गुहिलादित्य-गुहिल वंश के संस्थापक(मेवाड़ का इतिहास)

राजा गुहिल को गुहिल वंश/गुहिलोत वंश का संस्थापक माना जाता है । 566 ई. में उसने मेवाड़ में गुहिल वंश की स्थापना की । राजा गुहिल को और भी कई नामों से जाना जाता है जैसे गुहिलोत,गुहादित्य व गुहिलादित्य । राजा गुहिल गुहिल राजपूतों के आदि पुरुष थे अतः इनके वंशजों ने इनके नाम को ही अपना गौत्र बना लिया ।

हालांकि गुहिल के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन फिर भी कुछ स्त्रोतों से जो ज्ञात हुआ है वह इस प्रकार है ।

राजा गुहिल का वंश अथवा जाती

गुहिल वंश की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं । कुछ इतिहासकार इन्हें मुस्लिम जाति का बताते हैं तो कुछ ब्राह्मण । मुहणोत नैणसी व गौरीशंकर ओझा के अनुसार गुहिल सूर्यवंशी थे । जैसा कि आपको ज्ञात होगा की सूर्य पुत्र वैवस्तव मनु के दस पुत्रों में से एक थे इक्ष्वाकु । इक्ष्वाकु से वंश इक्ष्वाकु की शुरुआत हुई । इक्ष्वाकु वंश में दशरथ का जन्म हुआ जो अयोध्या के शासक थे । दशरथ के चार पुत्र थे राम(भगवान राम),लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न । भगवान राम के दो पुत्र थे लव और कुश । कुश की 108 वीं पीढ़ी में विजयभूप नामक व्यक्ति का जन्म हुआ । विजयभूप की 6ठी पीढ़ी में शिलादित्य नामक व्यक्ति का जन्म होता है । शिलादित्य के पुत्र का नाम गुहिल था । इस वंशावली के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गुहिल सूर्यवंशी थे ।

राजा गुहिल का जीवन परिचय

विजयभूप ने अपनी राजधानी को अयोध्या से वल्लभीनगर में स्थानांतरित किया । यहां इनका शासन सदियों तक रहा । विजयभूप की 6ठी पीढ़ी में शिलादित्य नामक व्यक्ति वल्लभीनगर का शासक बना । राजस्थान के आबू में उस समय परमार वंश का शासन था जिनकी राजधानी चंद्रावती थी । परमारों की राजकुमारी पुष्पावती के साथ शिलादित्य का विवाह हो जाता है । पुष्पावती के छः पुत्रियाँ होती हैं लेकिन दोनों को एक पुत्र की चाह थी । अगली बार जब पुष्पावती गर्भवती होती है तो वह पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगने के लिए आबू के पास अबुर्दा देवी मंदिर चली जाती है । पुष्पावती के आबू जाने के बाद पीछे से वल्लभीनगर पर पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया । इस आक्रमण में राजा शिलादित्य व बाकी परिवार के लोग मारे जाते हैं । शिलादित्य के एक सेवक ने आबू पहुंचकर रानी पुष्पावती को इस बात की सूचना दी । पुष्पावती ने अपने पति शिलादित्य की मृत्यु के दुख में सती होने का फैसला किया लेकिन गर्भावस्था में होने के कारण उनकी सखियों ने ऐसा करने से उन्हें रोक दिया । स्थिति ऐसी हो गई थी कि अब वह अपने मायके भी नहीं जा सकती थीं अतः उन्होंने अन्यत्र जाने का फैसला किया । रानी पुष्पावती अपनी सखियों व सेवक के साथ जंगल के रास्ते होते हुए कुछ दिनों बाद आबू व वल्लभीनगर के मध्य स्थित वीरनगर नामक स्थान पर पहुंची । यहां वह कमलाबाई नामक एक विधवा व निसंतान ब्राह्मणी के घर रहने लगीं । कुछ माह बाद पुष्पावती ने एक बच्चे को जन्म दिया जिसे वह कमलाबाई को सौंपकर स्वयं सती हो गईं । ऐसा माना जाता है कि पुष्पावती ने बच्चे को गुफा में जन्म दिया था इसीलिए बच्चे का नाम गुहिल रखा दिया गया । बच्चे का पालन-पोषण ब्राह्मणी ने ही किया था ।

बालक गुहिल बचपन से ही होनहार व साहसिक परवर्ती का था । भीलों के साथ उसके अच्छे संबंध थे । वह इन भील बालकों के साथ ही खेलता हुआ बड़ा हो गया । बड़ा होने पर उसे ब्राह्मणी द्वारा अपने वंश व अपने माँ-बाप के बारे में पता चला । गुहिल इसका प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से वल्लभीनगर पहुंचा लेकिन वहां उस समय तक उसके शत्रु का राज्य नष्ट हो चुका था । अतः गुहिल वल्लभीनगर से पुनः वीरनगर लौट आया। वीरनगर आने के बाद गुहिल ने मेवाड़ पर (ईडर के आसपास का क्षेत्र) आक्रमण करने का निश्चय किया । उस समय मेवाड़ पर मेद जाती का शासन था । गुहिल ने भीलों से प्रार्थना की कि वो मेवाड़ को जीतने में उसकी मदद करें । गुहिल ने उनसे वादा किया कि इस सहयोग के बदले में वह और उसके वंशज कभी भी भीलों से कर नहीं लेंगे और ना ही कभी भीलों पर अत्याचार करेंगें । 566 ई. में गुहिल ने भीलों की मदद से मेदों को पराजित कर मेवाड़ पर अधिकार कर लिया ।

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मेवाड़ का इतिहास भाग-1

मेवाड़ का इतिहास भाग-3

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