शाक्य वंश का इतिहास

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग Jai Bharat पर । दोस्तों आज का युग वैज्ञानिक युग है । सूरज, चाँद, धरती, आकाश और पुरे ब्रह्माण्ड को हम वैज्ञानिक नजरिये से देखते हैं । यदि ब्रह्माण्ड में किसी भी प्रकार की घटना होती है तो वह एक विज्ञान का प्रश्न बन जाता है । हालांकि इसके साक्ष्य भी विज्ञान ने समय-समय पर दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किये हैं । लेकिन फिर भी कुछ सवाल ऐसे भी हैं जिनका स्पष्टीकरण आज तक विज्ञान भी नहीं दे पाया है । जैसे- इस ब्रह्माण्ड की रचना किसने की ? कौन है जो इसे चला रहा है ? कौन है जो हमारे पाप-पुण्य का हिसाब रखता है अथवा जिससे हम डरते हैं ?…….दोस्तों,कोई तो शक्ति है जो इस संसार को चला रही है……उसी शक्ति को हम ईश्वर कहते हैं । हमारा यही विश्वास है कि इस ब्रह्मांड को ईश्वर ने बनाया है बेशक विज्ञान इसके अस्तित्व का कोई आधार माने । आज विज्ञान ने इतनी तेजी से तरक्की की है कि हमें विज्ञान को स्वीकार करना भी आवश्यक है मगर इसके साथ ही विज्ञान भी ईश्वर के अस्तित्व को मानने लगा है । क्योंकि समय-समय पर कुछ ऐसी प्राकृतिक घटनाएं व चमत्कार होते रहे हैं जिन्होंने बड़े-बड़े विद्वानों और वैज्ञानिकों के तर्क को झकझोर दिया । दोस्तों ….ईश्वर का अस्तित्व है……वही है जो हमारे सत्कर्मों व दुष्कर्मों का लेखा-जोखा रखता है……वही है जिससे हम डरते हैं । ईश्वर ने ही इस ब्रह्मांड की रचना की और हम जीवों के लिए संसार बनाया ।

एक बार की बात है बुद्ध एक गांव से अपने शिष्य आनंद और स्वास्तिक के साथ निकल रहे थे तभी अचानक एक व्यक्ति आया और बुद्ध से पूछा तथागत(बुद्ध का दूसरा नाम) क्या ईश्वर है ? बुद्ध ने पूछा तुम्हे क्या लगता है ?आदमी ने सिर झुकाया और कहा तथागत मुझे तो लगता है की ईश्वर है,बुद्ध आनंद की तरफ देखकर मुस्कुराए और धीरे से कहा बिलकुल गलत लगता है तुम्हे,इस अस्तित्व में ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं है आदमी ने हाथ जोड़े और चला गया ।बुद्ध गांव की पगडण्डी पर आगे बढ़े।जैसे ही वो गांव से निकले गांव के बाहर एक ओर आदमी आया और उसने बुद्ध से पूछा तथागत में कई दिन से परेशान हूँ मुझे लगता है कि ईश्वर और भगवान की बातें महज एक बकवास है ।बुद्ध आनंद और स्वास्तिक की तरफ देखकर थोड़ा मुस्कुराये और बड़े ही प्रेम से उस आदमी से कहा तुम्हे बिलकुल गलत लगता है इस अस्तित्व में केवल ईश्वर ही है और कुछ नहीं , जरा देखो अपनी, आँखें बंद करो और खोजो परमात्मा का अस्तित्व है । इस जबाब को सुनकर आनंद और स्वास्तिक आश्चर्य में पड़ गए की एक ही सवाल और दो जवाब ।

