इल्तुतमिश-गुलाम वंश

इल्तुतमिश पहले बदायूँ का सूबेदार व कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था । जिस तरह कुतुबुद्दीन ऐबक को मुहम्मद गोरी ने खरीदकर अपना गुलाम बनाया था उसी प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को खरीदकर अपना गुलाम बनाया। इल्तुतमिश इल्बरी जनजाति का तुर्क था । 1205 ई. में इल्तुतमिश ने मुहम्मद गोरी व कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ मिलकर खोखरों का दमन किया था । खोखरों के विरुद्ध इस अभियान में इल्तुतमिश के साहस व युद्ध कौशल से मुहम्मद गोरी बहुत प्रभावित हुआ । मुहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को आदेश दिया की वह इल्तुतमिश को दासता से मुक्त कर दे। इस प्रकार इल्तुतमिश ने अपने स्वामी कुतुबुद्दीन ऐबक से भी पहले मुक्तिपत्र प्राप्त कर लिया था । कुतुबुद्दीन ऐबक स्वयं भी इल्तुतमिश से बहुत प्रभावित था । उसने अपनी बेटी का विवाह भी इल्तुतमिश से करवा दिया था । इस लिहाजे से इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक का दामाद भी था । 1210 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक की पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने से मृत्यु हो गई थी ।

इल्तुतमिश का प्रारंभिक जीवन

इल्तुतमिश के पिता का नाम ईलम खां था । इल्तुतमिश के आकर्षक व्यक्तित्व व उत्कृष्ट स्वभाव के कारण उसके भाई व सगे-संबंधी उससे ईर्ष्या करते थे । एक दिन पिता की अनुपस्थिति में उसके भाइयों ने उसे एक दास व्यापारी को बेंच दिया । इस प्रकार वह बचपन से ही अपने परिवार से पृथक हो गया था । व्यापारी इल्तुतमिश को बुखारा ले आया तथा यहां उसने इल्तुतमिश को एक काजी को बेंच दिया । कुछ समय पश्चात काजी के बेटों ने उसे जमालुद्दीन मुहम्मद चुस्तकबा नामक दास व्यापारी को बेंच दिया । यह व्यापारी उसे गजनी के दास बाजार लाया जिसके पश्चात वह उसे दिल्ली के दास बाजार में ले आया जहां कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1 लाख जीतल देकर उसे व्यापारी से खरीद लिया ।

इल्तुतमिश का राज्यारोहण

1211 ई. में इल्तुतमिश ने कुतुबुद्दीन ऐबक के विवादित पुत्र आरामशाह की हत्या कर दिल्ली सल्तनत पर अधिकार कर लिया था । यहां विवादित पुत्र इसलिए कहा गया है क्योंकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक पुत्रविहीन था,उसके केवल तीन पुत्रियाँ थी जिनमें दो का विवाह कुचाबा से तथा एक का इल्तुतमिश से विवाह हुआ ।

आरामशाह के शासनकाल में सल्तनत के विभिन्न भागों में तुर्क अमीरों में स्वतंत्र शासन करने की महत्वकांक्षा जन्म लेने लगी। बंगाल में अली मर्दान ने स्वयं को दिल्ली से पृथक कर दिया था। उधर कुचाबा ने भी मुल्तान,कच्छ व भठिंडा पर अपना दबदबा बनाना शुरू कर दिया । इस संकट को देखते हुए दिल्ली के सिपहसालार अमीर अली इस्माइल ने कुछ तुर्क अधिकारियों की सहमति से बदायूँ के सूबेदार इल्तुतमिश को आमंत्रित कर दिल्ली पर शीघ्रातिशीघ्र अधिकार करने का परामर्श दिया । दिल्ली सल्तनत के अनेक अधिकारी इल्तुतमिश की व्यक्तिगत योग्यता व विवेकशील प्रशासनिक चातुर्य से बहुत प्रभावित थे । इल्तुतमिश ने दिल्ली पहुंचकर स्वयं को दिल्ली सल्तनत का सुल्तान घोषित कर दिया । उस समय दिल्ली सल्तनत की राजधानी लाहौर थी । दिल्ली पर इल्तुतमिश के अधिकार की खबर जब आरामशाह के पास पहुंची तो वह बहुत क्रोधित हुआ । वह अपनी एक बड़ी सेना के साथ दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए पहुंच गया । इल्तुतमिश व आरामशाह के मध्य संघर्ष हुआ जिसमें आरामशाह पराजित हुआ । आरामशाह को बंदी बना लिया गया तथा बाद में उसकी हत्या कर दी गई । वह दिल्ली सल्तनत का वास्तविक व प्रथम वैधानिक शासक था ।

