राष्ट्रकूट राजवंश (भाग -2)

दोस्तों पिछले भाग (राष्ट्रकूट राजवंश भाग-1) में आपने पढ़ा राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक दन्तिदुर्ग तथा कृष्ण प्रथम व गोविन्द द्वितीय के बारे में । आइये भाग-2 में जानते हैं इनके उत्तराधिकारियों के बारे में जिन्होंने राष्ट्रकूट वंश को आगे बढ़ाया ।

ध्रुव/धारावर्ष (780 ई.-793 ई.)

ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का सबसे महान व् प्रतापी शासक था । ध्रुव कृष्ण प्रथम का पुत्र तथा गोविन्द द्वितीय का छोटा भाई था ।  उसने गोविन्द द्वितीय को पदच्युत कर सत्ता हासिल की थी ।  780 ई. में वह राष्ट्रकूट साम्राज्य का शासक बना । अपने राज्याभिषेक के अवसर पर उसने ‘धारावर्ष’ तथा ‘निरुपम’ नामक उपाधियां धारण की ।

गंगवाड़ी पर आक्रमण

अपने शासक बनने के बाद ध्रुव ने सर्वप्रथम गंगवाड़ी पर आक्रमण किया क्योंकि सत्ता-संघर्ष के दौरान गंग शासक ने गोविन्द द्वितीय को सहायता प्रदान की थी । गंग नरेश श्रीपुरुष वृद्ध हो चुका था । गंगों की सेना का संचालन गंग युवराज शिवमार ने किया लेकिन वह ध्रुव के समक्ष ज्यादा समय तक नहीं टिक सका । युवराज शिवमार को बंदी बना लिया जाता है और सम्पूर्ण गंगवाड़ी पर राष्ट्रकूटों का आधिपत्य स्थापित हो जाता है ।

पल्लवों पर आक्रमण

पल्लवों ने भी विद्रोह के दौरान गोविन्द द्वितीय की सहायता की थी । पल्लव राजा दन्तिवर्मा राष्ट्रकूटों की विशाल सेना देखकर घबरा गया। उसने राष्ट्रकूटों से संधि कर ली जिसके फलस्वरूप उसने ध्रुव के प्रति वफादार रहने और भविष्य में उसके विरुद्ध किसी भी षड्यंत्र में भाग न लेने का आसवन दिया । उसने ध्रुव को उपहारस्वरूप बड़ी संख्या में हाथी प्रदान किये । 782 ई. तक ध्रुव ने दक्षिण भारत के काफी बड़े हिस्से पर अधिकार कर लिया था । दक्षिण भारत में अपनी सफलताओं के पश्चात उसने उत्तर भारत का रुख किया ।

उत्तर भारत की विजय

ध्रुव ने कन्नौज के गंगा-जमुना दोआब क्षेत्र पर अधिकार को लेकर उठे त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया । तत्कालीन समय में कन्नौज का राजनीतिक महत्त्व बहुत बढ़ गया था , प्राचीन काल में जो प्रतिष्ठा पाटलिपुत्र को प्राप्त थी वैसा ही महत्त्व तब कन्नौज का हो गया था । ये तीन शक्तिशाली राज्य थे गुर्जर-प्रतिहार वंश, बंगाल का पाल वंश तथा राष्ट्रकूट वंश जो 780 ई. से निरंतर 185 वर्षों तक कन्नौज पर अधिकार करने के लिए युद्धरत रहे । इस त्रिपक्षीय संघर्ष के प्रथम चरण में प्रतिहार शासक वत्सराज, पाल शासक धर्मपाल तथा राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने भाग लिया । शुरुआत में तो वत्सराज ने धर्मपाल को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया था लेकिन बाद में ध्रुव ने दोनों शासकों को पराजित कर सम्पूर्ण गंगा-जमुना दोआब क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था । इस विजय से राष्ट्रकूटों ने उत्तर भारत में भी अपनी धाक जमा ली थी ।

