राष्ट्रकूट राजवंश (भाग -1)

नमस्कार दोस्तों,स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग ‘जय भारत’ पर । दोस्तों इस पोस्ट में आपको जानकारी दी जायेगी राष्ट्रकूट वंश के इतिहास की । राष्ट्रकूट साम्राज्य पूर्व मध्यकालीन भारत का एक महत्वपूर्ण साम्राज्य था । आपको बता दें हम कुल तीन भागों में राष्ट्रकूट वंश के इतिहास की जानकारी आप तक पहुंचाएंगे और यह इस श्रृंखला का भाग -1 है ।

राष्ट्रकूट वंश का इतिहास

राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 752 ईसवी में दन्तिदुर्ग ने की थी । दंतिदुर्ग ने अपने शासन की शुरुआत बादामी के चालुक्य शासकों के सामंत के रूप में की थी । ऐसे प्रमाण मिलते हैं की दन्तिदुर्ग ने चालुक्य शासक विक्रमादित्य द्वितीय के साथ अनेक अभियानों में भाग लिया था । उसने चालुक्य साम्राज्य को समाप्त कर राष्ट्रकूट साम्राज्य की स्थापना की । उसने मान्यखेत को अपने स्वतंत्र राज्य की राजधानी बनाया । विक्रमादित्य द्वितीय ने उसे खड़वालोक अथवा पृथ्वी वल्लभ की उपाधि दी । दंतिदुर्ग द्वारा स्थापित राष्ट्रकूट वंश की इस शाखा को इतिहास में ‘मान्यखेत का राष्ट्रकूट वंश’ के नाम से जाना जाता है ।

दन्तिदुर्ग (736 ई.-756 ई.)

दन्तिदुर्ग कुशल सेनानायक,कूटनीतिज्ञ,धर्मनिष्ठ व उदार शासक था । अपनी धर्मनिष्ठा का परिचय देते हुए उसने कई गांव दान में प्रदान किये तथा उज्जैन में हिरण्यगर्भ महादान यज्ञ संपन्न किया । दन्तिदुर्ग ने कलिंग, कौशल, कांची, मालवा, श्रीशैल, लाट तथा सम्भवतः सिन्ध  आदि क्षेत्रों पर विजय प्राप्त कर राष्ट्रकूट साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया । अपनी विजयों के उपलक्ष्य में उसने अनेकों उपाधियां धारण कीं । दन्तिदुर्ग के अभिलेखों में उसकी कई उपाधियों का उल्लेख है जैसे -महाराजाधिराज, परमेश्वर, भट्टारक, पृथ्वीवल्लभ, वल्लभराज, महाराजशर्व, खड़गावलोक, सहासतुंग, वैरमेघ इत्यादि ।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार दन्तिदुर्ग ने 736 ई.में अरबी आक्रमणकारियों के विरुद्ध नौसारी के युद्ध में गुजरात के चालुक्य शासक पुलकेशिन जनाश्रय की सहायता की थी ,उनके अनुसार इसी वर्ष राष्ट्रकूट वंश की नींव रखी गई । एलोरा से प्राप्त ताम्रपत्र अभिलेख(742 ई.) में दन्तिदुर्ग को ‘पृथ्वीवल्लभ’ की उपाधि दी गयी है । 743 ई. में  उसने चालुक्य युवराज कीर्तिवर्मन (विक्रमादित्य द्वितीय का पुत्र) को काँची के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान की तथा स्वयं भी सक्रिय रूप से इन अभियानों में भाग लिया । कांची की विजय के पश्चात चालुक्य तथा दन्तिदुर्ग की सेनाओं ने श्रीशेल (कुर्नूल जिले में स्थित छोटी सी रियासत) पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की । इन विजयों ने दन्तिदुर्ग को कीर्ति और यश प्रदान किया । इन विजयों के उपरांत दन्तिदुर्ग की अपना स्वतंत्र राज्य खड़ा करने की महत्वकांक्षा बढ़ गई ।  747 ई. में विक्रमादित्य द्वितीय की मृत्यु के पश्चात यह महत्वकांक्षा और भी तीव्र हो गयी ।

दन्तिदुर्ग ने बड़ी ही सूझबूझ व कूटनीति से अपने राज्य विस्तार की रूपरेखा तैयार की । उसने ऐसी नीति अपनाई जिसमें उसका चालुक्यों से सीधा मुकाबला न हो । उसने पूर्व तथा पश्चिम में अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया जबकि चालुक्यों का मुख्य शासन दक्षिण में कर्नाटक की तरफ था । उसने गुजरात में नौसारी के चालुक्य राज्य तथा दक्षिण गुजरात में नंदिपुरी के गुर्जर राज्य को पराजित कर अपने प्रभाव क्षेत्र में शामिल कर लिया । नौसारी व नंदिपुरी राज्यों की स्थिति अरब आक्रमणों के कारण कमजोर हो चुकी थी ।  इसी स्थिति का लाभ उठाते हुए उसने इन राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया ।  उसने अपने चचेरे भाई गोविन्द को यहाँ का शासक नियुक्त किया

