राष्ट्रकूट राजवंश (भाग -3)

तीन वर्षों बाद 817 ई. में साम्राज्य में विद्रोह फैल गया । ईमानदार मंत्रियों व सामंतों का वध होने लगा…

दोस्तों राष्ट्रकूट वंश भाग-2 में आपने पढ़ा राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव तथा गोविन्द तृतीय के बारे में । आइये भाग -3 में जानते हैं आगे के शासक अमोघवर्ष प्रथम तथा कृष्ण द्वितीय के बारे में ।

अमोघवर्ष प्रथम (814 ई.-880 ई.)

लगभग 814 ईस्वी में गोविंद तृतीय की मृत्यु हो गयी । 814 ई. में गोविंद तृतीय की मृत्यु के पश्चात अमोघवर्ष प्रथम राष्ट्रकूट वंश का शासक बना । उसका जन्म 800 ई. में श्रीभवन (आधुनिक गुजरात के भरुच जिले का सरभों नामक स्थान) में हुआ । जब उसने राष्ट्रकूट वंश की गद्दी संभाली तब उसकी उम्र मात्र 14 वर्ष थी । उसका वास्तविक नाम शर्व था । अमोघवर्ष उसकी उपाधि थी जो उसने राजा बनने के पश्चात् धारण की थी । कई इतिहासकार उसे ‘शर्व अमोघवर्ष’ के नाम से भी सम्बोधित करते हैं । लेकिन इतिहास में वह ‘अमोघवर्ष प्रथम’ के नाम से ही प्रसिद्ध हुआ । इसके अलावा उसकी नृपतुंग, वल्लभ, पृथ्वीवल्लभ, वीरनारायण, महाराजाधिराज, प्रभूतवर्ष,भट्टारक, जगतुंग , महाराजशंड नामक विभिन्न उपाधियाँ थी ।

हालांकि शुरूआती शासन व्यवस्था अमोघवर्ष प्रथम ने कर्क के संरक्षण में सम्भाली क्योंकि उस समय वह अल्पव्यस्क था । लेकिन तीन वर्षों बाद 817 ई. में साम्राज्य में विद्रोह फैल गया । ईमानदार मंत्रियों व सामंतों का वध होने लगा । साम्राज्य में चारों तरफ भय व अराजकता का वातावरण बन गया । हालांकि इन विद्रोहियों के नाम की जानकारी नहीं मिलती परंतु यह अनुमान लगाया जाता है कि अमोघवर्ष का चचेरा भाई,स्तम्भ का पुत्र शंकरगण,कर्क के अमोघवर्ष के संरक्षक बनने से असंतुष्ट कुछ मंत्री व सामंत आदि इस विद्रोह में शामिल थे । अमोघवर्ष व कर्क ने डटकर विद्रोहियों का सामना किया परंतु वो ज्यादा समय तक इन विद्रोहियों के आगे टिक नहीं पाये । अमोघवर्ष तथा कर्क को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा । विद्रोहियों ने राष्ट्रकूट सत्ता को उखाड़ फेंका । लगभग दो-तीन वर्षों के लिए राष्ट्रकूट सत्ता का लोप हो गया था । इसा प्रतीत होने लगा था कि राष्ट्रकूट वंश अब हमेशा के लिए समाप्त हो गया है । लेकिन कर्क के नेतृत्व में विद्रोहियों से बार-बार संघर्ष हुआ और अंततः कर्क को सफलता प्राप्त हुई । इतिहासकारों के अनुसार इस विद्रोह का सर्वप्रमुख नेता चालुक्य विजयादित्य था जिसे गोविन्द तृतीय ने वेंगी से अपदस्थ कर दिया था । लगभग 821 ई. में कर्क ने अमोघवर्ष प्रथम को पुनः मान्यखेट की राष्ट्रकूट गद्दी पर बैठाया ।

