गुप्तवंश का इतिहास भाग-4 (स्कंदगुप्त-455 ई.-467 ई.)

स्कंदगुप्त (455 ई.-467 ई.)

कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र स्कंदगुप्त गुप्त वंश का शासक बना । स्कंदगुप्त इस वंश का अंतिम महान सम्राट था । मशहूर इतिहासकार रमेश चन्द्र(आर.सी.) मजूमदार का मानना है की कुमारगुप्त-। की मृत्यु के पश्चात गद्दी को पाने के लिए स्कंदगुप्त का अपने भाइयों के साथ उत्तराधिकार युद्ध होता है । हालांकि स्कंदगुप्त का बड़ा भाई पुरुगुप्त गद्दी का वास्तविक अधिकारी था । परन्तु अपने सभी भाइयों को पराजित कर स्कंदगुप्त गुप्त साम्राज्य का शासक बना । मजूमदार के इस मत का अनेकों विद्वानों ने विरोध किया । उनका मानना था की स्कन्दगुप्त कुमारगुप्त-। के तुरंत बाद गद्दी पर बैठा जिसकी जानकारी ‘आर्यमंजुश्रीमूलकल्प’ के एक छंद से प्राप्त होती है । ‘चंद्रगर्भपरिपृच्छा’, ‘कथासरित्सागर’ तथा ‘अप्रतिघ’ के आधार पर श्रीराम (एस.आर.)गोयल का कहना है की वृद्धावस्था में कुमारगुप्त-। सत्ता का भार स्कंदगुप्त को सौंपकर एकांतवास के लिए चला जाता है ।

कुछ भी हो मगर इतना सत्य है की स्कंदगुप्त का शुरुआती दौर बहुत ही अशान्तिपूर्ण था । परन्तु सौभाग्य से तलवार के इस धनी में वो सभी गुण थे जो तत्कालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए एक सम्राट में होने आवश्यक थे । अपने पिता के शासनकाल में स्कंदगुप्त ने पुष्यमित्रों को परास्त किया था लेकिन राजा बनते ही उसके सामने एक बड़ी विपदा हूण आक्रमण के रूप में सामने आ गयी जो पहले से भी अत्यंत भयावह थी जिसने गुप्त साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया था ।

हूण आक्रमण(455 ई.)

हूण आक्रमण के पुरातात्विक तथा साहित्यिक दोनों प्रकार के साक्ष्य मिलते हैं । स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख तथा भीतरी अभिलेख में हूण आक्रमण के पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं । जूनागढ़ अभिलेख में बताया गया है कि स्कंदगुप्त ने मलेच्छों (हूणों) पर सफलता प्राप्त कर ली थी । इसी प्रकार चंद्रगर्भपरिपृच्छा तथा कथासरित्सागर(सोमदेव) आदि साहित्यिक ग्रंथों में भी हूण आक्रमण का उल्लेख मिलता है । सोमदेव के कथासरित्सागर में उल्लेख मिलता है कि उज्जयिनी नरेश महिन्द्रादित्य के पुत्र विक्रमादित्य ने मलेच्छों को पराजित किया था ।

हूण मध्य एशिया में निवास करने वाली एक बर्बर जाती थी जो जनसंख्या वृद्धि तथा प्रसार के उद्देश्य से अपने मूल निवास को छोड़कर नए प्रदेशों की खोज में यहां आ पहुंची थी । आगे चलकर यह दो शाखाओं में बंट गया -पश्चिमी शाखा तथा पूर्वी शाखा । पश्चिमी शाखा के हूण आगे बढ़कर रोम पहुंचे जहां उन्होंने अपने ध्वंसात्मक कृत्यों द्वारा शक्तिशाली रोम साम्राज्य को गहरा धक्का पहुंचाया तथा पूर्वी शाखा के हूण आगे बढ़कर ऑक्सस नदी घाटी में जाकर बस गए । इसी शाखा ने भारत पर कई आक्रमण किये ।

जिस समय स्कंदगुप्त गद्दी पर बैठा था उस समय पूर्वी शाखा के हूण जिन्हें ‘स्वेत हूण’ कहा जाता था ने ऑक्सस नदी पार कर गांधार पर कब्जा कर लिया तथा यहां की जनता पर बर्बर अत्याचार करते हुए आगे बढ़े और सिंधु घाटी क्षेत्र में आ पहुंचे । इतिहासकार यू.एन. राय के अनुसार हूण आक्रमणकारियों का नेता खुशनेबाज था । हूणों एवं स्कन्दगुप्त के बीच भयंकर युद्ध हुआ । हालाँकि यह युद्ध किस स्थान पर हुआ इस बात को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं । लेकिन सम्भावना इस बात की अधिक है कि यह युद्ध पश्चिमोत्तर भारत में किसी स्थान पर हुआ होगा । जो भी हो ,इस बात में कोई शक नहीं कि स्कंदगुप्त ने हूणों को पराजित कर अपने साम्राज्य से बाहर खदेड़ दिया था । इस भयंकर युद्ध के पश्चात हूणों ने लगभग आधी सदी तक भारत में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं की लेकिन 6ठी सदी के शुरुआत में उन्हें सफलता मिली । हूणों को पराजित कर उन्हें देश से खदेड़ना निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी सफलता थी जिसने गुप्त साम्राज्य को एक भीषण संकट से बचा लिया । हूणों को भारत से खदेड़ना स्कंदगुप्त की सबसे महान उपलब्धियों में से एक थी । स्कंदगुप्त की इस उपलब्धि ने उसे चन्द्रगुप्त-।। की भांति ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण करने का अधिकार दे दिया ।

