गुप्त वंश का इतिहास(भाग-2)-चंद्रगुप्त द्वितीय -विक्रमदित्य

मढ़नमस्कार दोस्तों ,पिछली बार हमने ‘गुप्त वंश का इतिहास(भाग-1)’ प्रकाशित की जिसमे हमने ‘गुप्त वंश की उत्पति’ से लेकर गुप्त शासक ‘रामगुप्त’ तक के इतिहास की जानकारी दी । इसी श्रृंखला में हम आगे का इतिहास भाग-2 लेकर आये हैं ।

चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमदित्य) 375 ई.-415 ई.

अपने बड़े भाई रामगुप्त की हत्या करके 375 ई.(गुप्त संवत 56 में) चंद्रगुप्त द्वितीय गुप्त साम्राज्य का शासक बना । चंद्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश का सबसे महान शासक था जिसने गुप्त वंश की शक्ति को चरम सीमा पर पहुंचाया ।

चंद्रगुप्त द्वितीय के सिक्कों और अभिलेखों में उसके देव नाम का उल्लेख मिलता है । उदाहरणार्थ चंद्रगुप्त द्वितीय के साँची अभिलेख में उसे ‘देवराज’ व उसके सिक्कों में ‘देवश्री’ तथा वाकाटक अभिलेखों में उसे ‘देवगुप्त’ कहा गया है ।

चंद्रगुप्त द्वितीय की उपाधियां

चंद्रगुप्त द्वितीय की सुप्रसिद्ध उपलब्धियां विक्रमांक, विक्रमादित्य, परमभागवत थीं । इन उपलब्धियों से एक तरफ उसके अतुल पराक्रम की सूचना मिलती है वहीं दूसरी तरफ वह एक धर्मनिष्ठ वैष्णव व्यक्ति होना साबित होता है । वह ‘परमभागवत’ की उपाधि धारण करने वाला द्वितीय गुप्त शासक था ( नालंदा ताम्रपत्र के अनुसार इस उपाधि को धारण करने वाला प्रथम गुप्त शासक समुद्रगुप्त था ।) ।

वैवाहिक संबंध

चंद्रगुप्त द्वितीय भी अपने पिता समुद्रगुप्त की भांति दूरदर्शी एवं कूटनीतिज्ञ था । उसने वैवाहिक संबंधों द्वारा अपने राज्य की आंतरिक स्थिति को सुदृढ़ किया ।

चंद्रगुप्त द्वितीय-कुबेरनाग(नागवंशी कन्या) विवाह

हालांकि समुद्रगुप्त ने कई नागवंशी राजाओं को पराजित किया था तथापि नागवंशियों की स्थिति अभी भी काफी मजबूत थी । इनका सहयोग प्राप्त करने के लिए चंद्रगुप्त द्वितीय ने नागवंशी कन्या कुबेरनाग से विवाह कर लिया । इससे एक पुत्री उत्पन्न हुई जिसका नाम प्रभावतिगुप्त रखा गया । पूना ताम्रपत्र में प्रभावतिगुप्त ने अपनी माता को ‘नागकुलसंभुता’ यानी नागकुल में उत्पन्न कहा है । हालांकि चंद्रगुप्त द्वितीय का नागवंशियों से वैवाहिक संबंध समुद्रगुप्त के समय से ही स्थापित हो गए थे । चंद्रगुप्त द्वितीय के राज्यारोहण के बाद ये स्थिति उसके साम्राज्य विस्तार में काम आयी । चंद्रगुप्त द्वितीय के राज्यारोहण के समय तक उसकी पुत्री प्रभावतिगुप्त वयस्क हो चुकी थी । जिसका विवाह बाद में उसने वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया था ।

प्रभावतिगुप्त-रुद्रसेन विवाह

वाकाटकों का राज्य ऐसी भौगोलिक स्थिति पर था कि वे गुजरात व काठियावाड़ के शक राज्यों पर आक्रमण करने वाले उत्तर भारत के आक्रमणकारियों को लाभ व हानि पहुंचा सकते थे । चूंकि चंद्रगुप्त द्वितीय को गुजरात व काठियावाड़ के शक राज्यों पर विजय प्राप्त करनी थी इसीलिए उसने वाकाटकों का सहयोग प्राप्त करने का प्रयत्न किया । इसी उद्देश्य से उसने अपनी पुत्री प्रभावतिगुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय( शासनकाल 385 ई.-390 ई.) से कर दिया । विवाह के कुछ वर्षों पश्चात वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गई एवं रानी प्रभावतिगुप्त वाकाटक राज्य की संरक्षिका बन गयी । रूद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के समय उसके दोनों पुत्र दिवाकरसेन और दामोदरसेन अवयस्क थे । प्रभावतिगुप्त के समय में वाकाटक राज्य पूरी तरह से चंद्रगुप्त द्वितीय के प्रभाव में आ गया था । प्रभावतिगुप्त के शासनकाल के दौरान ही चंद्रगुप्त द्वितीय ने गुजरात और काठियावाड़ के शक शासकों को पराजित कर उनका उन्मूलन कर दिया था । इस अभियान में गुप्त तथा वाकाटक राज्य की संयुक्त सेनाएं शामिल थीं ।