दूसरे दिन की बात है एक गाँव से बाहर रात्रि विश्राम के लिए बुद्ध रुके हुए थे । स्वास्तिक और आनंद दोनों थक गए थे ।तभी वहां अचानक एक घबराये हुए व्यक्ति का प्रवेश हुआ,वह बुद्ध के पास आया और जोर से कहा तथागत क्या ईश्वर है या नहीं है, मैं कई दिन से परेशान हूँ,मैं खोज रहा हूँ,मेरा मार्गदर्शन करें । इस तीसरे आदमी के सवाल पर बुद्ध चुप हो गये कुछ नहीं बोले मौन हो गए और आँखें बंद कर ली ।आनंद और स्वास्तिक के आश्चर्य का ठिकाना न रहा,एक जैसे तीन सवाल और तीनों के अलग-अलग जवाब, बुद्ध की ये चुप्पी हैरान कर गयी ।व्यक्ति के जाते ही आनंद से रहा ना गया और पूछ बैठा तथागत, कल से लेकर आज तक तीन व्यक्ति एक जैसे सवाल लेकर मिले,मैं हैरान हूँ की आपने तीनों का अलग-अलग जवाब दिया कुछ समझ में नहीं आ रहा है ।बुद्ध स्वास्तिक की तरफ देखकर थोड़ा मुस्कुराये और बोले आनंद, जो पहला व्यक्ति आया था उसने मान लिया था कि ईश्वर है,मैं उसकी मान्यता को मिटा देना चाहता था ताकि वो खोजना शुरू करे । ईश्वर है ये मानकर बैठ ना जाये, उस सत्य तक पहुंचे ।दूसरे व्यक्ति ने भी मान लिया था कि ईश्वर की बातें कोरी हैं,मैंने उसकी भी धारणा को मिटा दिया ताकि वह खोजे कि ईश्वर है या नहीं और तीसरा व्यक्ति अभी संयस में ही था वह खोज रहा था,मैं वहां मौन रह गया वहां मौन रह जाना ही उचित था ताकि वह खोजता रहे, और इसका जवाब अपनी खोज और परिश्रम से वह सवयं प्राप्त करे।इस संसार में कुछ भी मानने वाले लोग, जानने से चूक जाते हैं,उनका विकास रुक जाता है,जिनका स्वयं का कोई बोध नहीं,वो सत्य क्या है कभी नहीं जान पाते ।जान वही पता है जो निरंतर खोजते रहते हैं,जानने की यात्रा मुश्किल है,मानना आसान है,मानाने में कोई खर्च नहीं है,कोई परिश्रम नहीं है,किसी ने कह दिया,समझा दिया,मान लिया और मान कर रूक जाने वाले लोग इस संसार के सबसे अभागि प्राणी हैं ।ईश्वर का अस्तित्व है जरुरत है तो बस स्वयं खोजने की,जिसके लिए वो दो आस्था के नयन चाहिए और एक एकाग्र मन ।

कौन हैं शाक्य

आज हम यहाँ बात करेंगे शाक्य वंश की कि शाक्य कौन थे,ये कहाँ से आये थे,शाक्य वंश कब अस्तित्व में आया यानि इस वंश की शुरूआत कहाँ से होती है ।दोस्तों,सभी जानते हैं की सृष्टि की रचना भगवान् ब्रह्मा ने की थी ।ब्रह्मा जी ने सृष्टि में मनुष्य की रचना के लिए कई मनुओं की रचना की जिनमे से प्रथम मनु था सवयंभू मनु जिसके साथ प्रथम स्त्री शतरूपा थी ।मनु से ही हम, मानव,मनुष्य कहलाए व अंग्रेजी भाषा का Man,human शब्द भी मनु नाम से मिलता-जुलता है ।हम सभी उसी स्वयंभू मनु की संताने है ।एक मनु के काल को मन्वन्तर कहा जाता है ।स्वयंभू मनु के कुल में आगे चलकर 14 मनु हुए जिनमे से एक थे वैवस्वत मनु और वर्तमान में जो मन्वन्तर चल रहा है उसके प्रथम पुरुष वैवस्वत मनु हैं ।यही वो वैवस्वत मनु हैं जिनके दस पुत्र हुए जिनमे से एक पुत्र का नाम था ईक्ष्वाकु और इन्ही से शुरू होता है इक्ष्वाकु वंश।

इक्ष्वाकु वंश

राजा भगीरथ इसी ईक्ष्वाकु वंश से थे जो गंगा को स्वर्ग से उतारकर धरती पर लाये थे तथा राजा सगर और भगवान राम भी इक्ष्वाकु वंश से ही थे ।वैवस्वत मनु के 10 पुत्रों के नाम क्रमशः 1.इल्ल, 2.इक्ष्वाकु, 3.कुशनाम, 4.अरिष्ट, 5.धृष्ट, 6.नरिष्यन्त, 7.करुष, 8.महाबली, 9.शर्याति और 10.पृषध थे ।इसमें इक्ष्वाकु के कुल का ही मुख्य रूप से विस्तार हुआ ।

