गयासुद्दीन बलबन व उसके उत्तराधिकारी~गुलाम वंश

गयासुद्दीन बलबन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था । वह इल्बारी जाती का तुर्क था । मंगोलों से बगदाद के ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी द्वारा उसे खरीदकर दिल्ली के बाजारों में बेंचने के लिए लाया गया । 1233 ई. में इल्तुतमिश ने बलबन को खरीदकर अपना गुलाम रख लिया ।  इल्तुतमिश ने उसे चालिसा का सदस्य बनाया । राजिया सुल्तान के समय वह अमीर-ए-शिकार के पद पर था । इसके पश्चात बलबन 20 वर्षों तक नासिरुद्दीन महमूद के वजीर के रूप में कार्यरत रहा। अंतिम बार नासिरुद्दीन महमूद द्वारा उसे नायब-ए-मुमलकत का पद प्रदान किया गया । 1249 ई. में नासिरुद्दीन महमूद ने बलबन उलूग खाँ की उपाधि दी । इसी वर्ष बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह भी नासिरुद्दीन महमूद से कराया था वहीं सुल्तान ने भी अपनी पुत्री का विवाह बलबन के पुत्र बुगरा खाँ से कराया ।नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल से ही शासन की वास्तविक जिम्मेदारी बलबन के हाथों में थी ।नसुरुद्दीन महमूद की मृत्यु के पश्चात 1265 ई. में वह दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठा । बलबन के गद्दी पर बैठने के साथ ही सल्तनत में एक नए वंश बलबनी वंश की शुरुआत हुई ।

बलबन की शासन व्यवस्था

बलबन का राजत्व सिद्धान्त लौह व रक्त नीति तथा प्रतिष्ठा, शक्ति व न्याय पर आधारित था । उसके दरबार में शालीनता बरती जाती थी । बलबन ने सुल्तान बनते ही शराब को त्याग दिया । वह राजत्व के दैवीय सिद्धांत को मानता था । उसके अनुसार सुल्तान संसार में ईश्वर का प्रतिनिधि(नायब-ए-खुदाई) होता है तथा पैगम्बर के बाद सुल्तान का स्थान होता है । उसने अपने पुत्र बुगरा खाँ से कहा कि एक राजा में देवत्व का अंश होता है तथा एक मनुष्य से उसकी तुलना नहीं कि जा सकती। उसने जिल्ल-ए-इलाही(ईश्वर की छाया) की उपाधि धारण की तथा इसे अपने सिक्कों पर अंकित कराया । मुहम्मद बिन तुगलक व फिरोजशाह का समकालीन इतिहासकार और राजनैतिक विचारक जियाउद्दीन बरनी द्वारा रचित कृति तारीख-ए-फिरोजशाही में बलबन के राजत्व सिद्धांत की विवेचना की गई है ।

बलबन ने स्वयं को ईरान के पौराणिक शासक अफरासियाब का वंशज बताया जिसका वर्णन फिरदौसी की रचना शाहनामा में भी मिलता है । बलबन ने अपने शासन को ईरानी आदर्श के आधार पर व्यवस्थित किया । सामंतो की गतिविधियों पर नजर रखने हेतु बलबन द्वारा पहली बार गुप्तचर विभाग (दीवान-ए-बरीद) की स्थापना की गई ।

तुर्क विद्रोह का दमन व चालीसा का अंत

अपने पद की प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए बलबन ने सर्वप्रथम चालीसा का दमन किया । चालीसा यानी चालीस अमीरों का समूह (तुर्कान-ए-चहलगानी) जिसमें इल्तुतमिश ने प्रशानिक कार्यों में सहयोग व सलाह लेने हेतु अपने विश्वासपात्र मंत्रियों को शामिल किया था । सुल्तान के पास नाममात्र के अधिकार होते थे जबकि शासन की वास्तविक शक्तियां चालीसा के हाथों में होती थी । सुल्तान को कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले चालीसा की सलाह लेनी होती थी । सुल्तान ने बड़ी ही क्रूरतापूर्वक इस समूह का दमन किया । इसके अलावा बलबन ने अपने सभी विरोधी व्यक्तियों की हत्या करवा दी तथा उनके स्त्री व बच्चों को अपना गुलाम बना लिया । बलबन ने अपने चचेरे भाई शेरखां को भी जहर देकर मरवा डाला ।

