समाजवाद क्या है

समाजवाद एक ऐसी विचारधारा/ सिद्धांत/ व्यवस्था है जो समतामूलक समाज व राज्य की स्थापना पर बल देती है । समाजवाद का मुख्य ध्येय समाज की आर्थिक समानता है । यह व्यवस्था पूंजीवाद का विरोध करती है तथा आर्थिक समानता का समर्थन करती है । इस विचारधारा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को समानता का अधिकार है तथा किसी भी व्यक्ति के साथ आर्थिक भेदभाव नहीं किया जाएगा । कार्ल मार्क्स ने पूंजीवादी व्यवस्था/ बुर्जुआ विचारधारा को आर्थिक असमानता का सबसे बड़ा कारण माना है । उनके अनुसार पूंजीवादी वर्ग हमेशा से ही श्रमिक वर्ग का शोषण करता आया है । कार्ल मार्क्स ने अपनी रचना ‘दास कैपिटल’ में पूंजीवादियों व श्रमिक वर्ग में संघर्ष के कारणों का उल्लेख किया है तथा ऐसी कल्पना की है कि एक दिन ऐसा आएगा जब पूंजीवाद का अंत होगा तथा सम्पूर्ण विश्व पर श्रमिक वर्ग (सर्वहारा वर्ग) का शासन स्थापित हो जाएगा ।

हालांकि समाजवादी विचारधारा प्रत्येक युग में विद्यमान रही है । ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य में वर्गीय भेदभाव, सामाजिक, आर्थिक असमानता हमेशा से ही बनी रही है । परम्परावादी अर्थशास्त्रीयों द्वारा निर्मित समाजवादी सिद्धान्तों व नीतियों के विरुद्ध 18वीं शताब्दी में इसके स्वरूप में परिवर्तन आना शुरू हो गया । 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में समानता पर आधारित फ़्रांस की क्रांति ने लोगों की परंपरावादी सोच को बदल दिया, उनमें एक नई चेतना का प्रसार हुआ । इसके पश्चात् 18वीं व 19वीं शताब्दि की औद्योगिक क्रांति में नए-नए उद्योगों व कारखानों की स्थापना से पूंजीवाद का बहुत अधिक बोलबाला हो गया । पूंजीपतियों द्वारा श्रमिकों का शोषण किया जाने लगा । उनसे अत्यधिक काम लिए जाने के बावजूद भी उन्हें पूरा वेतन नहीं दिया जाता था । धीरे-धीरे असमानता व शोषण की इस नीति के कारण मजदूर, कर्मचारी व छोटे व्यापारी वर्गों में  पूंजीपतियों के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा । इन्ही कुछ कारणों की वजह से समाजवाद का उदय हुआ जिसमें समाज के सभी लोगों को आर्थिक समानता प्रदान की गयी है । धीरे-धीरे समाजवाद की जड़ें पूरे यूरोप में फैलने लगी । 1917 में रूसी क्रांति की सफलता के फलस्वरूप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समाजवाद की प्रतिष्ठा ओर अधिक बढ़ गई ।