नौसारी विजय के पश्चात उसने मालवा पर आक्रमण कर दिया।  उस समय मालवा पर गुर्जर-प्रतिहारों का शासन था ।  इनकी दो शाखाओं सीलुक व देवराज के मध्य सत्ता-संघर्ष चल रहा था ।  इसी मौके का लाभ उठाते हुए दन्तिदुर्ग ने मालवा पर आक्रमण कर उज्जैन पर अधिकार कर लिया । दन्तिदुर्ग ने मालवा विजय के अवसर पर ही उज्जैन में हिरण्यगर्भ महादान यज्ञ सम्पन्न किया । इतिहासकारों की धारणा है कि दन्तिदुर्ग ने उज्जैन को अपने राज्य में नहीं मिलाया था बल्कि केवल अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए ही उज्जैन को चुना था । इसके पश्चात उसने महाकौशल व छत्तीसगढ़ के राज्यों को पराजित किया । इस अभियान से वापिस लौटते हुए उसने कलिंग तथा यहाँ के छोटे-छोटे सामंती राज्यों को पराजित किया ।

दंतिदुर्ग ने अपनी कूटनीति व सैन्य बल द्वारा मध्य प्रदेश,दक्षिण व मध्य गुजरात व आस पास के अनेकों छोटे छोटे राज्यों पर अपना प्रभाव स्थापित किया । दंतिदुर्ग की कीर्ति व यश से चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन अत्यंत परेशान था । कीर्तिवर्मन व दंतिदुर्ग के मध्य नौसारी को लेकर टकराव उत्पन्न हो गया । परिणामस्वरूप दोनों सेनाओं के मध्य महाराष्ट्र में भीषण युद्ध होता है जिसमें कीर्तिवर्मन को दंतिदुर्ग के हाथों पराजित होना पड़ा । इस प्रकार चालुक्यों को पराजित करके दंतिदुर्ग ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की । कृष्ण प्रथम के अभिलेखों में दंतिदुर्ग को चालुक्यों की शक्ति को उखाड़ फेंकने का श्रेय दिया गया है । अतः यह कहा जा सकता है कि दंतिदुर्ग राष्ट्रकूट साम्राज्य का वास्तविक शासक था । इतिहासकारों का मत है कि लगभग 756 ई. में दंतिदुर्ग कई मृत्यु हो गई थी ।

कृष्ण प्रथम (756 ई.-773 ई.)

दंतिदुर्ग की मृत्यु के बाद 756 ई. में  कृष्ण प्रथम राष्ट्रकूट वंश का शासक बना । कृष्ण प्रथम ,दंतिदुर्ग का भतीजा था। दंतिदुर्ग की मृत्यु को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं । सी.वी. वैद्य के अनुसार कृष्ण प्रथम ने गद्दी प्राप्त करने के लिए दंतिदुर्ग की हत्या की थी । डॉ. वी .ए. स्मिथ के अनुसार कृष्ण प्रथम ने एक युद्ध में दंतिदुर्ग को पराजित कर राष्ट्रकूट वंश की गद्दी हासिल की । बड़ौदा अभिलेख में भी कुछ ऐसा ही उल्लेख मिलता है की कृष्ण प्रथम अपने एक दुराचारी संबंधी की हत्या करके राष्ट्रकूट गद्दी पर बैठा । संभवतः वह दंतिदुर्ग रहा होगा । लेकिन कुछ विद्वानों ने इस बात को मानने से इंकार किया है । उनका मानना है कि कृष्ण प्रथम ने दंतिदुर्ग की हत्या नहीं कि बल्कि उसकी मृत्यु के पश्चात ही वह राष्ट्रकूट साम्राज्य का शासक बना । उन्होंने कर्क द्वितीय के चित्तलदुर्ग अनुदान पत्र में उल्लेखित इस बात को आधार माना है जिसमे दंतिदुर्ग को निःसंतान बताया गया है । विद्वानों की धारणा है की यदि वह निःसंतान था तो उत्तराधिकार के लिए कृष्ण प्रथम को दंतिदुर्ग की हत्या करने की आवश्यकता ही नहीं थी। अतः यह स्पष्ट नहीं होता है कि कृष्ण प्रथम ने दंतिदुर्ग की हत्या की थी । अपने राज्याभिषेक के समय कृष्ण प्रथम ने ‘शुभतुंग’ व ‘अकालवर्ष’ उपाधियां धारण कीं ।