राष्ट्रकूट अभिलेखों में उल्लेख मिलता है की लगभग 830 ई. में अमोघवर्ष प्रथम ने चालुक्य नरेश विजयादित्य द्वितीय को विंगवल्ली के युद्ध में पराजित कर चालुक्यों की शक्ति को समाप्त कर दिया था । कुछ इसी प्रकार की सूचना चालुक्यों के अभिलेखों में भी प्राप्त होती है जिसके अनुसार विजयादित्य तृतीय (विजयादित्य द्वितीय का पोता) ने शासक बनने के पश्चात वेंगी का उद्धार किया था । अर्थात यह अनुमान लगाया जाता है की अमोघवर्ष प्रथम ने विजयादित्य द्वितीय को पराजित कर वेंगी पर अधिकार कर लिया होगा तथा 844 ई. में जब विजयादित्य तृतीय शासक बना तो उसने पुनः राष्ट्रकूटों से वेंगी छीन लिया । यह असमंजस इसलिए है क्योंकि राष्ट्रकूट अभिलेख में उस चालुक्य शासक के नाम का उल्लेख नहीं है जिसे अमोघवर्ष प्रथम ने विंगवल्ली के युद्ध में पराजित किया था ।

गंगों के साथ संघर्ष

अमोघवर्ष को गंग शासक शिवमार के विद्रोह का सामना करना पड़ा । गंग साम्राज्य की राजधानी गंगवाड़ी से वह अपने साम्राज्य का संचालन करता था । दोस्तों,मैने यहाँ विद्रोह इसलिए कहा क्योंकि गंग साम्राज्य राष्ट्रकूटों के अधीन था । इससे पहले शिवमार राष्ट्रकूटों की कैद में था । परन्तु गोविन्द तृतीय ने शिवमार से आजीवन उसके प्रति वफ़ादारी का भरोसा पाकर कैद से मुक्त कर दिया था । लेकिन अमोघवर्ष प्रथम के शासक बनने के बाद उसने 816 ई. में विद्रोह कर दिया , हालाँकि इस संघर्ष के दौरान तुमकुर जिले के कगीमोगेयुर युद्ध में वह मारा गया ।

शिवमार की मृत्यु के पश्चात उसका भतीजा राजमल्ल गंगों का प्रधान बना । उसने राष्ट्रकूट साम्राज्य में व्याप्त अशांति का लाभ उठाकर गंग राज्य को राष्ट्रकूटों से मुक्त करा लिया था । इसकी जानकारी गंगों के अभिलेखों से मिलती है । इतिहासकारों का मत है कि राजमल्ल ने राष्ट्रकूटों के विरुद्ध यह अभियान 830 ई.-835 ई. में मध्य चलाया । उसने गंग साम्राज्य के लगभग सभी क्षेत्रों को राष्ट्रकूटों से मुक्त करा लिया था । राष्ट्रकूटों द्वारा ज्यादातर लड़ाईयां वेंगी के चालुक्यों तथा गंगवाड़ी को लेकर लड़ी गई थीं । अमोघवर्ष प्रथम ने गंगों से स्थायी शांति का रास्ता अपनाते हुए अपनी पुत्री चन्द्रोब्बलब्बा का विवाह राजमल्ल के पुत्र बूतुग के साथ कर दिया । इस प्रकार गंगो व् राष्ट्रकूटों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो गया तथा दोनों के मध्य संघर्ष हमेशा के लिए समाप्त हो गया ।