इल्तुतमिश द्वारा विद्रोहियों का दमन

बहरहाल 1211 ई. में जब उसने हिंदुस्तान की गद्दी संभाली तो उसे शुरुआत में कई आंतरिक व बाह्य कठिनाईयों का सामना करना पड़ा । शासक बनने के बाद सर्वप्रथम इल्तुतमिश ने कुतुबी व मुइज्जी विद्रोहियों के दमन किया । लाहौर के कुतुबी अमीर इल्तुतमिश को दिल्ली की गद्दी मिलने पर उसका विरोध कर रहे थे । दिल्ली सल्तनत के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक की अकस्मात मृत्यु हो गई थी अतः मरने के पहले उसने अपने किसी उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की थी। लाहौर के तुर्क अमीर ( कुतुबुद्दीन ऐबक के गुलाम व समर्थक/ कुतुबी अमीर) व दिल्ली के मुइज्जि अमीर (मुहम्मद गोरी के गुलाम ) दिल्ली की गद्दी के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक के पुत्र आरामशाह का समर्थन कर रहे थे ।

इल्तुतमिश ने इन सभी विद्रोहियों का दमन किया । उस समय तीन शक्तिशाली अधिपति थे जो दिल्ली सल्तनत को चुनौती दे रहे थे- गजनी में यलदौज, मुल्तान में कुचाबा तथा लखनौती (बंगाल) में अली मर्दान खिलजी ।

यलदौज का दमन

1214 ई. में खवारिज्म के शाह ने यलदौज को गजनी से खदेड़कर उस पर अधिकार कर लिया । यलदौज भागकर लाहौर पहुंचा जहां उसने कुचाबा को पराजित कर लाहौर पर अधिकार कर लिया । फरिश्ता के अनुसार यलदौज ने थानेश्वर तक के क्षेत्र को अधिकृत कर लिया था । यलदौज दिल्ली पर अपना अधिकार कर लेना चाहता था । अतः दोनों में मध्य युद्ध अवश्यम्भावी हो गया था । 1215 ई. में तराइन के तीसरे युद्ध में ताजुद्दीन यलदौज को पराजित कर बंदी बना लिया बाद में बदायूँ के दुर्ग की उसका वध करवा दिया ।

कुचाबा का दमन

कुचाबा कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था । कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी दो पुत्रियों का विवाह भी कुचाबा से कराया था । कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने शासनकाल में उसे कच्छ का सूबेदार नियुक्त किया था । कुचाबा अपने स्वामी ऐबक के प्रति हमेशा वफादार रहा था लेकिन ऐबक की मृत्यु के पश्चात सल्तनत में कई प्रतिद्वंदी खड़े हो गए । कुचाबा ने अपनी योग्यता से लाहौर,मुल्तान, सिंध व पंजाब के कई क्षेत्रों को अधिकृत कर लिया था । तराइन में यलदौज की पराजय का लाभ उठाकर उसने पुनः लाहौर पर अधिकार जमा लिया था । 1225 ई. में इल्तुतमिश ने चिनाब के निकट मंसूरा नामक स्थान पर कुचाबा को पराजित किया । कुचाबा सिन्ध नदी में डूबकर मर गया । इस प्रकार इल्तुतमिश के दो प्रबल प्रतिद्वंदियों का अंत हुआ । लाहौर में उसने अपने बड़े पुत्र नसुरुद्दीन महमूद को नियुक्त किया ।

मंगोल आक्रमण से दिल्ली सल्तनत की रक्षा

इन दोनों प्रतिद्वंदियों के साथ-साथ इल्तुतमिश के राज्य पर मंगोल आक्रमण का संकट गहराने लगा था । 1221 में मंगोलिया आक्रमणकारी चंगेज खान (तिमूचिन) ने मध्य एशिया में स्थित मुस्लिम साम्राज्य में लूटमार मचाने लगा । चंगेज खान ने मध्य एशिया में एक बहुत बड़े भू भाग पर अधिकार कर लिया था । उसने ईरान पर आक्रमण कर वहां के खवारिज्म साम्राज्य को नष्ट कर दिया था । खवारिज्म युवराज जलालुद्दीन मांगबरनी ईरान से भागकर पंजाब की तरफ चला आया तथा यहां पहुंचकर उसने इल्तुतमिश से शरण मांगी । चंगेज खान जलालुद्दीन मांगबरनी का पीछा करते हुए सिंधु घाटी पहुंच गया था । अपने पीछे चंगेज खान सभी गांव-शहर लूटपाट कर नष्ट कर दिये । इल्तुतमिश ने बुद्धिमता का परिचय देते हुए जलालुद्दीन मांगबरनी को शरण देने से इनकार कर दिया । इल्तुतमिश यह जानता था कि यदि वह जलालुद्दीन मांगबरनी को शरण देगा तो चंगेज खान भारत में प्रवेश कर दिल्ली सल्तनत को नष्ट कर सकता है । यही कारण था कि न तो उसने मांगबरनी को शरण दी और ना ही जब तक (1227 ई. तक) चंगेज खान सिंध में रहा तब तक उसने सिंध में कोई सैनिक अभियान किया ।