कुमारगुप्त प्रथम-कदमवंशी राजकुमारी विवाह

तलगुण्ड अभिलेख के अनुसार कदमवंशी शासक काकुत्सवर्मन ने अपनी राजकुमारी का विवाह गुप्त वंश के राजकुमार से किया था । कदम्ब शासक काकुत्सवर्मन गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय का समकालीन था । इसीलिए यह अनुमान लगाया जाता है कि वह गुप्तवंशीय राजकुमार चंद्रगुप्त द्वितीय का पुत्र कुमारगुप्त प्रथम था । कदम्ब राजवंश का शासन कुन्तल (कर्नाटक) में था । भोज के ‘श्रृंगार प्रकाश’ तथा क्षेमेन्द्र के ‘ओचित्य विचार चर्चा’ से ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय ने कालिदास को अपना दूत कदम्ब शासक के दरबार में भेजा था । कालिदास ने वापिस आकर चंद्रगुप्त द्वितीय को बताया कि कुन्तल नरेश ने अपने राज्य का भार आपके भरोसे छोड़कर भोग-विलास में लिप्त है । इस प्रकार वैवाहिक संबंधों के परिणामस्वरूप चंद्रगुप्त द्वितीय का दबदबा सुदूर दक्षिण तक स्थापित हो गया था ।

चंद्रगुप्त द्वितीय का विजय अभियान

अपने राज्य की स्थिति को सुदृढ़ कर चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपना विजय अभियान आरंभ किया । सबसे पहले चंद्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिम भारत के शकों के राज्य पर आक्रमण किया तत्पश्चात उसने बाह्लीक और बंग को विजित किया ।

1. शकों का उन्मूलन

चंद्रगुप्त द्वितीय ने सम्राट बनते ही शकों का उन्मूलन करने के लिए व्यापक अभियान शुरू किया । हालांकि गुजरात व काठियावाड़ के शकों ने पहले ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर ली थी लेकिन उनका पूर्णतया उन्मूलन नहीं किया था । रामगुप्त के समय शकों ने गुप्त साम्राज्य के लिए फिर से संकट खड़ा कर दिया था । चंद्रगुप्त द्वितीय ने शक शासक की हत्या कर गुप्त साम्राज्य की रक्षा की । पूर्वी मालवा के क्षेत्रों में चंद्रगुप्त द्वितीय के तीन अभीलेख मिले हैं जिनसे चंद्रगुप्त द्वितीय की शकों पर विजय की जानकारी मिलती है । पहला अभिलेख भिलसा के निकट उदयगिरि की पहाड़ियों से मिला है जिसकी रचना चंद्रगुप्त द्वितीय के युद्ध एवं शांति मंत्री (संधिविग्रहिक) वीरसेन शाब ने की । इस अभिलेख पर वर्णित श्लोक की पंक्तियों से ज्ञात होता है कि वह सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने के उद्देश्य से यहां आया था । दूसरा अभिलेख भी उदयगिरि पर्वत से मिला है जो चन्द्रगुप्त द्वितीय के सामंत संकानिक महाराज का है । वहीं तीसरा अभिलेख साँची स्तूप प्राचीर अभिलेख है जिसमें चंद्रगुप्त द्वितीय के मुख्य सेनापति आम्रकार्दव का उल्लेख मिलता है जिसने सैंकड़ो युद्ध जीते थे । इन तीनों अभिलेखों के सम्मिलित साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय पूर्वी मालवा में अपने सैन्याधिकारियों और सामंतों के साथ अभियान पर आया था । इस अभियान का उद्देश्य पूर्वी मालवा के शक राज्यों को जीतना था । शक शासक रूद्रसिंह तृतीय चंद्रगुप्त द्वितीय का प्रतिद्वन्दी था । 388 ई. के आसपास रूद्रसिंह तृतीय को मार दिया गया तथा उसके गुजरात और काठियावाड़ के राज्य को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया गया । चंद्रगुप्त द्वितीय ने शक मुद्रओं के आधार पर चांदी के सिक्के उत्कीर्ण करवाये ओर इन्हें शक राज्यों में प्रचलित करवाया । इन्हीं क्षेत्रों में रूद्रसिंह तृतीय के कुछ सिक्के प्राप्त हुए हैं जिन्हें चंद्रगुप्त द्वितीय ने पुनः उत्कीर्ण करवाया था । इन सिक्कों से चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा शक राज्य पर विजय की सूचना मिलती है । शकों पर विजय उसके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सफलताओं में से एक है । उसे ‘शकारि (शकों का दुश्मन) तथा ‘साहसांक’ भी कहा जाता था । संभव है कि अपनी इसी उपलब्धि के बाद उसने ‘विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी । शक राज्य की विजय के फलस्वरूप गुप्त राज्य की सीमाएं पश्चिम में अरब सागर तक फैल गयी थी । पश्चिमी समुद्री तट के कई छोटे-बड़े बन्दरगाहों पर चंद्रगुप्त द्वितीय का नियंत्रण स्थापित हो गया था जिनमें से सर्वप्रमुख भृगुकच्छ (भड़ौच) का बन्दरगाह था । यहां के जीते हुए प्रदेशों पर व्यस्थित शासन बनाये रखने के लिए उसने उज्जयिनी (उज्जैन) को अपनी दूसरी राजधानी बनाया जबकि इसकी प्रथम राजधानी पाटलिपुत्र वहां से काफी दूर पड़ती 