दोस्तों,इक्ष्वाकु वंश की सम्पूर्ण वंशावली हम आपको किसी अन्य पोस्ट में बताएंगे । हम यहाँ पर इस वंश की वंशावली का संक्षिप्त विवरण दे रहे हैं ।इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश की शुरुआत होती है। इक्ष्वाकु के 100 पुत्र थे इनमें मुख्य तीन थे 1.विकुक्षि,2.निभी और 3.दंड ।इसमें विकुक्षि का वंश आगे बढ़ा इसी वंश के युवानश्र्व से मान्धाता चक्रवर्ती हुए ।मान्धाता से मन्धाता वंश प्रारम्भ होता है ।

मन्धाता वंश

मान्धाता ने बिन्दुमती से विवाह किया जो शतबिंदु की पुत्री थी ।मान्धाता के 3 पुत्र और 50 पुत्रियां हुईं । इसके तीन पुत्र पुरुकुत्स,अम्बरीष और मुचकुन्द थे ।इसी वंश में राजा सगर हुए जिनकी दो पत्नियां थीं कश्यप की पुत्री सुमति तथा विदर्भ राज की पुत्री केशनी ।राजा सागर की पहली पत्नी सुमति से 60,000 पुत्र हुए जो कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे तथा दूसरी पत्नी केशनी से असमंजस हुआ जो बड़ा ही दुराचारी था,असमंजस से अंशुमान हुए,अंशुमान से दलीप तथा दलीप से भगीरथ हुए जो गंगा नदी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाये थे ।

इस वंश के दीर्घबाहु से रघु नामक पुत्र हुआ जो रघुवंशी कहलाए तथा इन्हीं से रघु कुल का आरम्भ होता है ।रघु से अज्ज ,अज्ज से दशरथ, दशरथ से श्रीरामचंद्र,लक्ष्मण,भरत तथा शत्रुघ्न नामक पुत्र हुए ।राम।। राम।। राम ।।

रघुवंश

श्रीरामचंद्र के कुश और लव,लक्ष्मण के अंगद और चन्द्रकेत,भरत से तक्ष और पुष्कल तथा शत्रुघ्न से सुबाहु और शूरसेन नामक पुत्र हुए ।

कुश वंश

श्रीरामचन्द्र के पुत्र कुश से कुश वंश आरम्भ होता हैं,कुश से अतिथि ,अतिथि से निषध,निषध से अनल,अनल से नभ तथा इसी श्रंखला में बृहद्बल,दिवाकर,बृहदश्व,भानुरथ,बृहद्राज,धर्मी और कृतंजय हुए तथा कृतंजय से रणन्जय,रणन्जय से संजय और संजय से शाक्य हुए ।दोस्तों ये किंवदंती नहीं बल्कि श्रीविष्णुपुराण में उल्लेखित बड़ा सत्य है ।

शाक्य वंश

इस प्रकार शाक्य से शाक्य वंश का आरम्भ होता है,यहीं से यह वंश अस्तित्व में आता है ।दोस्तों विदित रहे उपर्युक्त सभी वंश इक्ष्वाकु वंश की ही शाखा है ।इस प्रकार शाक्य से राजा शुद्धोधन तथा शुद्धोधन से सिद्धार्थ(महात्मा बुद्ध) हुए ।जिन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की और दुनिया को सत्य,अहिंसा और परोपकार की राह दिखाई ।

शाक्यों का नरसंहार

प्रसेनजित को कोशल राज्य अपने पिता से वंश परम्परा के अंतर्गत प्राप्त हुआ था।प्रसेनजित ने मगध की मित्रता प्राप्त करने के लिए अपनी बहिन महाकोशला का विवाह मगध सम्राट बिम्बिसार से कर दिया।प्रसेनजित एक महत्वकांक्षी सम्राट था जिसने सम्राट बनते ही सर्वप्रथम शाक्यों के राज्य पर आक्रमण किया और शाक्यों को परास्त कर दिया।शाक्यों के पराजित होने पर तत्कालीन राजनीतिक परम्परा के अनुसार प्रसेनजित ने शाक्य राजकुमारी से अपने विवाह की मांग की (यह उस समय राजनीतिक परम्परा थी कि विजित सम्राट को अपनी कन्या का विवाह विजेता सम्राट से करना पड़ता था) ।