उत्तराधिकारी की घोषणा

ध्रुव के चार पुत्र थे कर्क,स्तम्भ,गोविंद तथा इन्द्र । ध्रुव के शासनकाल के दौरान ही बड़े पुत्र कर्क की मृत्यु हो गई थी। कर्क की मृत्यु के पश्चात स्वाभाविक रूप से उसका दूसरा पुत्र स्तम्भ ही ध्रुव का उत्तराधिकारी था लेकिन ध्रुव अपने तीसरे पुत्र गोविन्द को अधिक योग्य समझता था । उसने स्तम्भ को गंगवाड़ी का उपराजा बना दिया और शासन से संबंधित सभी स्वतंत्र अधिकार दे दिए तथा छोटे पुत्र इन्द्र को गुजरात व मालवा का प्रान्तपाल नियुक्त किया । इस प्रकार ध्रुव ने बड़ी ही सूझ बूझ से उत्तराधिकार की इस समस्या का समाधान किया । 792 ई. में ध्रुव ने गोविंद तृतीय को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया । लगभग 13 वर्षों तक शासन करने के बाद 793 ई. में ध्रुव की मृत्यु हो गई ।

गोविंद तृतीय (793 ई.-814 ई.)

अपने पिता ध्रुव की मृत्यु के पश्चात 793 ई. में गोविंद तृतीय राष्ट्रकूट वंश का शासक बना । गोविंद तृतीय को उसके पिता ने योग्यता के आधार पर चुना था । हालांकि नियमों के अनुसार राष्ट्रकूट सिंहासन उसके बड़े भाई सतम्भ को मिलना चाहिए था । गोविंद तृतीय एक दूरदर्शी शासक था । वह जानता था कि जिस प्रकार उसके पिता ने सिंहासन के लिए शासक चुना है वह भविष्य में अवश्य ही उसके लिए समस्याएं खड़ी करेगा । उसने सिंहासन पर अपनी स्थिति को मजबूत करने पर ध्यान दिया । उसने अपने मंत्रियों व सामंतों को प्रलोभन देकर अपनी तरफ खींच लिया । इसके अलावा उसने अपने सैन्यबल में भी वृद्धि की ।

सतम्भ का विद्रोह

हालांकि सतम्भ ने अपने पिता ध्रुव के उत्तराधिकार को लेकर किये गए निर्णय को मान लिया था लेकिन वह आंतरिक रूप से इससे संतुष्ट नहीं था । गोविंद तृतीय के शासक बनने के बाद उसने विद्रोह कर दिया । उसने योजनाबद्ध तरीके से कार्य करते हुए राष्ट्रकूट साम्राज्य के बारह पड़ोसियों का एक संघ बनाया । सतम्भ ने इस संघ से गुहार लगाई की उसके साथ न्याय नहीं हुआ क्योंकि ध्रुव का ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते नियमानुसार राष्ट्रकूट गद्दी का वही वास्तविक हकदार था । सतम्भ को राष्ट्रकूट राज्य के कुछ पड़ोसी राज्यों, सामंतों तथा मंत्रियों की सहानुभूति मिल गयी । सतम्भ के सहयोग के लिए इस संघ में पल्लव नरेश दंतिदुर्ग, बनवासी नरेश कन्तियिर, नोलन्दवाड़ी नरेश चरुपोन्नेर,धारवाड़ का सामंत माराश्र्व तथा कई सामंत व मंत्री थे । हालांकि गोविंद द्वितीय के गुप्तचरों ने सतम्भ के इस षड्यंत्र का पर्दाफाश कर दिया । गोविंद द्वितीय ने कूटनीति से काम लेते हुए सतम्भ के मनसूबों पर पानी फैरने की योजना बनाई ।