2.बाह्लीक एवं बंग विजय

दक्षिणी दिल्ली के महरौली में स्थित लोह स्तम्भ पर ‘चंद्र’ नामक शासक की विजयों का उल्लेख है । चंद्र कौन था ,यह अभी तक प्रमाणिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है । किन्तु लेखन शैली की विशेषता के आधार पर इसे चंद्रगुप्त द्वितीय के समय का माना जाता है । इस लेख के अनुसार राजा चंद्र ने सप्तसिन्धु नदी पार कर बाह्लीकों के विरुद्ध और पूर्व में बंग शासकों के विरुद्ध विजय अभियान चलाया । महरौली के लौह स्तम्भ लेख के चित्र को यदि ‘चन्द्रगुप्त द्वितीय’ मान लिया जाये तो गुप्त साम्राज्य की सीमाओं को पश्चिम में बल्ख तक तथा पूर्व में बंगाल तक बढ़ने का श्रेय उसे ही जाता है । हालांकि इस बात पर मतभेद है कि बाह्लीक किस प्रदेश को कहा जाता था फिर भी कुछ विद्वानों द्वारा ज्यादा संभावना इसी बात की मानी जाती है कि बाह्लीक प्रदेश संभवतः बल्ख अथवा सिंधु प्रदेश को कहा गया होगा । इस प्रकार बाह्लीक विजय से तात्पर्य पंजाब में बसे परवर्ती कुषाण पर विजय था । पश्चिम में बसे जिन गणराज्यों ने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर ली थी उन राज्यों के विरुद्ध चंद्रगुप्त द्वितीय ने पुनः अभियान चलाया । चूँकि चंद्रगुप्त द्वितीय के पश्चात पश्चिम के इन गणराज्यों के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं मिलता है, इसीलिए ऐसा प्रतीत होता है कि बाह्लीक विजय के दौरान चंद्रगुप्त द्वितीय ने इन गणराज्यों का उन्मूलन कर दिया था ।

चंद्रगुप्त द्वितीय का प्रशासन

उज्जैन चंद्रगुप्त द्वितीय के साम्राज्य की दूसरी राजधानी थी । गढ़वा अभिलेख में चंद्रगुप्त द्वितीय को परमभागवत कहा गया है । इस उपाधि को धारण करने वाला वह प्रथम गुप्त शासक था । चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपने पिता समुद्रगुप्त की भांति अपना विजय अभियान समाप्त करने के पश्चात अश्वमेध यज्ञ करवाया । कुछ विद्वान वाराणसी में नगवा ग्राम से प्राप्त पाषाण निर्मित अश्व जिस पर ‘चंद्रगुप्त’ निर्मित है के आधार पर अपना मत प्रस्तुत करते हैं । हालांकि इस मत की प्रमाणिकता के लिए कोई ओर साक्ष्य नहीं मिले हैं इसलिए इस बारे में प्रमाणिक रूप से कुछ कहना कठिन है । मगर इतना तो सत्य है कि चंद्रगुप्त द्वितीय एक महान विजेता के साथ साथ एक कुशल प्रशासक भी था । चीनी यात्री फाहियान जो चंद्रगुप्त-द्वितीय के समय ( 399 ई.-414 ई.में) भारत आया था ,ने चंद्रगुप्त द्वितीय के प्रशासन की खूब प्रशंसा की है । चंद्रगुप्त द्वितीय के साम्राज्य में चारों ओर शांति व्यवस्था स्थापित थी । चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में नवरत्नों में सर्वप्रमुख रत्न कालिदास ने इस शांति व्यवस्था की ओर इशारा करते हुए लिखा है कि ‘ जिस समय वह राजा शासन करता था, उपवनों में मद पीकर सोती हुई युवतियों को वायु तक स्पर्श नहीं कर सकती थी,तो फिर उनके आभूषणों को चुराने का साहस को कर सकता था ।’

चंद्रगुप्त द्वितीय के मथुरा लेख में सर्वप्रथम गुप्त संवत का उपयोग किया गया है । यह लेख चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन का प्रथम लेख (शक संवत 61-380 ई.) है ।

चंद्रगुप्त द्वितीय एक महान विजेता,दक्ष कूटनीतिज्ञ, कुशल प्रशासक, धर्मसहिष्णु,विद्वान एवं विद्या का उदार संरक्षक था । वह बहुमुखी प्रतिभा का धनी था और उसके काल में गुप्त साम्राज्य की चहुमुखी प्रगति हुई । चंद्रगुप्त द्वितीय न केवल गुप्त वंश के अपितु समस्त भारतीय इतिहास के महानतम शासकों में से एक था ।

The History of Gupt Dynasty-Gupt Vansh ka itihas

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