साम्यवादी विचारधारा

साम्यवाद, कार्ल मार्क्स तथा फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित व साम्यवादी घोषणापत्र -1948 (Communist manifesto-1948) नामक पुस्तक में वर्णित समाजवाद की चरम सीमा है। यह समाजवाद से मिलती जुलती विचारधारा है, इनमें अंतर है तो बस लक्ष्य प्राप्ति के साधनों का । जिस प्रकार समाजवाद पूंजीवाद को समाप्त करके समाज में समानता स्थापित करना चाहता है उसी प्रकार साम्यवाद भी समानता स्थापित करना चाहता है । यह अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए क्रांतिकारी तरीके अपनाता है। साम्यवादी घोषणापत्र के अनुसार जब समाजवाद अंतिम चरण तक अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में असमर्थ रहता है तब इसके क्रांतिकारी स्वरूप का उदय होता है जो साम्यवाद कहलाता है। साम्यवाद के अनुसार सारा समाज मात्र दो वर्गों में बंटा हुआ है-एक शोषित वर्ग (सर्वहारा/श्रमिक वर्ग) तथा दूसरा शोषक वर्ग(बुर्जुआ/पूंजीपति वर्ग) ।

साम्यवाद के सिद्धांत व नियम

समाज को महत्व- साम्यवादियों के अनुसार उत्पादन व वितरण के साधनों पर किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग का आधिपत्य नहीं होना चाहिए । बल्कि इन पर सीधा समाज का नियंत्रण होना चाहिए । वे राज्य को भी इसी कतार में खड़ा करते हैं अतः वे इसकी समाप्ति के समर्थन में हैं । साम्यवादियों के अनुसार राज्य (सरकार-Governance) पूंजीवाद को बढ़ावा देता है जो वर्ग संघर्ष का सर्वप्रमुख कारण है ।

पूंजीवाद का विरोध- साम्यवादियों के अनुसार पूँजीवाद समाज में आर्थिक असमानता का सबसे बड़ा कारण है । पूंजीपति वर्ग उत्पाद के सभी साधनों जैसे कारखानों व कृषि पर अपना नियंत्रण रखते हैं जिससे इनसे होने वाले लाभ पर भी पूरा अधिकार इन्हीं पूंजिपतियों का होता है । यहां कर्मचारियों व श्रमिकों को जरूरत से ज्यादा काम लिया जाता है तथा उनका शोषण किया जाता है । अत्यधिक परिश्रम के बदले भी उन्हें थोड़ा सा वेतन दिया जाता है जबकि सारा लाभ ये कारखाना मालिक ले जाते हैं ।

समतामूलक समाज की स्थापना- साम्यवादियों के अनुसार वितरण की असमानता दोनों वर्गों में हमेशा से ही संघर्ष का कारण बनी रही है । साम्यवादी विचारधारा के अनुसार इस संघर्ष में अंततः पूँजीवाद की पराजय होती है और एक समतामूलक समाज की स्थापना होती है । समतामूलक समाज से तात्पर्य एक ऐसे समाज से है जिसमें सभी को समानता का अधिकार हो । जिसमें किसी भी व्यक्ति के साथ सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक भेदभाव नहीं किया जाएगा ।

आवश्यकता के आधार पर वेतन- साम्यवादी विचारधारा में वेतन वितरण का आधार कार्यक्षमता ना होकर आवश्यकता है । इस विचारधारा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को वेतन उसकी आवश्यता के अनुसार दिया जाना चाहिए । इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई कर्मचारी या श्रमिक कम कार्य करता है या ज्यादा । कम परिश्रम करने वाले को भी ज्यादा वेतन दिया जा सकता है क्योंकि यह उसकी आवश्यकता है । साम्यवादियों का कहना है कि समाज में सभी की आवश्यकताएं पूरी हों, किसी भी तरह आर्थिक असमानता समाज में ना रहे ।

पर्तिस्पर्धा का विरोध- साम्यवादी विचारधारा पर्तिस्पर्धा का विरोध करती है । साम्यवाद का मानना है कि पर्तिस्पर्धा अव्यवस्था को जन्म देती है । यह विचारधारा मुक्त व्यापार (Free trade) का विरोध करती है तथा ट्रैड यूनियनों का समर्थन करती है ।

हालांकि इस व्यवस्था से न केवल रूस, चीन व जर्मनी जैसे देश प्रभावित हुए बल्कि विश्व के कई देशों ने अपनी शासन व्यवस्था में इस विचारधारा को शामिल किया । तत्कालीन परिस्थितियों में पूंजीवाद,निरंकुश व तानाशाही शासन के विरुद्ध यह व्यवस्था कारगर सिद्ध हुई । साम्यवाद का सबसे बड़ा प्रभाव हमें रूस में देखने को मिला जहां 1917 ई. में क्रांतिकारी व हिंसक तरीकों से वहां के तानाशाही साम्राज्य को समाप्त कर RSFSR ( रूसी सोवियत संघात्मक समाजवादी गणराज्य) की स्थापना हुई । इस क्रांति ने ना केवल वहां के निरंकुश, एकतंत्री, स्वेच्छाचारी, जारशाही शासन का अंत किया बल्कि वहां के कुलीन जमींदारों, सामंतों, पूंजीपतियों की आर्थिक और सामाजिक सत्ता को भी समाप्त कर दिया । इस प्रकार विश्व में पहली बार रूस में मजदूर और किसानों की सत्ता स्थापित हुई । रूस में यह क्रांति साम्यवादी नेता व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में हुई । लेनिन ने साम्यवादी विचारधारा में कुछ नए सिद्धांतों को जोड़कर इसे एक नया रूप दे दिया जो बाद में लेनिनवाद के नाम से जाना गया । 1922 ई. में लेनिन की बोल्शेविक पार्टी (जिसे बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से जाना जाने लगा) के नेतृत्व में सोवियत संघ (USSR) की स्थापना हुई जो 1991 तक अस्तित्व में रहा।

हालांकि न तो समाजवाद और ना ही साम्यवाद कभी अपने मूल सिद्धांतों पर टिका है । जिस प्रकार समाजवाद को परिभाषित करना कठिन है उसी प्रकार साम्यवाद को भी परिभाषित करना कठिन है । समय व परिस्थिति के अनुसार इनके नियम व सिद्धांतो में परिवर्तन आता रहा है । जो लोग साम्यवाद को स्थापित करने का दावा करते हैं वे भी अंततः पूंजीवाद व असमानता के रास्ते चल पड़े । साम्यवाद के जो मूल सिद्धांत थे उन्हें व्यापक रूप से तो किसी राष्ट्र ने अपनाया ही नहीं । हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अनेकों राष्ट्रों ने इस व्यवस्था को अपनाया था लेकिन वह सम्यवाद का मूल रूप नहीं था । इनमें भी पूंजीवाद व असमानता की दीमक लग गई थी । भारत में भी एक सीमित क्षेत्र में इसका प्रभाव देखने को मिलता है । वर्तमान में साम्यवादी विचारधारा को बंगाल व केरल के कुछ क्षेत्रों में समर्थन जरूर मिल रहा है लेकिन वह भी नाम मात्र है ।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है जो आदर्श समाज, साम्यवादी स्थापित करना चाहते थे उसमे उन्हें सफलता नहीं मिली और आखिरकार यह विचारधारा धीरे-धीरे पतन की ओर चली गई । इसीलिए दोस्तों, लोकतांत्रिक व्यवस्था दुनिया की सबसे अच्छी शासन व्यवस्था है जिसमें एक आदर्श समाज की भी स्थापना की जा सकती है और एक आदर्श राष्ट्र की भी ।

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