भारत पर हूण आक्रमण

हूण मध्य एशिया की एक खानाबदोश एवं बर्बर जाती थी । हूणों ने 455 ई. में भारत पर पहला आक्रमण किया जिन्हें तत्कालीन गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त ने भारत से बाहर खदेड़ दिया । स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में बताया गया है कि उसने मलेच्छों (हूणों) पर सफलता प्राप्त की थी । हूणों पर इसी विजय के उपलक्ष्य में स्कन्दगुप्त ने ‘विष्णु स्तम्भ’ बनवाया था । हूणों ने गुप्त साम्राज्य में बहुत भयंकर लूटपाट जिससे गुप्तों की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई अतः इस विकट स्थिति से बचने के लिए स्कंदगुप्त को अपने सिक्कों में मिलावट करनी पड़ी ।

हूण कौन थे ?(Who were Huns?)

हूण वास्तव में कौन थे तथा इनका मूल निवास स्थान कहाँ था यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है । लेकिन यदि इतिहासकारों की मानें तो ये मूल रूप से उत्तरी चीन स्थित मंगोल के निवासी थे । यह एक खानाबदोश जाती थी जो संसाधनों की खोज में वहां से निकलकर दो कबीलों में बंट गई । चौथी शताब्दी के अंत में इनका एक कबीला वोल्गा नदी की तरफ चला गया तथा दूसरा कबीला ऑक्सस नदी घाटी (आमू दरिया,वक्षु नदी) में जाकर बस गया । हूणों का जो कबीला ऑक्सस घाटी की ओर गया था उसने अपने धीरे-धीरे फारस (ईरान) में लूटपाट मचाना शुरू कर दिया । कुछ इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान की गुर्जर जाति हूणों के वंशज ही हैं । हूण सम्राज्य के पतन के पश्चात लगभग 8वीं शताब्दी में गुर्जरों ने नागभट्ट के नेतृत्व में सत्ता स्थापित कर ली थी । मिहिर शब्द संभवतः इनकी उपाधि रही होगी । आज भी गुर्जरों को सम्मान से मिहिर बोला जाता है जैसे उस समय में गुर्जर-प्रतिहार शासक भोज ने इस उपाधि अथवा सम्मानसूचक शब्द का उपयोग किया तथा मिहिरभोज कहलाया । संभवतः ये लोग हूण शासक मिहिरकुल को अपना पूर्वज अथवा आदर्श मानते थे । कुछ विद्वानों के अनुसार हूण आर्य थे । जो भी हो लेकिन स्पष्ट प्रमाणों के अभाव में यह कहना मुश्किल है कि गुर्जर वास्तव में हूण ही थे ।

हूण वंश का इतिहास (History of hun dynasty)

433 ई. में अत्तीला नामक हूण इस कबीले का शासक बना । धीरे-धीरे इनकी एक शाखा यूरोप की तरफ बढ़ी । हूणों ने अत्तीला,भाई ब्लेदा तथा चाचा रुआस के नेतृत्व में रोम में भयंकर उत्पात मचाया और वहां के महान रोमन साम्राज्य नष्ट कर हूण साम्राज्य स्थापित किया । अत्तीला एक बहुत ही क्रूर हूण शासक था । 450 ई. तक यूरोप में वह दहशत का पर्याय बन चुका था । उसकी इसी क्रूरता के कारण उसे भगवान का कोड़ा (Whip of God/Scourge of God) कहा जाता था । यूरोप की तरफ बढ़ने वाला हूण दल काले हूण’ तथा ईरान व भारत की तरफ आने वाला दल ‘श्वेत हूण’ कहलाया । 455 ई. में हूणों की इस शाखा ने भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा स्थित गांधार पर धावा बोल दिया । इसके पश्चात हूणों ने गुप्त साम्राज्य में जमकर लूटमार की । तत्कालीन गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त ने उन्हें पीछे धकेल दिया । बाद के हूण आक्रमणों ने गुप्त अर्थव्यवस्था को काफी आघात पहुंचाया जिसके चलते गुप्त सम्राटों को सिक्कों में मिलावट करनी पड़ी । इसके पश्चात लगभग 30-40 वर्षों तक गुप्त साम्राज्य हूणों के आतंक से मुक्त रहा । इस दौरान हूणों ने भारत की तरफ से अपना ध्यान हटाकर ईरान में लूटपाट में लगाया ।

तोरमाण (500 ई.-512 ई.)

500 ई. के बाद तोरमाण के नेतृत्व में हूणों ने भारत पर कई बार आक्रमण किये जिसके फलस्वरूप पंजाब में उन्हें सफलता मिली । वह भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता था । उसने पंजाब के रास्ते गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण किया तथा अन्तर्वेदी के गंगा-जमुना दौआब को कोशाम्बी तक जीत लिया । 510 ई. में वह मालवा की तरफ बढ़ा तथा उसने मालवा के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया । उस समय तक गुप्त साम्राज्य तीन शाखाओं में बंट चुका था । मालवा शाखा का तत्कालीन गुप्त शासक भानुगुप्त था जो तोरमाण को रोकने में असफल रहा । मध्यप्रदेश के एरण नामक स्थान से भानुगुप्त के एक मंत्री गोपराज का अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमे यह उल्लेख मिलता है कि वह हूणों के साथ युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया तथा उसकी पत्नी सती हो गयी थी । यह अभिलेख 510 ई. के आसपास का है । 512 ई. में अपनी मृत्यु तक तोरमाण ने सम्पूर्ण गंगा घाटी पर अधिकार कर लिया था ।

मिहिरकुल (512 ई.-530 ई.)

