गुरु राम दास-चौथे सिख गुरु

चौथे सिख गुरु रामदास जी का जन्म 9 अक्टूबर 1534 को लाहौर की चूना मंडी बस्ती में हुआ । घर का ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण इनके लड़कपन का नाम जेठा था । इनके पिता का नाम हरिदास व माता का नाम दया कौर था । बचपन में ही जेठा जी की माता दया कौर का निधन हो गया था । वह बहुत ही निर्धन परिवार से थे तथा अपनी रोजी-रोटी के लिए उन्हें घुंघणियाँ बेचकर गुजारा करना पड़ता था । जब जेठा जी सात वर्ष के हुए तो उनके पिता हरिदास जी का भी निधन हो गया । अपने माता-पिता के देहांत के बाद रामदास जी अपनी नानी के पास बसरका गाँव चले आये । कुछ वर्षों बाद जेठा जी अपनी नानी के साथ गोइन्दवाल गाँव आ गए आये और यहीं रहने लगे । धीरे-धीरे अमरदास जी गोइन्दवाल में गुरु अमरदास द्वारा चलाई जा रही संगतों में भाग लेने लगे और यहाँ अपनी सेवाएं देने लगे ।

गुरु रामदास जी उच्च व्यक्तित्व व उज्जवल सोच के व्यक्ति थे । सिख पंथ के प्रति अपनी लगन व सेवा भाव के कारण वो गुरु अमरदास जी के विश्वासपात्र बन गए । गुरु अमरदास जी ने अपनी पुत्री बीबी भानी का विवाह गुरु रामदास जी से कर दिया । उन्हें तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई जिनके नाम , पृथ्वीचंद ,महादेव व अर्जुन थे । वे गुरु अमरदास जी के साथ धर्म प्रचार के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों में गए । 30 अगस्त 1574 को गुरु अमरदास ने उन्हें गुरुपद प्रदान किया ।  इस प्रकार गुरु रामदास साहिब सिक्खों के चौथे गुरु कहलाये । उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास व वर्ण-व्यवस्था जैसी कुरीतियों का पुरजोर विरोध किया ।

गुरु रामदास ने रामदासपुर नामक गाँव बसाया । उन्होंने यहां गुरुद्वारा बनाने व सरोवर खुदवाने के लिए मुगल सामंतों से 500 बीघा जमीन खरीदी । गुरू रामदास ने 1577 ई. में स्वंय अपने हाथों से गुरुद्वारा ‘हरमिंदर साहिब’‘अमृत सरोवर’ की नींव रखी । यह गुरुद्वारा सरोवर के बीचों बीच स्थित है । इस गुरुद्वारे के निर्माण व देखरेख का कार्य उन्होंने बाबा बूढा सिंह जी को सौंपा । अमृत सरोवर के नाम पर ही बाद में इस जगह का नाम अमृतसर पड़ गया । गुरु रामदास ने इस गुरुद्वारे की चारों दिशाओं में दरवाजे रखवाये जिसका तात्पर्य था कि यह गुरद्वारा हर मजहब, हर जाति, हर लिंग के लोगों के लिए हमेशा खुला है । यह गुरुद्वारा स्वर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है । गुरु रामदास ने मंजी-पद्धति का विस्तार किया तथा मंसद पद्धति को शुरू किया । गुरु रामदास साहिब ने 1581 ई. में अपने छोटे बेटे अर्जुनदेव को गुरु की गद्दी प्रदान की । हालांकि गुरुपद ना दिए जाने के कारण उनका पुत्र पृथ्वीचंद उनसे नाराज हो गया था । 1 सितमबर 1581 में गुरु रामदास साहिब ने इस जगत से अंतिम विदाई ली ।

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