गुजरात के राष्ट्रकूटों से संघर्ष

अमोघवर्ष प्रथम को अपने जीवन में एक सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा जो थी अपने ही परिवार के लोगों के साथ संघर्ष । गुजरात के राष्ट्रकूट वस्तुतः अमोघवर्ष प्रथम के परिवार के ही चचेरे भाई बंधू थे । उस समय गुजरात का शासक कर्क का पुत्र ध्रुव था । मान्यखेट  का राष्ट्रकूट सम्राट पीढ़ दर पीढ़ी अपने चचेरे भाइयों व उनके पुत्रों को गुजरात व मालवा के शासक के रूप में नियुक्त करते थे ।ये मान्यखेट के राष्ट्रकूट शासक के प्रति हमेशा वफादार रहते थे । इसका सबसे बड़ा उदाहरण कर्क था जिसने अमोघवर्ष प्रथम के शासन के शुरूआती वर्षों में उसके संरक्षक के रूप में कार्य किया और राष्ट्रकूट साम्राज्य को विद्रोहियों के हाथों से छुड़ाया । लेकिन कालांतर में परिस्थितियां कुछ ऐसी बन गयीं की यही वफ़ादार राष्ट्रकूट परिवार के लोग 25 वर्षों तक एक-दूसरे के दुश्मन बने रहे । दोनों परिवारों के मध्य दुश्मनी के कारणों का स्पष्ट प्रमाण नहीं है लेकिन ऐसा अनुमान लगाया जाता है की शायद अमोघवर्ष प्रथम ने बड़े ही अहंकारपूर्वक गुजरात के राष्ट्रकूटों के कार्यों व उपकारों को नकार दिया होगा अथवा ध्रुव को अपने पिता कर्क द्वारा मान्यखेत के राष्ट्रकूटों पर किये गये अहसानों से घमंड आ गया हो । जो भी हो यह प्रमाणिक रूप से नहीं कहा जा सकता कि उपर्युक्त कारणों से ही दोनों परिवारों में दुश्मनी उत्पन्न हुई हो ।

इतिहासकारों के अनुसार दोनों परिवारों के मध्य यह कटुता 835 ई. से 860 ई. तक बनी रही । धीरे-धीरे यह कटुता प्रत्यक्ष संघर्ष में बदल गयी । ध्रुव और अमोघवर्ष की सेनाओं के मध्य यह संघर्ष लगभग 845 ई. तक चलता रहा लेकिन ध्रुव ज्यादा समय तक अमोघवर्ष की सेना के समक्ष टिक नहीं पाया और अंततः वह युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया ।

ध्रुव की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र अकालवर्ष ने राष्ट्रकूट साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष का बीड़ा उठाया । उसने बार-बार अमोघवर्ष की सेना को कड़ी टक्कर दी । दोनो सेनाओं के मध्य यह संघर्ष के वर्षों तक चलता रहा । इसी बीच गुजरात के राष्ट्रकूटों का शासक ध्रुव द्वितीय बन गया था । कई वर्षों तक चले इस संघर्ष में गुजरात के राष्ट्रकूटों का काफी नुकसान हो गया था । अंततः 860 ई. में दोनों परिवारों के मध्य सुलह हो गई ओर इस प्रकार 25 वर्षों से चला आ रहा यह संघर्ष समाप्त हो गया ।

दोनों परिवारों में सुलह का प्रमुख कारण था कन्नौज नरेश भोज का शक्तिशाली होना । उत्तर भारत अभियान के दौरान राष्ट्रकूटों ने गुर्जर प्रतिहार शासकों को पराजित किया था । राष्ट्रकूटों को यह आशंका थी कि प्रतिहार नरेश भोज बदले की कार्यवाही अवश्य करेगा । इसी खतरे के डर से दोनों परिवारों ने आपस में ना लड़कर एक दूसरे का सहयोग करने का निर्णय लिया ।

राष्ट्रकूटों की सोच भोज को लेकर स्वाभाविक थी परन्तु ऐसा हुआ नहीं । भोज ने दक्षिण में अपने राज्य विस्तार में कोई रूचि नहीं ली । हालांकि 867 ई. में भोज ने एक बार गुजरात के राष्ट्रकूटों पर आक्रमण अवश्य किया था जिसे ध्रुव द्वितीय ने अमोघवर्ष प्रथम की सैन्य सहायता की बदौलत असफल कर दिया ।

