रावल वंश के शासक (मेवाड़ का इतिहास)

दोस्तों जैसा कि हमने मेवाड़ का इतिहास भाग-1 में बताया था कि गुहिल वंश के शासक राजा रण सिंह (1158 ई.-1168 ई.) के काल में गुहिल शाखा दो भागों में बंट जाती है । राजा रण सिंह जिन्हें कर्ण सिंह भी कहा जाता है के दो पुत्र थे क्षेम सिंह और राहप । क्षेम सिंह ने रावल शाखा तथा राहप ने सिसोदिया शाखा/राणा शाखा का निर्माण किया । राजा रण सिंह जिनके विषय में इतनी जानकारी मिलती है कि इन्होंने आहोर पर्वत पर एक किले का निर्माण करवाया था ।

राजा रण सिंह के पश्चात क्षेम सिंह 1168 ई. में गुहिल वंश (रावल शाखा) का शासक बना । क्षेम सिंह ने लगभग 4 वर्षों (1168 ई.-1172 ई.) तक शासन किया । क्षेम सिंह के दो पुत्र थे सामंत सिंह और कुमार सिंह । क्षेम सिंह के पश्चात 1172 ई. में सामंत सिंह ने मेवाड़ की गद्दी संभाली ।

सामंत सिंह

सामंत सिंह दिल्ली-अजमेर के चौहान शास पृथ्वीराज चौहान के बहनोई थे । उनका विवाह पृथ्वीराज चौहान की बहिन पृथ्वीबाई से हुआ था । पृथ्वीराज चौहान के साथ किसी अनबन के कारण नाडौल (पाली) के शासक कीर्तिपाल चौहान ने मेवाड़ पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया । दोस्तों, कीर्तिपाल चौहान को राजस्थान में सोनगरा चौहानों का संस्थापक कहा जाता है । कीर्तिपाल चौहान नाडौल के शासक अल्हण का पुत्र था । उसने 1172 ई. में जालौर के परमार शासकों को पराजित कर जालौर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया था । इस दुर्ग के सोनगिरि की पहाड़ियों पर स्थित होने के कारण यहां के चौहान सोनगरा चौहान कहलाये । बहरहाल,कीर्तिपाल चौहान के हाथों पराजित होने के बाद सामंत सिंह बागड़ (डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र) की तरफ भाग गया । 1178 उसने बागड़ में अपने एक नए राज्य की स्थापना की । 1179 ई. में सामंत सिंह के छोटे भाई कुमार सिंह ने कीर्तिपाल चौहान को पराजित कर मेवाड़ पर पुनः अधिकार कर लिया । कुमार सिंह ने तेरह वर्षों तक(1192 ई.तक) शासन किया ।

जेत्र सिंह

सामंत सिंह के पश्चात के प्रमुख शासकों में एक जेत्र सिंह 1213 ई. में मेवाड़ के शासक बने । इनका शासनकाल 1213 ई. से 1252 ई. के आसपास था । जेत्र सिंह उस समय के मेवाड़ शासकों में सबसे शक्तिशाली शासक थे । तुर्क गुलाम शासक इल्तुतमिश व जेत्र सिंह के मध्य गोगुन्दा के पास भूताला (गिर्वा, उदयपुर) नामक स्थान पर युद्ध (सम्भवतः 1227 ई. में) हुआ । समय सीमा तय नहीं होने के कारण इतिहासकारों द्वारा इल्तुतमिश के मेवाड़ पर आक्रमण की अवधि 1222 ई. से 1229 ई. के बीच मानी गई है । इस आक्रमण में जेत्र सिंह व इल्तुतमिश की सेनाओं के मध्य जबरदस्त टक्कर हुई जिसमें इल्तुतमिश को पीछे हटना पड़ा। हालांकि इन युद्धों में राजधानी नागदा में काफी तोड़फोड़ व नुकसान होने के कारण जेत्र सिंह ने अपनी राजधानी को नागदा से चितौड़ स्थानांतरित कर दिया । जेत्र सिंह की इस सफलता का प्रमाण आबू शिलालेख, चीरवा शिलालेख हैं । 2248 ई. में नासुरुद्दीन महमूद द्वारा मेवाड़ आक्रमण का भी सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया । राजस्थानी इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार जेत्र सिंह का शासनकाल मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्ण काल था । जेत्र सिंह के प्रमुख सेनानायकों में बालक और मदन प्रमुख थे ।