उसने सर्वप्रथम बंदी बनाये गए गंगवाड़ी के युवराज शिवमार को कैद से मुक्त किया और उससे गोविन्द ने यह शर्त रखी कि यदि वह गोविन्द का समर्थन करेगा तो वह उसे गंगवाड़ी के सिंहासन पर बैठा देगा । इसके पीछे गोविंद तृतीय की यह सोच थी की गंगवाड़ी को लेकर सतम्भ व शिवमार के बीच संघर्ष छिड़ जायेगा और सतम्भ इसी संघर्ष में उलझा रहेगा । लेकिन गोविंद तृतीय की यह चाल काम नहीं आयी क्योंकि गंगवाड़ी पहुँचने के बाद शिवमार को सतम्भ ने अपने समर्थन में कर लिया । लेकिन फिर भी गोविंद तृतीय विचलित नहीं हुआ और उसने गंगवाड़ी पर आक्रमण कर दिया । उसने यह आक्रमण इतनी तीव्रता से किया की सतम्भ को संघ के सदस्यों से सहायता लेने का मौका ही नहीं मिला । गोविंद तृतीय ने सतम्भ को बंदी बना लिया । लेकिन गोविन्द ने अपनी उदारता का परिचय देते हुए कुछ समय बाद उसे छोड़ दिया । सतम्भ से भविष्य में हमेशा राष्ट्रकूट साम्राज्य के प्रति वफादार रहने का प्रण लेकर पुनः गंगवाड़ी का उपराजा नियुक्त किया ।

नोलंबवाड़ी विजय

गोविंद तृतीय ने एक-एक करके अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाने की योजना बनाई । वह नोलंबवाड़ी की तरफ बढ़ा और आक्रमण की पूरी तैयारी कर ली । लेकिन नोलंबवाड़ी नरेश चरुपोन्नेर ने बिना युद्ध किये ही गोविन्द के समक्ष समर्पण कर दिया । क्योंकि वह जानता था कि गोविंद तृतीय को हरा पाना उसके अकेले के बस की बात नहीं है । गोविन्द ने भी उदारता का परिचय दिया और चरुपोन्नेर से राष्ट्रकूट साम्राज्य के प्रति हमेशा वफादार रहने का वचन लेकर उसे उसका राज्य वापिस लौटा दिया ।

कांची के पल्ल्वों पर विजय

ब्रिटिश म्यूजियम अनुदान पत्र (804 ई.) के अनुसार गोविंद तृतीय ने कांची के पल्ल्व शासक को पराजित किया था। इस लेख के अनुसार कांची पर अभियान का यह समय 804 ई. के आसपास रहा होगा । जबकि एक अन्य साक्ष्य के अनुसार गोविंद तृतीय ने 796 ई. के आसपास कांची के पल्ल्वों को पराजित किया था । इस प्रकार गोविन्द ने दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों को जीत कर अपनी स्थिति को काफी अच्छा कर लिया था ।

शुरुआत में उसने चालुक्यों पर आक्रमण नहीं किया था क्योंकि गोविंद तृतीय की मां चालुक्य नरेश विष्णुवर्द्धन की पुत्री थी । विष्णुवर्द्धन वेंगी में राष्ट्रकूटों के सामंत के रुप में शासन करता था । गोविन्द तृतीय को यह विश्वास था कि विष्णुवर्द्धन राष्ट्रकूटों के विरुद्ध कभी भी कोई कदम नहीं उठायेगा । लेकिन विष्णुवर्द्धन की मृत्यु के पश्चात 799 ई. में उसका पुत्र विजयादित्य ने उत्तराधिकार संभाला तो उसने कुछ वर्षों बाद राष्ट्रकूटों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और स्वंय को वेंगी का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया । 802 ई. में वेंगी को लेकर दोनों की सेना के मध्य भयंकर युद्ध हुआ जिसमें विजयादित्य पराजित होता है । गोविन्द तृतीय ने विजयादित्य के भाई सुलुविक को वेंगी का शासक नियुक्त कर दिया ।