अमोघवर्ष वास्तव में राष्ट्रकूट वंश का एक योग्य शासक था । उसने 814 ई. से 880 ई. तक शासन किया । अपने 66 वर्षों के शासनकाल में वह हमेशा विद्रोहियों व देशद्रोहियों से घिरा रहा । यह उसकी योग्यता थी कि इतने संकटों के बावजूद भी उसने दुश्मनों के चंगुल से अपने राज्य को सुरक्षित बनाये रखा । वह विद्वानों व साहित्यकारों का आश्रयदाता था । उसके शासनकाल में कन्नड़ भाषा का अत्यधिक विकास हुआ । ऐसा माना जाता है कि कन्नड़ भाषा के सबसे प्राचीन काव्यभाषा ‘कविराजमार्ग’ का रचयिता अमोघवर्ष था । अमोघवर्ष एक धर्म-सहिष्णु शासक था । वह हिन्दू धर्म को मानता था । वह जैन धर्म और दर्शन से भी अत्यधिक प्रभावित था । जैन आचार्य ‘जिनसेन’ को अमोघवर्ष अपना गुरु मानता था । 880 ई. में अमोघवर्ष की मृत्यु हो गई । अमोघवर्ष की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कृष्ण द्वितीय राष्ट्रकूट वंश की गद्दी पर बैठा ।

कृष्ण द्वितीय (880 ई.-914 ई.)

अपने पिता अमोघवर्ष की मृत्यु के पश्चात वह राष्ट्रकूट वंश का शासक बना । उस समय उसकी उम्र क्या थी इस बात को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं । विद्वानों का मत है कि सिंहासनारोहण के समय कृष्ण द्वितीय की आयु 40 से 50 वर्ष के लगभग रही होगी । वह एक योग्य शासक और कुशल सेनापति था । अपने पिता के शासनकाल के दौरान उसने अनेकों सैन्य अभियानों में भाग लेकर अपनी कुशलता का परिचय दिया । उसने शुभतुंग, अकालवर्ष,पृथ्वीवल्लभ अथवा वल्लभ नामक अनेकों उपाधियाँ धारण कीं ।

चेदि-राष्ट्रकूट संबंध

चेदियों व राष्ट्रकूटों के मध्य मधुर संबंध थे । इस मधुरता को हमेशा बरकरार रखने के लिए राष्ट्रकूटों ने चेदियों से वैवाहिक संबंध स्थापित कर लिए । कृष्ण द्वितीय ने चेदि नरेश कोक्कल की पुत्री के साथ विवाह किया था । इसके अलावा अनेकों राष्ट्रकूट राजकुमारों का विवाह चेदि कन्याओं से हुआ था । दोनों राज्यों के रिश्तों को ओर अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए कृष्ण द्वितीय ने राजकुमार जगन्तुंग का विवाह चेदि नरेश के पुत्र शंकरगण की पुत्री लक्ष्मी से करवाया । 890 ई. के आस-पास एक सैन्य अभियान के दौरान जब राजकुमार जगन्तुंग अपने ससुराल चेदियों की राजधानी में विश्राम के लिए रुका हुआ था तब उसने दूसरी राजकुमारी (लक्ष्मी की बहिन) के साथ भी विवाह कर लिया । इस प्रकार जगन्तुंग ने दो चेदि राजकुमारियों के साथ विवाह किया था । इसके अलावा कृष्ण द्वितीय ने अपने पौत्र युवराज इन्द्र (जगन्तुंग और लक्ष्मी का पुत्र) का विवाह चेदि राजकुमारी विजंबा (शंकरगण के भाई अर्जुन की पौत्री) से कराया । इस प्रकार इन तमाम वैवाहिक संबंधों से राष्ट्रकूटों व चेदियों के मध्य बहुत गहरे व मजबूत मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो गए थे ।