अपने पूर्वजों के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए उसने उस समय के सोनगरा चौहान शासक उदय सिंह चौहान पर आक्रमण कर दिया । उदय सिंह ने जेत्र सिंह के साथ संधि कर ली तथा अपनी पुत्री चचिक देवी/रूपा देवी का विवाह जेत्र सिंह के पुत्र तेज सिंह के साथ कर दिया ।

तेज सिंह

जेत्र सिंह के पश्चात उसका पुत्र तेज सिंह मेवाड़ के शासक बना । इसकी शासनावधि 1252 ई. से 1273 ई.तक थी । तेज सिंह भी अपने पिता जेत्र की ही तरह पराक्रमी थे । तेज सिंह के शासनकाल में तुर्क शासक गयासुद्दीन बलबन ने मेवाड़ पर आक्रमण किया लेकिन उसे मेवाड़ सेना के प्रतिरोध के फलस्वरूप पीछे हटना पड़ा ।

तेज सिंह की पत्नी रानी जयतल्ल देवी ने चितौड़ में श्याम पार्श्र्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया । तेज सिंह के शासनकाल में मेवाड़ चित्रशैली का पहला चित्रित ग्रंथ श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि लिखा गया था ।

समर सिंह

रावल समर सिंह एक योग्य व प्रतापी शासक था । उसने शत्रुओं का संहार कर गुजरात का तुर्कों से उद्धार किया । चीरवा शिलालेख में समर सिंह को शत्रुओं की शक्ति का अपहरणकर्ता व कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में उसे शत्रुओं का संहार करने में शेर के समान बताया गया है । आबू के शिलालेख के अनुसार समर सिंह ने गुजरात को तुर्कों से मुक्त कराया । समर सिंह की शासनकाल 1273 ई. से 1302 ई. के बीच था ।रावल समर सिंह के दो पुत्र थे रतन सिंह व कुम्भकर्ण । रावल सिंह मेवाड़ का उत्तराधिकारी बना जबकि कुम्भकर्ण ने नेपाल में गुहिल सत्ता की स्थापना की ।

रावल रतन सिंह

रावल रतन 1302 ई. में मेवाड़ के शासक बने । रतन सिंह समर सिंह के बेटे थे । समर सिंह के दूसरे बेटे कुम्भकर्ण ने नेपाल में गुहिल वंश स्थापित किया । इस समय मेवाड़ की राजधानी चितौड़ थी । रावल रतन सिंह की रानी पद्मावती बहुत खूबसूरत थी । दिल्ली के शासक अल्लाउद्दीन खिलजी ने 1303 ई. में चितौड़ पर आक्रमण कर दिया । चितौड़गढ़ दुर्ग को चारों तरफ से घेर लिया गया । लगभग 7 माह के कड़े संघर्ष के पश्चात 26 अगस्त,1303 को अल्लाउद्दीन खिलजी का चितौड़ पर अधिकार हो गया । रावल रतन सिंह लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए । चित्तौड़गढ़ दुर्ग में मौत का भयंकर तांडव हुआ । लगभग 30000 हजार हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया गया । रानी पद्मावती सहित महल की हजारों स्त्रियों ने अपने सतीत्व की रक्षा हेतु खुद को जोहर की आग में झोंक दिया । 1303 ई. में मेवाड़ के इतिहास का पहला शाका हुआ । शाका अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए मौत के भय से दूर होकर दुश्मनों को मौत के घाट के लिए केसरिया रंग की पगड़ी पहनकर किया जाने वाला युद्ध है।