वाकाटकों से युद्ध

स्कन्दगुप्त जब हूणों के साथ युद्ध में व्यस्त था तब वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन (440-460 ई.) ने इस बात का लाभ उठाते हुए गुप्त साम्राज्य के मालवा क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया और उसे अपने अधिकार में ले लिया । वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन को बलाघाट अभिलेख में मालवा,कोशल तथा मेकल का शासक बताया गया है । हालाँकि स्कंदगुप्त ने शीघ्र ही मालवा सहित इन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था तथा आजीवन उसके के अधिकार में रहे ।

साम्राज्य विस्तार

पुष्यमित्रों,हूंणों तथा वाकाटकों के विरुद्ध सफलता के अतिरिक्त स्कंदगुप्त के किसी अन्य अभियान के विषय में हमें ज्ञात नहीं होता है । स्कंदगुप्त के अभिलेखों और सिक्कों से यह ज्ञात होता है की उसने अपने पिता और पितामह द्वारा पद्द्त साम्राज्य को पूर्णतया अक्षुण्ण बनाये रखा । जूनागढ़ अभिलेख से स्कंदगुप्त के सौराष्ट्र प्रान्त पर अधिकार होने की पुष्टि होती है । स्कन्दगुप्त की अनेकों प्रकार की रजत मुद्राओं से देश के विभिन्न क्षेत्रों पर उसके शासन की पुष्टि होती है । स्कन्दगुप्त के गरुड़ प्रकार के सिक्कों से उसके पश्चिम भारत,वेदी प्रकार के सिक्कों से उसके मध्य भारत तथा नदी प्रकार के सिक्कों से उसके काठियावाड़ के क्षेत्रों में अधिकार होने की पुष्टि होती है । इस प्रकार लगभग समस्त भारत पर स्कन्दगुप्त का आधिपत्य स्थापित था । उत्तर भारत में हिमालय से लेकर दक्षिण भारत मे नर्मदा नदी तक तथा पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक के विस्तृत भू-भाग पर शासन करने वाला स्कंदगुप्त गुप्त वंश का अंतिम महान शासक था ।

स्कंदगुप्त की प्रशासनिक व्यवस्था

स्कंदगुप्त एक वीर योद्धा होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक भी था । स्कंदगुप्त के अभिलेखों से उसकी शासन व्यवस्था पर भी अच्छा खासा प्रकाश पड़ता है । स्कंदगुप्त का विशाल साम्राज्य कई प्रान्तों में विभाजित था । प्रान्तों को देश या अवनी कहा जाता था । प्रान्त के राज्यपाल को गोप्ता कहा जाता था । अभिलेखों के अनुसार स्कंदगुप्त के कुछ प्रमुख गोप्ताओं के नाम इस प्रकार हैं- पर्णदत्त (सौराष्ट्र प्रान्त), सर्वनाग (अन्तर्वेदी प्रान्त अर्थात गंगा-जमुना दोआब), भीमवर्मन (कौशाम्बी प्रान्त) आदि । गोप्ता अपने प्रान्त की जनता को हर विपदा से सुरक्षित रखने के लिए तैयार रहते थे । जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि स्कंदगुप्त के शासनकाल में भारी बारिश के कारण सुदर्शन झील का बांध टूट गया था । बांध टूटने की वजह से इस दर्शनीय झील ने भयावह रूप ले लिया था । जनता को कष्ट होने लगा था जिसके निवारण के लिए सौराष्ट्र के राज्यपाल पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने जो गिरनार नगर का नगरप्रमुख था ,दो माह के भीतर ही अतुल धन खर्च कर पत्थरों की जड़ायी द्वारा बांध का पुनर्निर्माण करवाया । इस प्रकार जनता ने चैन की सांस ली ओर यह झील पुनः रमणीय स्थल के रूप में स्थापित हो गयी ।

स्कंदगुप्त धर्मनिष्ठ वैष्णव था तथा परमभागवत की उपाधि धारण करता था । जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार चक्रपालित ने सुदर्शन झील के तट पर भगवान विष्णु का मंदिर बनवाया था । इंदौर ताम्रपत्र में सूर्य पूजा का भी उल्लेख मिलता है । कहौम स्तंभलेख के अनुसार मद्र नामक व्यक्ति ने पांच जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाओं का निर्माण करवाया था । स्कन्दगुप्त ने नालंदा संघाराम को दान में दिया था । उसने चीन के साथ मैत्री पूर्ण संबंध कायम रखे । उसने अपना एक राजदूत 466 ई. में चीनी राजा के दरबार में भेजा था ।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि स्कंदगुप्त महान विजेता, कुशल प्रशासक तथा धर्म सहिष्णु शासक था । उसने हूणों के घमण्ड को चूर चूर कर देश से बाहर खदेड़ दिया । यही कारण है कि स्कंदगुप्त को ‘देश रक्षक’ के रूप में भी जाना जाता है । वह गुप्त वंश के महानतम शासकों की शृंखला की अन्तिम कड़ी था । उसकी मृत्यु के साथ ही गुप्त साम्राज्य विघटन एवं पतन की दिशा में अग्रसर हो गया ।

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