परन्तु शाक्य वंश के लोग रक्तशुद्धि को अधिक महत्व देते थे ओर इस बात पर दृढ़ रहे कि वो अपनी कन्या का विवाह प्रसेनजित से नहीं करेंगे ।इस प्रकार शाक्यों ने छलपूर्वक प्रसेनजित का विवाह एक अत्यंत नीच कुल की कन्या वासव खत्रिया से सम्पन्न कराया जिसके एक पुत्र हुआ विरुद्धक ।

एक बार राजकुमार विरुद्धक अपने ननिहाल कपिलवस्तु गया जहां उसका अपमान किया गया ।जिन संस्थागारों ओर आसनों पर वह बैठा था उन्हें दूध से धुलाया गया।इस घटनाक्रम का सम्पूर्ण विवरण उपन्यासकार चतुरसेन द्वारा रचित ‘वैशाली की नगरवधू’ में मिलता है।

जब विरुद्धक कपिलवस्तु से चला गया तो उसका एक सामन्त अपना भाला कपिलवस्तु भूल आया था जब सामन्त वहां पहुंचा तो उसने देखा कि संस्थागारों और आसनों को दूध से धोया जा रहा तथा एक दासी उसे गालियां भी दे रही थी और कह रही थी कि नीच जाती के अधम ने संस्थागारों को अपवित्र कर दिया।

जब विरुद्धक ने वापिस आकर उसने शाक्यों द्वारा अपने पिता प्रसेनजित के साथ किये गए इस षड्यंत्र की जानकारी प्रसेनजित को दी तो प्रसेनजित ने कुपित होकर विरुद्धक ओर उसकी माता वासव खत्रिया को ही राज्य से निष्कासन का दंड दे दिया । इस अपमान से क्रोधित होकर विरुद्धक ने प्रण लिया जिस स्थान को शाक्यों ने दूध से धुलवाया था उस स्थान को वह शाक्यों के खून से धोयेगा तथा शाक्यों का समूल विनाश कर देगा । उसने कौशल का सिंहासन प्राप्त करने के लिए अपने पिता प्रसेनजित के विरुद्ध षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया ।उसने श्रावस्ती को छोड़कर आसपास के क्षेत्रों में लूटमार करना शुरू कर दिया ।विरुद्धक ने कौशल को प्राप्त करने के लिए अजातशत्रु से सहायता भी मांगी परंतु वज्जिरा से अजातशत्रु के विवाह ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया ।विरुद्धक अपने सतत प्रयासों ओर कूटनीति षड्यंत्रो तथा अमात्यों की मदद से अपने उद्देश्य में सफल रहा।

उसने कौशल में अपना राज्याभिषेक करवाया तथा राज्याभिषेक के पश्चात वह विदूड़भ कहलाया ।कौशल का सम्राट बनने के तुरंत बाद शाक्यों के विनाश का अपना प्रण पूरा करने के लिए अपने हजारों सैनिकों के साथ कपिलवस्तु जा पहुंचा ओर शाक्यों पर हमला कर दिया ।देखते ही देखते  हजारों शाक्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया, रक्त की नदी बह चली, घोड़ों की हिनहिनाहट पूरे आसमान में गूंजने लगी। चारों तरफ औरतों ओर बच्चों की चीत्कार सुनाई दे रही थी जिससे सारा वातावरण भयावह हो गया था ।ऐसा कहा जाता है कि शाक्यों का संहार करने के पश्चात जब विरुद्धक वापिस जा रहा था तो रास्ते में वह एक भयंकर तूफान में फंस गया था तथा अपने सैनिकों सहित अचिरावती नदी (वर्तमान राप्ती नदी) में बह गया और मारा गया ।

शाक्य वंश की शाखाएं

दोस्तों,इस नरसंहार के पश्चात जो थोड़े बहुत शाक्यों के परिवार बच कर भाग गए थे वो कपिलवस्तु के उत्तर में स्थित पहाड़ियों में छुपकर रहने लगे तत्पश्चात वे बिहार में भाग आये और गंगा के मैदानी भागों में पिप्पलिवन नामक स्थान पर रहने लगे और कालन्तर में ये अपने जीवन यापन के लिए सब्जी उगाने,फूलों की खेती करने और बाग उगाने के कार्य करने लगे ।इस नरसंहार ने शाक्यों को झकझोर कर रख दिया,उनके जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल गयी ।दुर्भाग्य ये रहा की शाक्य वंश के लोग बिखर गए और अलग -अलग स्थानों पर रहने के कारण ये वंश कई उपजातियों व शाखाओं में बंट गया जैसे: मौर्य, कुशवाहा, काछी,सैनी,सक्सेना,मुराव,महतो इत्यादी ।