बंगाल के खिलजी सरदारों का दमन व लखनौती पर दिल्ली सल्तनत का अधिकार

बंगाल में खिलजी सरदारों ने अली मर्दान की हत्या करके हिसामुद्दीन इवाज को नियुक्त कर दिया था । हिसामुद्दीन इवाज ने बिहार पर भी अपना अधिकार जमा लिया था । वह बंगाल को दिल्ली सल्तनत से अलग रखना चाहता था अतः उसने वार्षिक कर देने से भी इंकार कर दिया । इल्तुतमिश अपनी सेना के साथ बंगाल की तरफ बढ़ा । उसने बिना किसी प्रतिरोध के बिहार पर अधिकार कर लिया । इसके बाद वह लखनौती पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा । तेलियागढ़ी के निकट दोनों के मध्य संघर्ष हुआ जिसमें पराजित होकर हिसामुद्दीन इवाज को इल्तुतमिश से संधि करनी पड़ी । उसने मलिक अल्लाउद्दीन जानी को बिहार का सूबेदार नियुक्त कर दिया । हालांकि कुछ वर्षों बाद ही हिसामुद्दीन इवाज ने मलिक अल्लाउद्दीन जानी को बिहार से खदेड़ कर पुनः अधिकार कर लिया था । मंगोल आक्रमण के संभावित खतरे के चलते इल्तुतमिश ने कुछ समय के लिये अपना ध्यान बंगाल से हटा लिया तथा सही मौके का इंतजार करने लगा ।

1226 ई. में इल्तुतमिश ने अपने बेटे नसुरुद्दीन महमूद को बंगाल भेजा । संघर्ष में नसुरुद्दीन महमूद के हाथों पराजित होकर हिसामुद्दीन इवाज मारा गया । राजधानी लखनौती पर पुनः दिल्ली सल्तनत का अधिकार हो गया । नसुरुद्दीन महमूद को लखनौती का सूबेदार नियुक्त किया गया । मार्च 1229 ई. में नसुरुद्दीन महमूद की मृत्यु हो जाने से बंगाल में पुनः अशांति फैलने लगी । इसी अशांति का लाभ उठाकर एक खिलजी सरदार मलिक इख्तियारूद्दीन बल्का ने विद्रोह कर दिया । इल्तुतमिश ने 1231 ई. में बल्का के विरुद्ध सैन्य अभियान किया तथा उसे बंदी बनाकर बंगाल में पुनः शांति व्यवस्था स्थापित की । मलिक अल्लाउद्दीन जानी को बंगाल का सूबेदार नियुक्त कर वह दिल्ली आ गया ।

इल्तुतमिश के अन्य सैन्य अभियान

उसने दोआब क्षेत्र को पुनर्विजित किया तथा कन्नौज, वाराणसी, बहराइच व अवध को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।

1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद तुर्क साम्राज्य शिथिल पड़ गया था जिसका लाभ उठाकर कई राजपूत राज्य स्वतंत्र हो गए थे । अब इल्तुतमिश इन राज्यों को पुनः दिल्ली सल्तनत के अधीन करना चाहता था । इसी क्रम में उसने सबसे पहले 1226 ई. में रणथंभौर पर आक्रमण कर अधिकार किया । जालौर के चौहान शासकों ने भी इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली । इसके पश्चात इल्तुतमिश ने एक-एक करके बायना, सांभर, अजमेर व नागौर आदि राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया ।

1231 ई. में इल्तुतमिश में ग्वालियर पर आक्रमण किया तथा वहां के परिहार शासक मंगल देव को पराजित कर राशिदुद्दीन को वहां का सूबेदार नियुक्त किया ।

