बौद्ध धर्म और हरिजन

दोस्तों,गुरु से हम शिक्षा प्राप्त करते हैं ,वह हमें जीवन का एक सच्चा मार्ग दिखाता है । हम गुरु से कभी उसकी जात नहीं पूछते और ना ही गुरु कभी अपने शिष्यों से उनकी जात पूछता है । गुरु का बस एक ही कर्म होता है ,अपने शिष्यों का पथ प्रदर्शन करना और उसी प्रकार शिष्य का भी एक धर्म होता है, अपने गुरु के आदर्शों को मानना । फिर चाहे गुरु छोटी जाती का हो या बड़ी जाती का इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । दोस्तों ऐसे ही एक गुरु के बारे में मैं आपको बताने जा रहा हूँ जिनका नाम था महात्मा बुद्ध । महात्मा बुद्ध शाक्य जाति के थे । उनका वास्तविक नाम सिद्धार्थ शाक्य था । इतिहास में उन्हें गौतम बुद्ध अथवा महात्मा बुद्ध के नाम से जाना जाता है । उनकी शिक्षाओं व विचारों ने दुनिया को एक नई राह दिखाई । धीरे-धीरे उनके विचारों को,उनकी शिक्षाओं को एक नया नाम मिल गया जिसे आज हम बौद्ध धर्म के नाम से जानते हैं । दोस्तों नाम मिलना स्वाभाविक है,यदि हम आज की ही बात करें तो यह संभव ही नहीं है की बिना नाम का कोई संगठन हो । जैसे गुरुनानक जी के उपदेशों को सिख धर्म का नाम मिला,मोहम्मद साहब के विचारों को इस्लाम धर्म का नाम मिला ,ठीक उसी प्रकार विचारों के इस संगठन को महात्मा बुद्ध के अनुयायियों ने बौद्ध धर्म नाम दे दिया ।

दोस्तों, अब कुछ लोगों में इस बात को लेकर विवाद है कि यदि महात्मा बुद्ध शाक्य जाति के थे अथवा ऊँची जाती के थे तो बौद्ध धर्म को ज्यादातर हरिजन जाति के लोग ही क्यों मानते हैं ? क्या महात्मा बुद्ध भी हरिजन जाति के थे ?

नहीं दोस्तों ,ऐसा बिलकुल भी नहीं है ! महात्मा बुद्ध शाक्य जाति के थे जो सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में से एक है । उनके पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के शाक्य गणराज्य के राजा थे । हरिजन जाति के लोग इस धर्म की ओर उन्मुख हुए इसका मुख्य कारण था,तत्कालीन समय में हिन्दू धर्म में व्याप्त छुआछूत व जाति आधारित ऊंच-नीच के भेदभाव जैसी कुछ विसंगतियां ! उस समय ऊँची जाती के लोग हरिजन जाति के लोगों को मंदिरों में नहीं जाने देते थे,उन्हें पूजा नहीं करने देते थे,कुओं व बावड़ियों से पानी नहीं भरने देते थे । यदि कोई हरिजन ऐसा करने का प्रयत्न भी करता तो उन्हें मारा-पीटा जाता था ,उन पर अत्याचार किये जाते थे । यही वो लोग थे जो हिन्दू धर्म से विमुख होकर बौद्ध धर्म की तरफ आ गए । धीरे-धीरे बौद्ध धर्म में हरिजन जाति के लोगों की संख्या बढ़ती गई । दोस्तों ऐसा भी नहीं है कि इस धर्म में केवल हरिजन है । श्रीलंका और भूटान जैसे देशों में तो बौद्ध धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित कर दिया गया है ,इसके अलावा म्यांमार और थाईलैंड में 80% से भी अधिक लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं ।

दोस्तों जैसा मैंने शुरुआत में गुरु-शिष्य के बारे में बताया,गुरु कभी अपने शिष्य की जात नहीं पूछता । ठीक उसी प्रकार महात्मा बुद्ध (बौद्ध धर्म) की शरण में आने वालों से कभी उनकी जात नहीं पूछी जाती थी । हरिजन जाति के लोग हिन्दू धर्म के कर्ताओं द्वारा किये गए अत्याचाओं से तंग आकर महात्मा बुद्ध (बौद्ध धर्म) की शरण में आ गए ।

दोस्तों इस तस्वीर में मैने आपको यही समझाने का प्रयास किया है कि शाक्य वंश में एक महान व्यक्तित्व का जन्म हुआ था जिनका नाम सिद्धार्थ शाक्य था । उनके आदर्शों ने उन्हें महात्मा बुद्ध बना दिया । हरिजन जाती के लोगों का महात्मा बुद्ध से प्रत्यक्ष संबंध मात्र बौद्ध धर्म को लेकर है । ना तो महात्मा बुद्ध (सिद्धार्थ शाक्य) किसी छोटी जाती से थे और ना ही हरिजनों का महात्मा बुद्ध से कोई पारिवारिक संबंध था । बात करें शाक्य वंश की तो इस वंश के लोग आज भी हैं । बौद्ध धर्म के जन्म दाता सिद्धार्थ शाक्य व उनके पूर्वज हिन्दू धर्म से थे । यही कारण है कि बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म की शाखा कहा जा सकता है । दोस्तों ऐसा नहीं है कि शाक्य वंश के लोग बौद्ध धर्म को नहीं मानते । बौद्ध धर्म शाक्यों के पूर्वजों द्वारा दुनिया को दिखाया गया दिखाया गया एक सच्चाई व परोपकार का मार्ग है । अपने पूर्वजों द्वारा दिये गए आदर्शों का शाक्य वंश के लोगों ने हमेशा सम्मान किया है । लेकिन यह भी एक अटूट सत्य है कि शाक्य वंश के लोग मूलतः सनातन धर्म से हैं ।

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