कर्क द्वितीय का विद्रोह

राज्यारोहण के कुछ ही समय पश्चात उसे अपने निकट सम्बन्धी कर्क द्वितीय के विरोध का सामना करना पड़ा । कर्क द्वितीय उस समय गुजरात में शासन करता था । 757 ई. में उसने अपने आप को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और स्वतंत्र शासकों जैसी उपाधियां धारण कर ली ।  कृष्ण प्रथम ने कर्क द्वितीय के विद्रोध को कुचल कर वहां अपने प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किये ।

चालुक्यों से संघर्ष

गद्दी सँभालने के पश्चात् कृष्ण प्रथम ने बादामी के चालुक्यों की शक्ति को पूरी तरह से नष्ट करने व दक्षिण भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने की योजना बनायीं । उधर चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन ने भी अपनी सेना के साथ भीमा नदी के तट पर डेरा डाल लिया । दोनो सेनाओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ जिसमें चालुक्यों को भारी क्षति उठानी पड़ी । चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन व उसका पुत्र युद्ध मे लड़ते हुए मारे गए । इस युद्ध ने बादामी के चालुक्य साम्राज्य को पूरी तरह नष्ट कर दिया । इस युद्ध में विजय के पश्चात कृष्ण प्रथम ने कर्नाटक पर अधिकार कर राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया । परवर्ती चालुक्यों के अभिलेखों में इस युद्ध की विभीषिका व चालुक्य शक्ति के अंत का वर्णन मिलता है । इस युद्ध के कारण राष्ट्रकूट 760 ई. तक दक्कन के सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे। यह युद्ध राष्ट्रकूटों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ । राष्ट्रकूटों की दक्षिण भारत में संप्रभुता स्थापित हो गई थी ।

गंग पर आक्रमण

कृष्ण प्रथम ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के तहत गंग राज्य पर आक्रमण कर दिया । राष्ट्रकूटों को अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली । लेकिन राष्ट्रकूटों ने अपनी हठ नहीं छोड़ी ओर वे बार-बार गंगो पर आक्रमण करते रहे । गंग नरेश श्रीपुरुष ने राष्ट्रकूटों का डटकर मुकाबला किया । इस संघर्ष में उनके अनेकों योद्धा मारे गए । श्रीपुरुष के छोटे पुत्र युवराज शिवमार ने राज्य की रक्षा का भार अपने ऊपर लेते हुए राष्ट्रकूटों को अनेकों बार टक्कर दी । लगातार युद्धों व संसाधनों की कमी की वजह से गंग ज्यादा समय तक राष्ट्रकूटों के आगे टिक नहीं पाए । अन्ततः राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम ने गंगों पर विजय प्राप्त कर ली । गंगों की राजधानी मान्यपुर व सम्पूर्ण गंग प्रदेश को राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया गया । हालांकि कृष्ण प्रथम ने श्रीपुरुष को एक सामंत के रूप में मान्यपुर पर शासन करने की अनुमति दे दी थी ।

वेंगी के चालुक्यों से संघर्ष

बादामी के चालुक्यों का विनाश करने के पश्चात अब कृष्ण प्रथम वेंगी के चालुक्यों को भी समाप्त कर देना चाहता था । कृष्ण प्रथम यह भली भांति जनता था कि यदि चालुक्यों को समाप्त नहीं किया गया तो ये अवश्य ही बादामी के चालुक्यों के विनाश का बदला लेने का प्रयत्न करेंगे । क्योंकि बादामी के चालुक्यों और वेंगी के चालुक्यों के मध्य वंश-रक्त संबंध था । 768 ई. में दोनों सेनाओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ । इस युद्ध में सेना का संचालन युवराज गोविंद ने किया । युद्ध मे राजकुमार गोविंद व उसकी सेना ने अदम्य साहस का परिचय दिया । वेंगी के चालुक्यों को हार का सामना करना पड़ा । इसके पश्चात युवराज गोविंद अपनी सेना के साथ चालुक्यों की राजधानी की तरफ बढ़ने लगा । ऐसी स्थिति में वेंगी के चालुक्य नरेश विष्णुवर्धन चतुर्थ ने राष्ट्रकूटों के समक्ष घुटने टेक दिए ।दोनों राज्यों के मध्य संधि हो गयी जिसके फलस्वरूप चालुक्यों द्वारा राष्ट्रकूटों को भारी हर्जाना व बड़ा भू भाग देना पड़ा। चालुक्यों ने राष्ट्रकूटों से भविष्य में किसी टकराव से बचने के लिए उनसे वैवाहिक संबंध स्थापित कर लिए । वेंगी चालुक्य नरेश ने अपनी पुत्री का विवाह युवराज गोविंद के अनुज ध्रुव के साथ कर दिया । 773 ई. में कृष्ण प्रथम की मृत्यु हो गई थी । कृष्ण प्रथम एक महान विजेता था । उसने अपनी योग्यता के बल पर सम्पूर्ण दक्षिण भारत के छोटे-बड़े राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया था । कृष्ण प्रथम दानशील व कला प्रेमी था । उसने अपने राज्य में अनेकों मंदिरों का निर्माण करवाया तथा ब्राह्मणों को दान दिया । उसने एलोरा की पहाड़ी को काटकर वहां एक मंदिर का निर्माण करवाया जो की आज ‘कैलाश मंदिर’ के नाम से जाना है ।