समाजवाद के प्रमुख लक्षण अथवा नियम

  1. समाज को महत्व- समाजवाद व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्त्व देता है । समाजवाद का मानना है कि यदि समाज का विकास होगा तो व्यक्ति का स्वतः ही विकास हो जाएगा । यहां समाज का तात्पर्य किसी एक वर्ग या एक जाति समूह से नहीं है बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के समूह से है ।
  2. पूंजीवाद का विरोध- समाजवाद पूंजीवाद का विरोधी है क्योंकि समाजवाद का मानना है कि पूंजीवाद के कारण ही समाज में असमानता व अन्याय बढ़ता है । उत्पादन व वितरण के सभी साधनों पर पूंजीवादियों का अधिकार होने के कारण पूंजी का आसमान वितरण होता है । सम्पूर्ण लाभ पर पूंजीवादियों का अधिकार होता है तथा श्रमिक वर्ग को थोड़ा सा वेतन देकर इस लाभ से दूर कर दिया जाता है जिससे अत्यधिक परिश्रम करने के बाद भी श्रमिक वर्ग की स्थिति दयनीय रहती है । मार्क्स के अनुसार यही स्थिति पूंजीवादियों व सर्वहारा वर्ग (श्रमिक वर्ग व कर्मचारी वर्ग) में संघर्ष का कारण बनती है । यदि उत्पादन व वितरण पर समाज अथवा राज्य का अधिकार होगा तो यह असमानता समाप्त हो जाएगी तथा वर्ग संघर्ष भी नहीं रहेगा । पूंजीवादी व्यवस्था में एक पूंजीपति सिर्फ अपने हितों की सोचता है जबकि समाजवादी व्यवस्था में सम्पूर्ण समाज के हितों का ख्याल रखा जाता है । अतः यह स्पष्ट है कि समाजवाद उत्पादन व वितरण के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के स्थान पर सामूहिक स्वामित्व का समर्थन करता है ।
  3. प्रतिस्पर्धा का विरोध- समाजवाद प्रतिस्पर्धा का विरोध करता है । समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन और वितरण के साधनों पर राज्य का अधिकार होता है जिससे प्रतिस्पर्धा की सम्भवना समाप्त हो जाती है क्योंकि इस व्यवस्था में उतना ही उत्पादन व वितरण किया जाता है जितनी समाज को आवश्यकता होती है ।
  4. क्षमता के अनुसार वेतन- इस अवधारणा के अनुसार व्यक्ति को क्षमता के अनुसार कार्य दिया जाना चाहिए तथा कार्य के अनुसार ही वेतन । यदि कोई व्यक्ति कम कार्य करता है तो कम वेतन और यदि व्यक्ति ज्यादा कार्य करता है तो उसे ज्यादा वेतन दिया जाना चाहिए । हालांकि यहां वर्ग-विभेद नहीं माना जायेगा क्योंकि यहां साफ तौर पर कहा गया है कि व्यक्ति को उसकी क्षमता व योग्यता के अनुसार वेतन दिया जाएगा ।
  5. राज्य का सहयोग- समाजवाद का मानना है कि असमानता को दूर करने के लिए राज्य नामक संस्था मुख्य भूमिका निभा सकती है बशर्ते राज्य की भूमिका यहां संपत्ति के संरक्षक के रूप में होनी चाहिए । हालांकि उत्पादन के सभी साधनों पर समाज का ही सीधा आधिपत्य होगा लेकिन राज्य आवश्यकतानुसार समाज में उनका वितरण करेगा । क्योंकि राज्य, समाज द्वारा स्थापित ही एक संस्था है ।

समाजवादी सिद्धान्त एक आदर्श समाज की कल्पना पर आधारित है जिसमें समाज में किसी भी व्यक्ति का शोषण न हो तथा सभी को समान अवसर मिलें व सभी का समान विकास हो । हालांकि समाजवाद अपने सभी कार्य अहिसंक तरीके से अपनाने का पक्षधर है । यह एक लोकतांत्रिक परिक्रिया से कुछ मिलती जुलती व्यवस्था है । लेकिन समाजवाद की परिस्थिति हमेशा ही एक जैसी नहीं रही है । विभिन्न परिस्थितियों व समय में इसके स्वरूप में भी बदलाव आता रहा है । यही कारण है कि समाजवाद की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है । भारत में समाजवाद के प्रणेता महात्मा गांधी थे ।

कई बार समाजवाद व साम्यवाद दोनों को एक ही मान लिया जाता है हालांकि इन दोनों में लक्ष्यों की तो समानता है लेकिन समाजवाद के विपरीत साम्यवाद द्वारा लक्ष्यों की प्राप्ति में मार्ग एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं ।

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