हालांकि सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के कारण चितौड़गढ़ दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी का आक्रमण भी, उसकी साम्राज्यवादी नीति का एक हिस्सा था । लेकिन अल्लाउद्दीन खिलजी के चितौड़ आक्रमण के सम्बंध में महाकवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने सुप्रसिद्ध महाकाव्य पद्मावत में लिखा है कि अल्लाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ की रानी पद्मावती को पाने की मंशा से चितौड़ पर आक्रमण किया था ।

पद्मावत की कहानी

पद्मावती की यह कहानी सच्ची है या मात्र एक कल्पना है यह कहना मुश्किल है लेकिन गत वर्षों यह विषय काफी विवादों में रहा है । 2018 में रिलीज हुई फिल्म पद्मावत मलिक मुहम्मद जायसी की रचना पद्मावत पर ही आधारित है। पद्मावत के अनुसार सिंहल प्रदेश(श्रीलंका) के राजा गंधर्वसेन व रानी चम्पावती के एक बेटी थी जिसका नाम पद्मावती था । पद्मावती बेहद खूबसूरत थी । पद्मावती के पास हीरामन नामक एक पालतू तोता था । हीरामन को एक दिन शिकारी ने पकड़ लिया तथा उसे एक ब्राह्मण को बेंच दिया । ब्राह्मण उस तोते को लेकर चितौड़ आया तथा उसे रावल रतन सिंह को बेंच दिया । तोते ने रॉवल रतन सिंह के सामने पद्मावती की सुंदरता का बखान किया । तोते के मुख से पद्मावती की सुंदरता के बारे में सुनकर रावल रतन सिंह खुद को रोक नहीं पाया तथा सिंहल प्रदेश जाकर पद्मावती को देखने का फैसला किया । उसने एक जोगी का भेष धारण किया तथा सिंहल प्रदेश पहुंच गया । सिंहल पहुंचकर जब उसने पद्मावती को देखा तो दंग रह गया । पद्मावती उसकी सोच से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत थी । लेकिन इसी बीच गन्धर्वसेन को रावल रतन सिंह के बारे में पता चल गया । उसने अपनी पुत्री पद्मावती की शादी रावल रतन सिंह के साथ कर दी । रावल रतन सिंह पद्मावती को अपने साथ लेकर चितौड़ लौट आया ।

चितौड़ की बर्बादी के लिए एक व्यक्ति मुख्य कारक बना जो एक ब्राह्मण होने के साथ-साथ एक संगीतकार भी था । दरअसल रावल रतन सिंह के राज दरबार में अनेक सुप्रसिद्ध संगीतकार थे उनमें से एक राघव चेतन था । राघव चेतन को संगीत विद्या के साथ-साथ तांत्रिक विद्या में भी महारथ हासिल थी । जब रावल रतन सिंह को इस बात की खबर हुई तो उसने राघव चेतन को अपमानित कर राज्य से बाहर निकाल दिया । अपने अपमान का बदला लेने के लिए राघव चेतन दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी के पास जा पहुंचा । उसने अल्लाउद्दीन खिलजी को रानी पद्मावती की सुंदरता के बारे में बताया ।