उत्तर भारत का अभियान

दक्षिण भारत के विजय अभियानों के साथ-साथ उसने उत्तर भारत में भी अपना अभियान जारी रखा । उसने कन्नौज के त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया । इतिहासकारों के अनुसार गोविन्द तृतीय के समय इस त्रिपक्षीय संघर्ष में गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक नागभट्ट द्वितीय तथा पाल वंश के शासक धर्मपाल ने भाग लिया । गोविन्द तृतीय के मन्ने अभिलेख, राधनपुर अभिलेख, रिसवै अभिलेख,प्रबल के पथरी (पठारी ) स्तम्भ लेख तथा अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र से यह ज्ञात होता है की उसने प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय को पराजित किया था । इतिहासकारों के मतानुसार यह युद्ध बुंदेलखण्ड के आस-पास कहीं लड़ा गया था जहाँ से आगे बढ़कर उसने कन्नौज नरेश चक्रायुध तथा पाल शासक धर्मपाल को पराजित कर आत्मसमर्पण करने के लिए विवश कर दिया था । उत्तर भारत में अपनी सफलता के पश्चात वह अपने पिता ध्रुव की तरह पुनः दक्षिण में अपनी राजधानी लौट आया । उत्तर भारत के इस अभियान के पीछे उसका उद्देश्य कन्नौज के लिए संघर्षरत शक्तियों से अपनी शक्ति का लोहा मनवाना था न की कन्नौज पर स्थायी अधिकार करना ।

दक्षिण भारत के संघ पर विजय

जब गोविन्द तृतीय उत्तर भारत के अभियान में व्यस्त था तब उसकी अनुपस्थिति में दक्षिण के कई राजवंशों ने मिलकर राष्ट्रकूटों को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से एक संघ का निर्माण किया । इस संघ में गंग,केरल,पल्लव व पाण्ड्य आदि राजवंश शामिल थे जिन्होंने पूरी तैयारी के साथ राष्ट्रकूट साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया । गोविन्द तृतीय को जब इसकी सुचना मिली तो वह अपनी सेना के साथ युद्ध क्षेत्र पहुँचता है । दोनों सेनाओं के मध्य घमासान युद्ध होता है । चूँकि गोविन्द की सेना उत्तर व दक्षिण के कई अभियानों में युद्ध कर चुकी थी , इसलिए उसकी सेना को हर परिस्थिति में युद्ध करने का अनुभव था । गोविन्द तृतीय व उसकी सेना के अदम्य साहस की बदौलत राष्ट्रकूटों ने संघ पर विजय प्राप्त की ।

श्रीलंका के राजा ने गोविन्द तृतीय की तरफ मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए उसे दो मूर्तियां प्रदान कीं । इनमे से एक मूर्ती गोविन्द तृतीय की थी तथा दूसरी मूर्ती उसके महामंत्री की थी ।

गोविन्द तृतीय राष्ट्रकूट वंश का सबसे महान और प्रतापी शासक था । उसकी विजय का डंका कन्नौज से कन्याकुमारी तथा काशी से भड़ोच तक बजता था । राष्ट्रकूट अभिलेखों में उसकी खूब प्रशंसा की गई है । अभिलेखों में उसकी तुलना महाभारत के अर्जुन से की गई है । उसने लगभग 22 वर्षों तक मान्यखेत पर शासन किया । 814 ई मे उसकी मृत्यु के पश्चात अमोघवर्ष प्रथम ने राष्ट्रकूट साम्राज्य की गद्दी संभाली।

इससे आगे की जानकारी आपको राष्ट्रकूट राजवंश भाग-3 में मिलेगी जिसमे 814 ई. के पश्चात् के राष्ट्रकूट राजाओं की जानकारी दी गई है।  दोस्तों,हमारे ब्लॉग पर दी जाने वाली प्रत्येक जानकारी एकदम सटीक होती है, हालाँकि हम इस बात का दावा नहीं करते परन्तु जितनी मेहनत तथ्यों व सामग्रियों को एकत्रित करने में हम करते हैं उतनी शायद ही कोई करता होगा । दोस्तों आपसे अनुरोध है की आपको इस वेबसाइट पर कहीं भी विज्ञापन दिखाई दें तो उन पर क्लिक जरूर करें , इसके साथ ही यदि आप चाहें तो हमारे ब्लॉग की हर नई पोस्ट की जानकारी के लिए हमारे ब्लॉग को सब्सक्राइब जरूर कर लेवें ।

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