राष्ट्रकूट व वेंगी के मध्य संबंध

राष्ट्रकूट व वेंगी राज्य एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन थे । कृष्ण द्वितीय का समकालीन वेंगी का चालुक्य शासक विजयादित्य तृतीय था । वह चालुक्य वंश का एक सफल व योग्य शासक था । ये दोनों राज्य हमेशा आपस में संघर्षरत रहते थे । विजयादित्य ने अपनी साम्राज्य विस्तार की नीति के तहत अपने पड़ोसी राज्यों पल्लवों, चोलों व राष्ट्रकूटों के काफी बड़े क्षेत्र को छीनकर उस पर अधिकार कर लिया तथा काफी मात्रा में धन-सम्पदा लूटकर अपने साम्राज्य के वित्त कोष में वृद्धि की । विजयादित्य तृतीय दक्षिण भारत का एक शक्तिशाली राजा बन चुका था ।

विजयादित्य तृतीय ने गंग प्रदेश पर आक्रमण कर वहां के एक बड़े भू-भाग पर अपना अधिकार कर लिया । गंग राजा ने किले में छुपकर अपनी जान बचाई । एक युद्ध में विजयादित्य तृतीय ने राष्ट्रकूटों व चेदियों की संयुक्त सेनाओं को पराजित किया था । इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि चालुक्य नरेश विजयादित्य तृतीय अपने समय का दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली शासक था जिसने दक्षिण की राजनीती में राष्ट्रकूटों के दबदबे को समाप्त कर दिया । राष्ट्रकूटों की यह स्थिति विजयादित्य तृतीय की मृत्यु (888 ई.) तक बनी रही । विजयादित्य तृतीय की मृत्यु के पश्चात भीम वेंगी का शासक बना । भीम विजयादित्य तृतीय के सामान योग्य नहीं था । राष्ट्रकूटों ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के लिए वेंगी चालुक्यों को युद्ध में बुरी तरह पराजित किया तथा चालुक्य शासक भीम को बंदी बना लिया । हालाँकि कुछ समय बाद ही कृष्ण द्वितीय ने उसे वेंगी में राष्ट्रकूटों के सामन्त रूप के में शासन करने की शर्त पर छोड़ दिया । लेकिन वह ज्यादा समय राष्ट्रकूटों का सामन्त बनकर नहीं रहा । लगभग दस वर्षों तक उसने पुनः अपनी सेना को संगठित किया और एक दिन चालुक्यों की सेना ने अपने सेनापति महाकाल के नेतृत्व में राष्ट्रकूट राज्य पर आक्रमण कर दिया ।  दोनों सेनाओं के मध्य हुए इस युद्ध में दोनों पक्षों की भयंकर तबाही हुई । चालुक्यों का सोलह वर्षीय युवराज इस युद्ध में मारा गया ।

गुर्जर-प्रतिहारों व राष्ट्रकूटों के मध्य संघर्ष

कृष्ण द्वितीय व गुर्जर -प्रतिहारों के बीच मुख्य संघर्ष त्रिकोणीय संघर्ष था । कृष्ण द्वितीय का समकालीन प्रतिहार शासक मिहिरभोज था.वह उत्तर भारत में अपनी विजय का परचम लहरा चुका था । उसने राष्ट्रकूटों के अधीन उज्जैन के क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया था । कृष्ण द्वितीय एक धर्म सहिष्णु व्यक्ति था । उसने कभी भी किसी दूसरे धर्म का विरोध नहीं किया हालाँकि उसकी खुद की रुचि जैन धर्म में थी । जैन गुरु आचार्य गुणचन्द्र उसके गुरु थे । कृष्ण द्वितीय ने लगभग 34 वर्षों तक शासन किया । लगभग 914 ई. में उसकी मृत्यु के पश्चात उसका दौहित्र इंद्र तृतीय राष्ट्रकूट वंश की गद्दी पर बैठा ।

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राष्ट्रकूट राजवंश (भाग -4)

2 thoughts on “राष्ट्रकूट राजवंश (भाग -3)

  • 16/07/2019 at 5:33 pm
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