जब अल्लाउदीन खिलजी ने पद्मावती की खूबसूरती के बारे में सुना तो उसने पद्मावती को प्राप्त करने की इच्छा की । 26 जनवरी,1303 ई. को अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी एक विशाल सेना के साथ चितौड़ की ओर प्रस्थान किया । चितौड़ पहुंचकर उसने गंभीरी और बेड़च नदी के पास अपना सैनिक केम्प बनाया तथा यहीं से उसने दुर्ग की घेराबंदी शुरू कर दी । उसने चितौड़ दुर्ग पर लगातार कई आक्रमण किये लेकिन वह असफल रहा । कई महीनों बाद भी जब अल्लाउदीन खिलजी दुर्ग पर अधिकार नहीं कर पाया तो उसने एक योजना बनाई । उसने रतन सिंह को यह संदेश भिजवाया की वह सिर्फ एक बार रानी पद्मावती की झलक देखना चाहता है फिर वह अपनी सेना को वहां से हटा लेगा । रावल रतन सिंह ने कुछ शर्तों के साथ अल्लाउदीन खिलजी की बात मान ली । ऐसा कहा जाता है कि एक दर्पण के माध्यम से अल्लाउदीन खिलजी को रानी पद्मावती का प्रतिबिंब दिखाया गया । इसके पश्चात अल्लाउदीन खिलजी ने रावल रतन सिंह को अपने बेड़े में आने के लिए आमंत्रित किया तथा वहां से चला गया । कुछ दिनों के पश्चात रावल रतन सिंह अल्लाउदीन खिलजी के निमंत्रण पर उसे मिलने के लिए उसके सैनिक बेड़े में पहुंचा । लेकिन अल्लाउदीन खिलजी ने धोखे से उसे बंदी बना लिया । चितौड़ में यह संदेश भिजवाया गया कि रावल रतन के बदले रानी पद्मावती को उसके पास भेज दिया जाए । बाद में रानी पद्मावती सेनापति गोरा व बादल की सहायता से रावल रतन सिंह को अल्लाउदीन खिलजी की कैद से मुक्त कराने में सफल रहीं ।

रानी पद्मावती के साथ रतन सिंह के सेनापति गोरा तथा गोरा के 12 वर्षीय भतीजे बादल की वीरता व कुर्बानी को हमेशा याद किया जाएगा । दरअसल जब राजा रतन सिंह अल्लाउदीन खिलजी को रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब दिखाने के लिए राजी हो गए तो सेनापति गोरा ने इसका विरोध किया । रतन सिंह से नाराज होकर गोरा महल छोड़कर चले गए । जब रतन सिंह को बंदी बना लिया गया तो रानी पद्मिनी ने गोरा से रतन सिंह को अल्लाउदीन खिलजी की कैद से छुड़ाकर लाने की विनती की । गोरा और बादल ने रावल रतन सिंह को छुड़ाने के लिए एक योजना बनाई । योजनानुसार रानी पद्मावती ने अल्लाउदीन खिलजी को यह संदेश भिजवाया की वह अपनी दासियों के साथ उसके पास आने को तैयार है लेकिन शर्त यह है कि वह वहां पहले अपने पति रावल रतन सिंह से मिलेगी । अल्लाउदीन खिलजी ने रानी पद्मावती की बात मान ली ।

अब गोरा और बादल ने 1600 सैनिकों को स्त्रीयों के वस्त्र पहनाकर डोलियों में बैठाया तथा अल्लाउदीन खिलजी के सैनिक बेड़े में पहुंच गए । यहां पहुंचकर रानी के भेष में आये लुहार ने रावल रतन सिंह की बेड़िया काट दी तथा उन्हें वहां से भगा लाये । जब इसकी जानकारी अल्लाउदीन खिलजी को हुई तो उसने अपनी सेना रतन सिंह के पीछे भेजी । लेकिन स्त्रियों के वेष में मौजूद राजपूती सेना ने खिलजी सेना का डटकर मुकाबला किया । युद्ध में गोरा और बादल ने अभूतपूर्व पराक्रम दिखाया । गोरा का सिर धड़ से अलग हो गया लेकिन फिर भी वह खिलजी सेना से लड़ता रहा । गोरा ने खिलजी सेनापति जफर मोहम्मद को मार डाला । मेवाड़ी सेना के आगे खिलजी सेना के हौंसले पस्त हो गए । मुट्ठी भर राजपूत सैनिक अल्लाउदीन खिलजी की विशाल सेना से लड़ते रहे लेकिन अंततः गोरा और बादल युद्ध में लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए ।