1233 ई. में इल्तुतमिश ने नुसरतुद्दीन तयसाई को कालिंजर पर आक्रमण करने के लिए भेजा । तयसाई ने बुंदेलखंड में खूब लूटपाट की लेकिन वह कालिंजर के किले को जीतने में असफल रहा । इसके पश्चात उसने मालवा , भिलसा पर आक्रमण कर वहां मंदिरों में लूटपाट की । उज्जैन में उसने महाकाल के मंदिर को तोड़ दिया । विक्रमाजीत की मूर्ति व अनेक अवशेष वह अपनी विजय के उपलक्ष्य में दिल्ली ले आये थे । बानियान अभियान पर जाते समय रास्ते में वह बीमार पड़ गया अतः 30 अप्रैल, 1236 को उसकी मृत्यु हो गई । इल्तुतमिश ने 1211 ई. से 1236 ई. तक (26 वर्षों तक) शासक किया ।

इल्तुतमिश ने अपनी विजयों द्वारा दिल्ली सल्तनत को पुनः स्थापित कर लिया था । इसी उपलब्धि को देखते हुए 18 फरवरी 1229 ई. को बगदाद के खलीफा अल-मुस्तगिर-बिल्लाह ने इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वैधानिक सुल्तान होने का मान्यतापत्र व उसके सम्मान में खिलअत प्रदान की ।

इल्तुतमिश का मूल्यांकन

इल्तुतमिश ने अपनी राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थानांतरित किया । उसने सर्वप्रथम अपने चालीस विश्वासपात्र गुलामों का एक समूह बनाया जो उसे प्रशासनिक कार्यों में सहायता करते थे । इल्तुतमिश ने इन्हें प्रशासन के महत्वपूर्ण व उच्च पदों पर नियुक्त किया था । इस समूह को चालीसा अथवा तुर्कान-ए-चहरगान के नाम से जाना जाता था । मुहम्मद जुनैदी इल्तुतमिश का वजीर था । मलिक कुतुबुद्दीन हसन गौरी, फखरूल मुल्क निजामी जैसे योग्य व्यक्ति उसके दरबार में थे । आरिजे ममालिक इमादुल मुल्क नामक गुलाम को उसने ‘रावत-ए-अर्ज’ की उपाधि दी । इल्तुतमिश ने ईरानी राजतंत्रीय परम्पराओं को ग्रहण किया व उन्हें भारतीय वातावरण के अनुकूल समन्वित किया । उसके राजकीय सिद्धांत व राजकीय संघटन की कला पर उसके दरबारी विद्वान ने आबाद-उल-हर्ब नामक पहला भारतीय मुस्लिम ग्रंथ लिखा । इल्तुतमिश अपने दरबारी पदाधिकारियों के समक्ष बैठने से हिचकिचाता था ।

इल्तुतमिश ने अपने बड़े पुत्र नसुरुद्दीन महमूद की स्मृति में मदरसा-ए-नासिरी तथा मुहम्मद गोरी की स्मृति में मदरसा-ए-मुइज्जी का निर्माण दिल्ली में कराया । उसने कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित कुतुबमीनार का निर्माण कार्य पूरा करवाया । इसके अलावा उसने बदायूँ में जामा मस्जिद व नागौर में अतारकिन के दरवाजे के निर्माण करवाया ।

इल्तुतमिश ने 1226 ई. में इक्ता प्रणाली शुरू की । इस व्यवस्था में सैनिकों को वेतन के बदले भूमि दी जाती थी । इल्तुतमिश ने चांदी के टंके (175 ग्रेन) व तांबे के जीतल चलाये जो भारत के पहले शुद्ध अरबी सिक्के थे । उसने सिक्कों पर टकसाल का नाम लिखने की परम्परा शुरू की । उसने अपनी पुत्री रजिया का नाम भी चांदी के टंकों पर अंकित कराया ।

अपनी मृत्यु से पहले इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया सुल्तान को अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना था । लेकिन इल्तुतमिश की मृत्यु के पश्चात तुर्क अमीरों नें इल्तुतमिश के दूसरे पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज शाह को गद्दी पर बैठा दिया । रुकनुद्दीन अयोग्य साबित हुआ । राज्य की जनता ने रुकनुद्दीन का विरोध किया तथा उसे अपदस्थ कर रजिया को सल्तनत का सुल्तान बना दिया । रजिया सुल्तान भारत की पहली मुस्लिम महिला शासिका थी ।

गुलाम वंश का इतिहास भाग-1

गुलाम वंश का इतिहास भाग-3

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