वजीर के महत्व को कम कर दिया गया तथा आगे चलकर नायब का पद भी समाप्त हो गया । उसने दीवाने अर्ज (सैन्य विभाग) की स्थापना की तथा इमाद-उल-मुल्क को सेनाध्यक्ष बनाया । उसने अपने दरबार में ईरानी (फारसी) प्रथाओं जैसे सिजदा (घुटने के बल बैठकर सुल्तान के समक्ष सिर झुकना), पायबोस (सुल्तान के पैर चूमना) व नौरोज (ईरानी त्यौहार) आदि की शुरुआत की । बलबन ने अपने पौत्रों के भी फारसी नाम कैकुबाद, कैखुसरो व क्यूमर्स आदि रखे । इसके अलावा बलबन ने अपने सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित करवाया तथा उनके नाम से खुतबे भी पढ़े गए ।

वह योग्यता के आधार पर अपनी सेना का चयन करता था । उसने सैनिक सेवाओं के बदले दी गई जागीरों की जांच कराई एवं अयोग्य सैनिकों को पेंशन देकर सेवामुक्त किया । उसने बदायूँ के गवर्नर बकबक को जनता के सामने कोड़े लगवाये, अवध के शासक हैवात खाँ को भी उसने 500 कोड़ों की सजा दी वहीं बंगाल के सूबेदार तुगरिल के हाथों पराजित होने के कारण अवध के सूबेदार अमीन खाँ को बलबन ने अयोध्या के फाटक पर लटकवा दिया ।

सल्तनत में समय-समय पर सामंतों द्वारा विद्रोह की घटनाएं होती रहती थीं । बंगाल की राजधानी लखनौती को उन दिनों विद्रोह के नगर के रूप में जाना जाता था । यहां के प्रांतपाल तुगरिल द्वारा अक्सर सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह कर दिया जाता था । 1279 ई. में तुगरिल ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर मुगिसुद्दीन की उपाधि धारण की तथा खुतबा पढ़वाकर अपने नाम के सिक्के भी चलवा दिए । बलबन ने मलिक मुकद्दिर के नेतृत्व में बंगाल के विद्रोह को दबा दिया । तुगरिल को पकड़ने व उसकी हत्या करने पर बलबन ने मलिक मुकद्दिर को तुगरिलकुश (तुगरिल की हत्या करने वाला) की उपाधि प्रदान की । इसके अलावा बलबन ने मेवात (अलवर), दोआब क्षेत्र, अवध व कटेहर (बुंदेलखंड) में हिन्दू विद्रोहों का भी दमन किया ।

बलबन के समय मंगल प्रभाव

बलबन ने अपना ज्यादातर ध्यान मंगोलों को नियंत्रित करने पर रखा । उसने मंगोलों से निपटने के लिये सैनिक व कूटनीतिक दोनों प्रयास किये । मंगोल आक्रमणों से बचने के लिए उसने पश्चिमोत्तर सीमा पर कई किले बनवाये । बलबन ने अपना एक दूत मंगोल आक्रमणकारी हलाकू के पास भेजा जिसके बदले में 1260 ई. में हलाकू ने भी अपना एक दूत बलबन के दरबार में भेजकर सीमान्त प्रदेशों पर आक्रमण ना करने का आश्वासन दिया । बलबन ने इन सीमावर्ती क्षेत्रों को दो भागों में बांट दिया । सुमन व समाना के प्रांत अपने छोटे पुत्र बुगरा खाँ को व सिंध,मुल्तान व लाहौर का क्षेत्र अपने बड़े पुत्र मुहम्मद खाँ को दिये । 1286 ई. में तैमूर खाँ के नेतृत्व में मंगोलों ने पुनः आक्रमण कर दिया । बलबन का बड़ा पुत्र मुहम्मद खाँ मंगोलों से लड़ता हुआ मारा गया । बलबन ने शहजादा मुहम्मद को शहीद की उपाधि दी । वह अपने बेटे मुहम्मद खाँ की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाया । अंततः लगभग 80 वर्ष की आयु में 1286 ई. को बलबन की मृत्यु हो गई । अपनी मृत्यु से पहले उसने अपने छोटे बेटे बुगरा खाँ को उत्तराधिकार संभालने के लिए निमंत्रण भेजा था लेकिन उसके ना आने की स्थिति में उसने अपने पौत्र कैखुसरो (मुहम्मद खाँ का पुत्र) को उत्तराधिकारी घोषित किया ।