तोरमाण की मृत्यु के पश्चात मिहिरकुल 512 ई. में हूणों का शासक बना । वह एक क्रूर शासक था । उसकी क्रूरता के कारण ही उसे भारत का अत्तिला कहा जाता है । उसने पंजाब स्थित साकल (सियालकोट) अपनी राजधानी बनाया । वह भारत पर अपने सभी अभियानों का संचालन यहीं से करता था ।

ग्वालियर अभिलेख के अनुसार मिहिरकुल ने खुद को शिव भक्त कहा है । उसने अपने शासनकाल में सैंकड़ों शिव मंदिर बनवाये । कल्हण की रचना राजतरंगिणी के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर का निर्माण करवाया तथा कश्मीर में ही मिहिरपुर नामक नगर की स्थापना की । मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा पाया गया है जिसका तातपर्य है जय नंदी । इससे यह स्पष्ट होता है कि वह शैव धर्म का कट्टर समर्थक था । चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार मिहिरकुल बौद्ध धर्म का प्रबल विरोधी था । ह्वेनसांग के अनुसार मिहिरकुल बौद्ध धर्म को जानने का इच्छुक था अतः उसने बौद्ध गुरु से उसके यहाँ आने का निमंत्रण भेजा लेकिन बौद्ध भिक्षु उसकी क्रूरता से घबराकर उसके पास बौद्ध गुरु को भेजने की बजाय एक सेवक को बौद्ध गुरु बनाकर भेज देते हैं । मिहिरकुल इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाया अतः वह बौद्धों का कट्टर शत्रु बन जाता है । उसने उत्तर-भारत में स्थित सभी बौद्ध मठों को नष्ट कर दिया तथा अनेकों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करवा दी । उसने उत्तर भारत से बौद्ध धर्म को पूरी तरह उखाड़ फेंका । मिहिरकुल ने नालंदा विश्वविद्यालय को भी काफी क्षति पहुंचाई ।

मिहिरकुल ने अपने शासनकाल में मारवाड़ (पश्चिमी राजस्थान),उत्तर-पश्चिम में गांधार, सिन्धु घाटी के क्षेत्र, ग्वालियर, मालवा,कश्मीर,पंजाब तथा उत्तर भारत के कई छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था । उसने मगध के गुप्त साम्राज्य पर कई बार आक्रमण किया तथा उनके कुछ क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया । उस समय मगध का गुप्त शासक बालादित्य (नरसिंहगुप्त) था । मिहिरकुल इन अधीन क्षेत्रों की एवज में बालादित्य से नजराना वसूलता था । लेकिन कुछ समय पश्चात जब बालादित्य की स्थिति मजबूत हो गई तो उसने मिहिरकुल को नजराना देने से इंकार कर दिया जिससे दोनों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई । इसके अलावा बालादित्य मिहिरकुल को अपना घोर शत्रु इसीलिए मानता था क्योंकि उसने बौद्ध धर्म का बहुत हानि पहुंचाई थी । बालादित्य बौद्ध धर्म का कट्टर समर्थक था ।

मिहिरकुल ने 528 ई. में गुप्तों की मगध शाखा पर आक्रमण कर दिया था । दोनों के मध्य इस संघर्ष में मिहिरकुल को मुंह की खानी पड़ी । मिहिरकुल को वहां से भागना पड़ा लेकिन  उसे पकड़कर बंदी बना लिया गया । कुछ समय बाद अपनी माँ के आदेश पर बालादित्य ने मिहिरकुल को छोड़ दिया ।

मालवा में यशोधर्मन ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी । वह सम्भतः गुप्तों का सामंत था । 530 ई. में यशोधर्मन तथा मिहिरकुल के मध्य युद्ध हुआ जिसमें मिहिरकुल को पराजित होकर भागना पड़ा ।  यह मिहिरकुल की दूसरी पराजय थी । यशोधर्मन ने हूणों को खदेड़कर सम्पूर्ण मालवा क्षेत्र को हूणों से मुक्त कराया । मिहिरकुल को भागकर कश्मीर के राजा की शरण लेनी पड़ी । तत्पश्चात मिहिरकुल धोखे से राजा की हत्या कर कश्मीर का शासक बन गया । 12वीं शताब्दी में कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी में कश्मीर तथा वहां के शासकों का विस्तृत उल्लेख मिलता है । कश्मीर पर अधिकार करने के लगभग एक या दो वर्षों बाद ही मिहिरकुल की मृत्यु हो जाती है । मिहिरकुल की मृत्यु के साथ ही हूणों का शासन समाप्त हो जाता है तथा हूण भारत में ही स्थायी रूप से बस जाते हैं ।

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