राणा हम्मीर सिंह

गुहिल वंश की मुख्य शाखा (रावल शाखा) के पतन के पश्चात सोनगरा चौहानों को पराजित कर हम्मीर सिंह ने 1326 ई. में मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश की नींव रखी । इससे पहले 1303 ई. में रावल रतन सिंह को पराजित कर अल्लाउदीन खिलजी ने राजधानी चित्तौड़गढ़ (मेवाड़) पर अधिकार कर लिया था । अल्लाउदीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्रखां को चितौड़गढ़ में नियुक्त किया तथा चितौड़गढ़ का नाम बदलकर खिज्राबाद कर दिया । 1311 ई.में अल्लाउद्दीन खिलजी ने जालौर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। जालौर के शासक कान्हड़देव सोनगरा चौहान व उसके पुत्र वीरमदेव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए । लेकिन कान्हड़देव के भाई मालदेव सोनगरा चौहान ने अलाउद्दीन खिलजी की अधीनता स्वीकार कर ली थी जिस कारण उसे जीवित छोड़ दिया गया ।  अल्लाउदीन खिलजी की मृत्यु के पश्चात मालदेव को चितौड़ का प्रशासक नियुक्त कर खिज्रखां दिल्ली लौट आया । धीरे-धीरे मेवाड़ में मालदेव ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली ।

सिसोदिया वंश के राणा हम्मीर सिंह अरिसिंह के पुत्र तथा लक्ष्मण सिंह के पौते थे । उन्हें मेवाड़ के उद्धारक के रूप में जाना जाता है । दिल्ली सल्तनत उन दिनों अस्थिरता के दौर से गुजर रही थी,खिल्जी साम्राज्य का पूरी तरह से पतन हो चुका था और अब दिल्ली पर मुहम्मद बिन तुगलक का शासन स्थापित हो चुका था । इसी अस्थिरता का लाभ उठाते हुए राणा हम्मीर सिंह ने 1326 ई. में मालदेव चौहान के पुत्र जैसा / जय सिंह / बनवीर चौहान को पराजित कर मेवाड़ से मुस्लिम सत्ता को उखाड़ फेंका । हम्मीर सिंह ने अपनी सत्ता का केंद्र केलवाड़ा नामक स्थान को बनाया । मुहम्मद बिन तुगलक तथा हम्मीर सिंह के मध्य बांसवाड़ा में सिंगोली नामक स्थान पर युद्ध हुआ । इस युद्ध को सिंगोली का युद्ध भी कहा जाता है । हालाँकि इस युद्ध की तिथि के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं है ।

राणा हम्मीर सिंह को सिसोदिया वंश का प्रथम शासक भी कहा जाता है । दोस्तों यदि आपने मेरे द्वारा प्रकाशित मेवाड़ के इतिहास से संबंधित पिछले लेखों को नहीं पढ़ा है तो यहां एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है की सिसोदिया कोई वंश नहीं है बल्कि यह एक शाखा है जैसे रावल एक शाखा है । जबकि ये दोनों शाखाएं गुहिल वंश की हैं । राजा रण सिंह के पुत्र राहप ने सिसोदा गांव बसाया तथा अपनी शासन व्यवस्था यहीं से शुरू की । आगे चलकर इसी शाखा में हम्मीर सिंह का जन्म हुआ । सिसोदा गांव के होने के कारण ये सिसोदिया शाखा के कहलाने लगे । हालांकि सामान्यतः सिसोदिया शाखा को सिसोदिया वंश के नाम से जाना जाता है ।

खैर दोस्तों, हम्मीर सिंह एक बहुत ही वीर और प्रतापी शासक थे । राणा कुम्भा की कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति में हम्मीर सिंह को विषम घाटी पंचानन (विकट परिस्थितियों में सिंह के समान) कहा गया है जबकि इन्हीं की ही रचना रसिकप्रिया की टीका में उन्हें वीर राजा की संज्ञा भी दी गई है । हम्मीर सिंह ने चितौड़गढ़ दुर्ग में बरवड़ी माता का भव्य मंदिर बनवाया जिसे आज अन्नपूर्णा माता मंदिर के नाम से जाना जाता है।

राणा हम्मीर सिंह ने 1326 ई. से 1364 ई. तक शासन किया । 1364 ई. में हम्मीर सिंह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र खेता (क्षेत्र सिंह) अगला शासक बना ।

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