पिप्पलिवन में मोरों(Peacocks) के आधिक्य के कारण यहां पर रहने वाले शाक्यों को मौर्य कहा जाने लगा ओर यहीं से ही एक नए वंश की शुरुआत होती है जिसमें चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक जैसे महान सम्राट हुए जिन्होंने अखंड भारत का निर्माण किया ।ये वंश मौर्य वंश के नाम से विश्वप्रसिद्ध है।

वर्तमान भारत में शाक्यों की स्थिति

दोस्तों,आज हमने आपको बताया कि शाक्य वंश की जड़ें कहाँ से प्रस्फुटित हुईं।दोस्तों आज शाक्यों का राजवंश तो समाप्त हो चुका है परन्तु शाक्य वंश के लोग आज भी हैं जो भारत,नेपाल,बांग्लादेश,बर्मा,श्रीलंका,तिब्बत जैसे देशों में निवास कर रहें हैं । दोस्तों जिस वंश ने भारत में जन्म लिया जिसनें पूरे विश्व को शांति और प्रेम का संदेश दिया जिसने अखंड भारत का निर्माण किया और भारत को वैश्विक पहचान दिलाई, बड़ी ही व्यथा की बात है आज अपने ही देश मे उनकी अपनी पहचान खतरे में है ,उनका अस्तित्व खतरे में है जबकि नेपाल,बांग्लादेश,बर्मा,श्रीलंका और तिब्बत जैसे देशों में इनका सम्मानजनक स्थान है ।

बौद्ध मत

दोस्तों,हम सब सनातन धर्म से हैं और सभी धर्म सनातन धर्म से ही निकले हैं ।ऐतेहासिक दृष्टि से देखा जाए तो खुद महात्मा बुद्ध ने कोई धार्मिक प्रचार-प्रसार में कभी रूचि नही ली उन्होंने तो मात्र अपनें विचारों को दुनिया के समक्ष रखा ।

लेकिन उनकी उदारता के कारण न केवल समकालीन सम्राटों का उन्हें समर्थन मिला बल्कि उनको समाज की मुख्य धारा से बाहर हुए लोगों का भी सहयोग मिला ।महात्मा बुद्ध के महापरिवान (मृत्यु) के समय तक बौद्ध का विचार काफी हद तक हिंदुस्तान में फैलने लगा था ।लेकिन उनकी मृत्यु के 200 वर्षों पश्चात् सम्राट अशोक के समय बौद्ध धर्म की महत्ता काफी बढ़ गयी थी ।सम्राट अशोक के समय बौद्ध मत केवल सनातन धर्म की ही एक शाखा के रूप में ही था परन्तु कनिष्क के समय बौद्ध धर्म का एक अलग धर्म के रूप में प्रचार आरम्भ हो गया था । दोस्तों ये बड़ी ही विडंबना की बात है की जो धर्म भारत में जन्मा,भारत में पनपा और यहाँ से दूर-दूर के देशों तक फैला वही धर्म आज भारत में ही बड़ी मुश्किल से पहचाना जाता है । आज भी ये धर्म नेपाल,श्रीलंका, तिब्बत,चीन,बर्मा, कम्पूचिया और जापान जैसे देशों में जीवित है । जावा,सुमात्रा,बाली सहित कोरियाई प्रायद्वीप और चीन तथा जापान तक इसका प्रसार कनिष्क के काल तक हो चुका था । सम्राट अशोक बौद्ध धर्म को सनातन धर्म से अलग देखने की बजाय उसे सनातन धर्म में ही देखना चाहते थे ।लेकिन ये धर्म एक अलग धर्म के रूप में दुनिया के समक्ष आया शायद इसका मुख्य कारण उस समय हिन्दू धर्म में सामाजिक अत्याचार,ऊंच-नीच व छुआछूत जैसी खामियों का व्याप्त होना था ।

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