेवाड़ आया तथा चाचा व मेरा का पीछा किया । चाचा व मेरा अपनी जान बचाने के लिए कोटड़ा अथवा पई की पहाड़ियों में छुप गये तथा यहां मेरों की शरण ली । रणमल ने मेरों को अपने पक्ष में कर लिया तथा छुपे हुए मोकल के हत्यारे चाचा व मेरा को पकड़कर उनकी हत्या कर दी ।

उसने 1433 ई. में मोकल के 10 वर्षीय पुत्र कुम्भा को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया । महाराणा कुम्भा के शासन को निष्कंटक बनाने के लिए उसने मेवाड़ के सभी उच्च व महत्वपूर्ण पदों पर राठौड़ सरदारों को नियुक्त कर दिया ।

राणा मोकल का संक्षिप्त विवरण

राणा मोकल का पाँच वर्ष की आयु में राजतिलक करा दिया गया था लेकिन वह अपने पिता महाराणा लाखा की मृत्यु के पश्चात 1421 ई. में राजगद्दी पर बैठे । राणा मोकल की माँ का नाम हंसाबाई था जो मारवाड़ के शासक राव चूड़ा की बेटी तथा राव रणमल की बहिन थी। राणा मोकल की पत्नी का नाम सौभाग्य देवी था । महाराणा कुम्भा इन दोनों की संतान थे । राणा मोकल ने अपनी बेटी लाली का विवाह गागरोण शासक राजा भोज के बेटे अचलदास खींची से किया । राणा मोकल का शासनकाल 1421 ई. से 1433 ई. के मध्य था । हालांकि राणा चूंडा के मांडू जाने के पश्चात मेवाड़ की राजनीति में इनके मामा रणमल का हस्तक्षेप रहा ।

राणा मोकल का कला व संस्कृति के क्षेत्र में योगदान

कला व संस्कृति के क्षेत्र में महाराणा मोकल का काफी योगदान रहा । महाराणा मोकल ने चितौड़गढ़ दुर्ग में स्थित त्रिभुवन नारायण मंदिर/ भोज मंदिर का पुनःनिर्माण करवाया । इस मंदिर को वर्तमान में समिदेश्वर मंदिर/मोकल मंदिर के नाम से जाना जाता है। राणा मोकल के दरबार में योगेश्वर भट्ट तथा विष्णु भट्ट नाम विद्वान थे तथा प्रमुख शिल्पकारों में फना, पना,मना व विसल थे।

राणा मोकल की हत्या के बाद उनके पुत्र राणा कुम्भा को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया जाता है । आगे चलकर राणा रणमल की भी हत्या कर दी जाती है । दोस्तों इससे आगे की जानकारी हम मेवाड़ का इतिहास श्रृंखला के अगले भाग में देंगे। आगे चलकर मेवाड़ की राजनीति बड़ी ही रोमांचक हो जाएगी । अवश्य पढ़ें !

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मेवाड़ का इतिहास भाग-7

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