गोविन्द द्वितिय (773 ई.-780 ई.)

गोविन्द द्वितिय कृष्ण प्रथम का ज्येष्ठ पुत्र तथा उत्तराधिकारी था । 773 ई. में कृष्ण प्रथम की मृत्यु के पश्चात वह राष्ट्रकूट वंश का शासक बना । गोविन्द द्वितिय एक योग्य शासक था । उसने अपने पिता के शासनकाल के दौरान ही गंग के चालुक्यों के विरुद्ध अभियान में सफलता प्राप्त की थी ।

गोवर्धन तथा पारिजात विजय

उसने शासक बनने के बाद गोवर्धन तथा पारिजात नामक स्थाओं पर विजय प्राप्त की । राष्ट्रकूटों के दौलताबाद अनुदान पत्र में गोवर्धन नामक स्थान का उल्लेख है । इतिहासकारों के अनुसार यह स्थान वर्तमान में महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित है ।

ध्रुव का विद्रोह

ध्रुव गोविन्द का छोटा भाई था ।  अपने शासनकाल के शुरूआती वर्षों में उसने ध्रुव को नासिक तथा खान देश का शासक बनाया था ।  लेकिन शासक बनने के कुछ वर्षों बाद गोविन्द अपने राजधर्म के कार्यों से विमुख हो गया था । उसने शासन की बागडोर छोटे भाई ध्रुव के हाथों में सौंपकर भोग-विलास में लिप्त रहने लगा । ध्रुव बहुत ही योग्य व्यक्ति था । शासन की बागडोर हाथ में आते ही ध्रुव की मत्वकांक्षाएँ बढ़ने लगी । वह राष्ट्रकूट साम्राज्य का वास्तविक शासक बनना चाहता था ।  उसने शासनादेश अपने नाम से जारी करने प्रारम्भ कर दिए तथा साम्राज्य के सामन्तों को अपनी ओर मिला लिया । लेकिन जब गोविन्द को ध्रुव की इन करतूतों का पता चला तो उसने ध्रुव से समस्त शासाधिकार वापिस ले लिए ।  राष्ट्रकूट साम्राज्य में फूट जैसी स्थिति बन गयी । राष्ट्रकूट के प्रशसनिक अधिकारियों का मानना था कि गोविन्द ने साम्राज्य की छवि को ख़राब किया है , राष्ट्रकूट साम्राज्य के लिए ध्रुव के अतिरिक्त योग्य शासक कोई और नहीं है ।

स्थिति को अपने अनुकूल पाकर ध्रुव ने विद्रोह कर दिया । लगभग 780 ई. में उसने राष्ट्रकूटों की राजधानी पर आक्रमण कर अधिकार कर दिया । ध्रुव के इस विद्रोह में गोविन्द के मंत्रियों ,सामंतों व राज्य की जनता का समर्थन मिला ।

दोस्तों इससे आगे की जानकारी हम अगली कड़ी (राष्ट्रकूट राजवंश भाग-2) में देंगे । उम्मीद है आपको जानकारी पसन्द आयी होगी । अपने अनुभव साझा करने के लिए आप हमें कमेंट भी कर सकते हैं । भारतीय इतिहास से जुड़ी जानकारियों से हमेशा अपडेट रहने के लिए हमारे ब्लॉग को सब्सक्राइब कर लेवें, साथ ही आपसे अनुरोध है की हमारे पेज पर कहीं भी विज्ञापन दिखाई दे तो उन पर क्लिक जरूर करे ताकि हमें भी हमारी मेहनत का फल मिल जाये ।

 

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