अपनी हार से बोखलाए अल्लाउदीन खिलजी ने एक विशाल सेना के साथ चितौड़ दुर्ग पर पुनः आक्रमण कर दिया । रावल रतन सिंह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए । 7 माह के कड़े संघर्ष के बाद 26 अगस्त,1303 ई. को अल्लाउदीन खिलजी ने चितौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया । इस संघर्ष में हजारों राजपूत यौद्धा मारे गए तथा तैश में आकर अल्लाउदीन खिलजी ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया । रानी पद्मावती ने महल की हजारों औरतों के साथ खुद को अग्नि कुंड में समर्पित कर दिया ।

रतन सिंह रावल वंश का अंतिम शासक था । रतन सिंह की मृत्यु के पश्चात रावल शाखा का शासन समाप्त हो गया । 1326 ई. में सिसोदिया वंश के महाराणा हम्मीर सिंह ने तुर्की सत्ता को उखाड़ फेंका तथा मेवाड़ के गौरव को पुनर्स्थापित किया । सम्भवतः हम्मीर सिंह का जन्म भी इसी वर्ष हुआ था। राणा हम्मीर सिंह लक्ष्मण सिंह के पौत्र तथा अरिसिंह के पुत्र थे । सिसोदिया गांव के लक्ष्मण सिंह राहप के वंशज थे या यूं कहें ये बप्पारावल के वंशज थे । जिसका तात्पर्य यह हुआ कि लक्ष्मण सिंह रावल रतन सिंह के रिश्तेदार थे । लक्ष्मण सिंह के सात बेटे थे जिसमें से बड़े बेटे का नाम अरिसिंह व दूसरे बेटे का नाम अजय सिंह था । चितौड़ पर अल्लाउदीन खिलजी के आक्रमण के समय इन्हें दुर्ग की रक्षार्थ बुलाया गया था । खिलजी सेना से लड़ते हुए अरिसिंह सहित लक्ष्मण सिंह के 6 बेटे मारे गए थे लेकिन संयोगवश अजय सिंह बच गए थे । सम्भवतः जौहर में शामिल हुई हजारों स्त्रियों में से एक हम्मीर सिंह की माँ अथवा अरिसिंह की पत्नी उर्मिला भी थीं । इस प्रकार हम्मीर सिंह बचपन में ही अनाथ हो गए थे । अब रावल रतन सिंह का न तो कोई उत्तराधिकारी था ना ही कोई रिश्तेदार बस एक अजय सिंह ही ऐसा व्यक्ति था जिसने मेवाड़ के उत्तराधिकार की जिम्मेदारी संभाली । उसने भतीजे हम्मीर सिंह को अपने संरक्षण में लिया तथा उसे युद्ध कला के साथ-साथ अन्य शिक्षाएं भी दीं । उसने हम्मीर सिंह को युद्ध कौशल व शासन के सभी गुर सिखाए ।

अजय सिंह के बारे में ज्यादा जानकारी तो प्राप्त नहीं होती है। लेकिन ऐसा इतिहास में देखने को मिलता है कि अजय सिंह का शासनकाल 1303 ई. से 1326 ई. तक था । दोस्तों, हालांकि अजय सिंह ने कोई शासन नहीं किया था क्योंकि मेवाड़ पर तो तुर्कों का अधिकार था लेकिन इसके बावजूद अजय सिंह ने ऐसी पृष्ठभूमि जरूर तैयार कर दी थी कि आगे चलकर मुस्लिम सत्ता को टक्कर दी जा सके व मेवाड़ की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित किया जा सके । ओर ऐसा हुआ भी , 1326 ई. में हम्मीर सिंह ने मुस्लिम सत्ता को उखाड़ फेंका तथा मेवाड़ में सिसोदिया शासन की शुरुआत की ।

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मेवाड़ का इतिहास भाग-3

मेवाड़ का इतिहास भाग-5

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