बलबन का मूल्यांकन

बलबन वास्तव में एक क्रूर शासक था । उसने क्रूरतापूर्वक अपने सभी शत्रुओं को मौत के घाट उतार दिया । इतिहासकार हबीबुल्लाह ने बलबन के शासन काल को सुदृढ़ीकरण का काल कहा है । उसने सुल्तान की महत्ता को कम करने वाले सभी पदों व संघों को नष्ट कर दिया । इक्तदारों पर नियंत्रण रखने हेतु 1279 ई. में उसने ख्वाजा नामक अधिकारी को नियुक्त किया । बलबन ने इक्ता को अपने उत्तराधिकारियों को स्थानांतरित करने पर रोक लगा दी तथा अधिशेष की राशि इक्ता से सुल्तान के कोषागार में मंगवा ली ।

बलबनी शासक विद्वानों व साहित्यकारों के आश्रयदाता थे । मुस्लिम साहित्यकार अमीर खुसरो व अमीर हसन देहलवी उन दिनों दिल्ली दरबार में आश्रय प्राप्त थे । अमीर हसन देहलवी उच्च कोटि का गजल लेखक था जिस कारण उसे भारत का सादी भी कहा जाता था । ये दोनों विद्वान सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे । बलबन ने फारस के कवि शेख सादी को भी दरबार में आमंत्रित किया था लेकिन अपनी वृद्धावस्था के कारण उन्होंने आने में असमर्थता जताई ।

बलबन के उत्तराधिकारी

बलबन की मृत्यु के बाद गुलाम वंश का शासन मात्र चार वर्षों तक चला । 1287 ई. में बलबन का पौत्र कैखुसरो दिल्ली का शासक बना । दिल्ली के कोतवाल फखरुद्दीन मुहम्मद ने कूटनीतिक तरीके से कैखुसरो को मुल्तान का सूबेदार बना दिया तथा बुगरा खाँ के 18 वर्षीय पुत्र कैकुबाद को दिल्ली का शासक बना दिया । फखरुद्दीन मुहम्मद के दामाद निजामुद्दीन ने कैकुबाद को कुचक्र में फसाकर उसे भोग-विलास में लिप्त कर दिया । निजामुद्दीन सुल्तान के सभी अधिकारों का प्रयोग करने लगा । इससे परेशान होकर कैकुबाद ने निजामुद्दीन को जहर देकर मरवा दिया । कैकुबाद ने एक गैर तुर्क सरदार जमालुद्दीन फिरोज खिलजी को अपना सेनापति बनाया । इस बात से अन्य तुर्क सरदार कैकुबाद से नाराज हो गए । इससे पहले की ये तुर्क सरदार कैकुबाद के विरुद्ध कुछ करते कैकुबाद को लकवा हो गया । सरदारों ने इस स्थिति का लाभ उठाकर कैकुबाद के तीन वर्षिय पुत्र शम्सुद्दीन क्यूमर्स को सुल्तान बना दिया । कालांतर में( 1290 ई.) उचित अवसर पाकर सेनापति जमालुद्दीन फिरोज खिलजी ने कैकुबाद व क्यूमर्स की हत्या कर दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लिया। गुलाम वंश की समाप्ति के साथ ही दिल्ली में खिलजी क्रांति का सूत्रपात हुआ ।

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गुलाम वंश का इतिहास भाग-4

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