भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन भाग -2(डच)

डच नीदरलैंड(होलैंड) के निवासियों को कहा जाता था ।डच नीदरलैंड की राष्ट्र भाषा थी । 1583 ई. में जॉन ह्युगेवां लिंकोटन नामक एक डच यात्री गोआ आया जिसने पूर्वी जगत की समुन्द्री यात्रा पर एक पुस्तक लिखी । 1602 ईसवी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी ‘वेरिंगिदे ओस्त इन्डिशे कम्पनी’ की स्थापना हुई । होलैंड की संसद ने कंपनी को 21 वर्षों के लिए भारत व पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का अधिकार दिया ।इसमे युद्ध करने, युद्ध सन्धि करने,किले बनाने तथा भारतीय प्रदेशों को जीतने का भी अधिकार दिया ।

डच कम्पनी का मुख्य उद्देश्य भारत व पूर्वी देशों के काली मिर्च और मसाले के केंद्रों पर एकाधिकार स्थापित करना था ।डच अंग्रेजों से पहले भारत आते है हालांकि उनकी कंपनी का रेजिस्ट्रेशन अंग्रेजों की ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ (1600 ई.) के पश्चात 1602 ई. में होता है जबकि डचों से पहले पुर्तगालियों का भारत में आगमन हो चुका था तथा भारत के मुख्य बन्दरगाहों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था ।

डचों द्वारा पुर्तगालियों के उपनिवेशों पर कब्ज़ा

डच इस बात से परिचित थे कि यदि भारत में व्यापार करना है तो पुर्तगालियों को भारत से खदेड़ना आवश्यक है । 1605 ई. डचों ने अपनी पहली व्यापारिक फैक्ट्री मसूलीपट्टनम में स्थापित की । 1605 ई.में डचों ने पुर्तगालियों से अम्बोयना छीन लिया ।इसके पश्चात डचों ने 1610 ई. में पुलिकट पर अधिकार कर लिया तथा तथा यहां फैक्ट्री स्थापित करने के लिए चंद्रगिरि के राजा से समझौता किया ।यहीं पर डचों ने अपने स्वर्ण पगोड़ा(सिक्के) ढाले । 1612 ई. में श्रीलंका से भी पुर्तगालियों को खदेड़ दिया । डचों ने 1613 ई.में पुर्तगालियों को हराकर जकार्ता पर भी अपना अधिकार कर लिया था । जकार्ता के खण्डहरों पर डचों ने 1619 ई. में वैटेविया नामक नगर बसाया ।धीरे-धीरे डचों ने मसाला द्वीप पुंज (इंडोनेशिया) को भी जीत लिया । इंडोनेशिया से सबसे अधिक मसाले प्राप्त होने के कारण डच कम्पनी ने इंडोनेशिया को अपना प्रमुख केन्द्र बनाया ।शीघ्र ही डच कम्पनी ने भारत व दक्षिण पूर्व एशिया के समस्त मसाला व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया ।1623 ई. में अम्बोयना एक बहुत बड़ा नरसंहार होता है जिसमें 10 अंग्रेज तथा 9 जापानीयों को क्रूरतापूर्वक मार डाला जाता है ।
1641 ई. में डचों ने पुर्तगालियों से मल्लका (मलेशिया में स्थित एक राज्य है जिस पर 1511 ई.में पुर्तगालियों ने कब्जा कर यहां की सल्तनत को समाप्त कर दिया था )तथा 1658 ई. में श्रीलंका पर पूरी तरह से अधिकार स्थापित कर लिया । डचों ने भारत मे पुलिकट स्थित गोल्ड्रिया के दुर्ग के अलावा किसी भी डच बस्ती की किलेबन्दी नहीं की ।

डचों द्वारा भारत में स्थापित महत्वपूर्ण कोठियां

  1. पुलिकट 1610 ई. में
  2. सूरत 1616 ई. में
  3. विमली पट्टनम 1641 ई.में
  4. करिकाल 1645 ई.में
  5. चिनसुरा 1653 ई.में
  6. कोचीन 1663 ई.में

इसके अलावा नेगपट्टनम,कासिम बाजार,पटना तथा बालासोर में डचों ने अपनी व्यापारिक कोठियां स्थापित कीं ।

डचों द्वारा भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

डच व्यापारी भारत से नील,शोरा,सूती वस्त्र, रेशम,शीशा व अफीम बाहर भेजते थे ।नील का व्यापार मुस्लिपट्टनम की फैक्ट्री से होता था । डच कंपनी भारत से मुख्य रूप से सूती वस्त्र का व्यापार करती थी ।डच सूती वस्त्र का व्यापार कोरोमंडल तट से करते थे तथा मसालों का व्यापार मालाबार तट से होता था । डचों में मसालों के स्थान पर सूती वस्त्र के निर्यात को अधिक महत्व दिया । भारत से सूती वस्त्र को निर्यात की मुख्य वस्तु बनाने का श्रेय डचों को जाता है ।

बंगाल में डचों ने अपनी पहली फैक्ट्री 1627 ई. पीपली में स्थापित की लेकिन जल्द ही उसे बालासोर स्थानांतरित कर दिया गया ।1690 ई. के बाद डचों ने पुलिकट के स्थान पर नेगपट्टनम को कम्पनी का मुख्य केन्द्र बनाया ।चिनसुरा में डचों ने गुस्तावुस नामक किले का निर्माण करवाया ।डचों ने पुर्तगालियों को भारतीय समुन्द्री व्यापार से निष्कासित कर दिया था लेकिन वे अंग्रेजों के सामने टिक नहीं सके ।डचों की फैक्ट्री के प्रमुख को फेक्टर कहा जाता था । 1653 ई. में हुगली के निकट चिनसुरा में डचों ने फैक्ट्री स्थापित ओर उड़ीसा तट पर स्थित बालासोर से अपना ध्यान काम कर दिया ।

नवम्बर 1759 ई. में अंग्रेजों ओर डचों के मध्य हुगली के निकट बेंदारा युद्ध होता है जिसमे डचों की अन्तिम रूप से पराजय होती है ।इसमें अंग्रेजी सेना का नेतृत्व कर्नल फोर्ड ने किया ।

भारत से डचों के उन्मूलन का प्रमुख कारण

  • डचों की कमजोर नोसेन शक्ति होना
  • इंडोनेशिया पर ध्यान केंद्रित करना
  • कंपनी पर डच सरकार का सीधा नियंत्रण होना
  • कंपनी में भ्रष्ट व अयोग्य अधिकारीयों का होना आदि ।

भाग-3

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